॥महाषोढान्यास:॥
महाषोढान्यास तांत्रिक परंपरा में एक महत्वपूर्ण अभ्यास है, विशेष रूप से श्री विद्या पूजा के भीतर, जिसका उद्देश्य भक्त को देवता और ब्रह्मांड के साथ एकता का अनुभव कराना है। यह एक अनुष्ठानिक अभ्यास है जिसमें शरीर और मन को शुद्ध करने के लिए मंत्रों और प्रतीकात्मक इशारों का उपयोग करके देवता की ऊर्जाओं के साथ कल्पना करना और मानसिक रूप से ऐक्य प्राप्त करते है। इस अभ्यास को आत्मसाक्षात्कार और मुक्ति प्राप्त करने के लिए एक शक्तिशाली उपकरण माना जाता है।
॥चक्र-आवरणशक्ति न्यास:॥
॥मूलाधारे॥
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: कं खं गं घं ङं अनन्तकोटि भूचरी कुलसहितायै आं क्षां मङ्गलाम्बादेव्यै आं क्षां ब्रह्माण्यम्बादेव्यै अनन्तकोटि भूचरादि कुलसहितायै अं क्षं मङ्गलनाथाय अं क्षं असिताङ्ग भैरवनाथाय नम:।
॥स्वाधिष्ठाने॥
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: चं छं जं झं ञं अनन्तकोटि खेचरीकुलसहितायै ईं लां चर्चिकाम्बादेव्यै ईं लां माहेश्वर्यम्बादेव्यै अनन्तकोटि वेताल कुलसहिताय इं लं चर्चिकनाथाय इं लं रूरू भैरवनाथाय नम:।
॥मणिपूरके॥
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: टं ठं डं ढं णं अनन्तकोटि पातालचरी कुलसहितायै ऊं हां योगेश्वर्यम्बादेव्यै ऊं हां कौमार्याम्बादेव्यै अनन्तकोटि पिशाच कुलसहिताय उं हं योगेश्वरनाथाय उं हं चण्ड भैरवनाथाय नम:।
॥अनाहते॥
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: तं थं दं धं नं अनन्तकोटि दिक्चरी कुलसहितायै ॠं सां हरसिद्धाम्बादेव्यै ॠं सां वैष्णव्यम्बादेव्यै अनन्तकोट्यपस्पार कुलसहिताय ऋं सं हरसिद्धनाथाय ऋं सं क्रोध भैरवनाथाय नम:।
॥विशुद्धौ॥
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: पं फं बं भं मं अनन्तकोटि सहचरी कुलसहितायै ॡं षां भट्टिन्यम्बादेव्यै ॡं षां वाराह्याम्बादेव्यै अनन्तकोटि ब्रह्मराक्षस कुलसहिताय ऌं षं भट्टिनाथाय ऌं षं उन्मत्त भैरवनाथाय नम:।
॥आज्ञायां॥
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: यं रं लं वं अनन्तकोटि गुरुचरी कुलसहितायै ऐं शां किलिकिल्यम्बादेव्यै ऐं शां इन्द्राण्यम्बादेव्यै अनन्तकोटि चेटक कुलसहिताय एं शं किलिकिलिनाथाय एं शं कपाली भैरवनाथाय नम:।
॥भाले॥
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: शं षं सं हं अनन्तकोटि वनचरी कुलसहितायै औं वां कालरात्र्यम्बादेव्यै औं वां चामुण्डादेव्यै अनन्तकोटि प्रेतकुलसहिताय ओं वं कालरात्रिनाथाय ओं वं भीषण भैरवनाथाय नम:।
॥ब्रह्मरन्ध्रे॥
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ळं क्षं अनन्तकोटि जलचरी कुलसहितायै अ: लां भीषणाम्बादेव्यै अ: लां महालक्ष्म्याम्बादेव्यै अनन्तकोटि कूष्माण्ड कुलसहितायै अं लं भीषण नाथाय अं लं संहार भैरवनाथाय नम:।
व्यापक न्यास में किसी भी अंग को स्पर्श किये बिना सर्वांग में मंत्र न्यास करते है।
(Full-body) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं ऌं ॡं एं ऐं ओं औं अं अ: कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं समस्त मातृकाभैरवाधिदेवतायै शक्त्यम्बादेव्यै नम: स्हौ: ह्सौ: ऐं श्रीं क्लीं ह्रीं ॐ सर्वाङ्गे। इति व्यापकं न्यास कुर्यात्।
॥पञ्चवक्र न्यास:॥
॥विनियोग:॥
(नमस्कार) ॐ अस्य श्री महाषोढान्यासस्य (Head) ब्रह्माऋषि: (Mouth) गायत्रीछन्द:
(Heart) श्रीमद् अर्धनारीश्वरी देवता (नमस्कार) श्रीबगलाविद्याङ्गत्वेन न्यासे
(अंजलि) विनियोग:।
॥न्यासम्॥
(Thumb) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हौं ईशानाय नम: अंगुष्ठयो:।
(Index) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हैं तत्पुरुषाय नम: तर्जन्या:।
(Middle) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हुं अघोराय नम: मध्यमयो:।
(Ring) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हिं वामदेवाय नम: अनामिकयो:।
(Little) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हं सद्योजाताय नम: कनिष्ठिकयो:।
(Head) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हौं ईशानाय नम: मूर्ध्नि:।
(Mouth) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हैं तत्पुरुषाय नम: मुखे:।
(Heart) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हुं अघोराय नम: हृदये:।
(Genital) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हिं वामदेवाय नम: गुह्ये:।
(Feet) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हं सद्योजाताय नम: पादयो:।
(Head) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हौं ईशानाय उर्ध्ववक्त्राय नम: मूर्ध्नि।
(Mouth) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हैं तत्पुरुषाय पूर्ववक्त्राय नम: मुखे।
(Right-ear) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हुं अघोराय दक्षिणवक्त्राय नम: दक्षकर्णे।
(Left-ear) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हिं वामदेवाय उत्तरवक्त्राय नम: वामकर्णे।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हं सद्योजाताय पश्चिमवक्त्राय नम: चोरकूपे।
॥ध्यानम्॥
पञ्चवक्त्रं चतुर्बाहुं सर्वाभरणभूषिताम्। चन्द्रसूर्यसहस्त्राभं शिवशक्त्ययात्मकं भजे॥
॥प्रपञ्चन्यास:॥
(Head) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: अं प्रपञ्चरूपायै श्रियै नम: शिरसि।
(Mouth) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: आं द्वीपरूपायै मायायै नम: मुखवृते।
(Right-eye) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: इं जलधिरूपायै कमलायै नम: दक्षनेत्रे।
(Left-eye) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ईं गिरिरूपायै विष्णुवल्लभायै नम: वामनेत्रे।
(Right-ear) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: उं पत्तनरूपायै पद्मधारिण्यै नम: दक्षकर्णे।
(Left-ear) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ऊं पीठरूपायै समुद्रतनयायै नम: वामकर्णे।
(Right-nostril) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ऋं क्षेत्ररूपायै लोकमात्रे नम: दक्षनासापुटे।
(Left-nostril) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ॠं वनरूपायै कमलवासिन्यै नम: वामनासापुटे।
(Right-cheek) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ऌं आश्मरूपायै इन्द्रिरायै नम: दक्षगण्डे।
(Left-cheek) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ॡं गुहारूपायै मायायै नम: वामगण्डे।
(Upper-lip) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: एं नदीरूपायै रमायै नम: ऊर्ध्वोष्ठे।
(Lower-lip) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ऐं चत्वाररूपायै पद्मायै नम: अधरोष्ठे।
(Upper-teeth) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ओं उद᳭भिज्जरूपायै नारायण प्रियायै नम: ऊर्ध्वदन्तपंक्तौ।
(Lower-teeth) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: औं स्वेदजरूपायै सिद्धलक्ष्म्यै नम: अधोदन्तपंक्तौ।
(Tongue-tip) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: अं अण्डजरूपायै राजलक्ष्म्यै नम: जिह्वाग्रे।
(Throat) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: अ: जरायुजरूपायै महालक्ष्म्यै नम: कण्ठे।
(Right-arm-root) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: कं लवरूपायै आर्ययै नम: दक्षबाहुमूले।
(Right-elbow) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: खं त्रुटिरूपायै उमायै नम: दक्षकूर्परे।
(Right-wristband) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: गं कलारूपायै चण्डिकायै नम: दक्षमणिबन्धे।
(Right-fingers-root) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: घं काष्ठारूपायै दुर्गायै नम: दक्षकरांगुलिमूले।
(Right-fingers-tip) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ङं निमेषरूपायै शिवायै नम: दक्षकरांगुल्यग्रे।
(Left-arm-root) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: चं श्वासरूपायै अपर्णायै नम: वामबाहुमूले।
(Left-elbow) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: छं घाटिकारूपायै अम्बिकायै नम: वामकर्पूरे।
(Left-wristband) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: जं मुहुर्तरूपायै सत्यै नम: वाममणिबन्धे।
(Left-fingers-root) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: झं प्रहररूपायै ईश्वर्यै नम: वामकरांगुलिमूले।
(Left-fingers-tip) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ञं दिवसरूपायै शाम्भव्यै नम: वामकरांगुल्यग्रे।
(Right-thigh-root) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: टं सन्ध्यारूपायै ईशान्यै नम: दक्षोरूमूले।
(Right-knee) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ठं रात्रिरूपायै पार्वत्यै नम: दक्षजानूनि।
(Right-ankle) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: डं तिथीरूपायै सर्वमङ्गलायै नम: दक्षगुल्फे।
(Right-toes-root) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ढं वाररूपायै दाक्षाण्यै नम: दक्षपादाङ्गुलिमूले।
(Right-toes-tip) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: णं नक्षत्ररूपायै हैमवत्यै नम: दक्षपादांगुल्यग्रे।
(Left-thigh-root) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: तं योगरूपायै महामायायै नम: वामोरूमूले।
(Left-knee) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं थं करणरूपायै महेश्वर्यै नम: वामजानुनि।
(Left-ankle) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: दं पक्षरूपायै मृडान्यै नम: वामगुल्फे।
(Left-toes-root) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: धं मांसरूपायै इन्द्राण्यै नम: वामपादांगुलिमूले।
(Left-toes-tip) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: नं शशिरूपायै सर्वाण्यै नम: वामपादांगुल्यग्रे।
(Right-side) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: पं ऋतुरूपायै परमेश्वर्यै नम: दक्षपार्श्वे।
(Left-side) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: फं अयनरूपायै काल्यै नम: वामपार्श्वे।
(Back) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: बं वत्सररूपायै कात्यायन्यै नम: पृष्ठे।
(Naval) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: भं युगरूपायै गौर्यै नम: नाभौ।
(Stomach) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: मं प्रलयरूपायै भवान्यै नम: जठरे।
(Heart) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: यं पञ्चभूतरूपायै ब्राह्मयै नम: हृदये।
(Right-shoulder) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: रं पञ्चतन्मात्ररूपायै बागिश्वर्यै नम: दक्षस्कन्धे।
(Neck) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: लं पञ्चकर्मेन्द्रियरूपायै वाण्यै नम: गलपृष्ठे-ककुदि।
(Left-shoulder) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: वं पञ्चज्ञानेन्द्रियरूपायै सावित्र्यै नम: वामस्कन्धे।
(Heart-to-Right-fingers-tip) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: शं पञ्चप्राणरूपायै सरस्वत्यै नम: हृदयादि-दक्षकरांगुल्यन्तम्।
(Heart-to-Left-fingers-tip) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: षं गुणत्रयरूपायै गायत्र्यै नम: हृदयादि-वामकरांगुल्यन्तम्।
(Heart-to-Right-toes-tip) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: सं अंतकरण चतुष्टयरूपायै वाक्प्रदायै नम: हृदयादि-दक्षपादांगुल्यन्तम्।
(Heart-to-Left-toes-tip) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हं अवस्था चतुष्टयरूपायै शारदायै नम: हृदयादि-वामपादांगुल्यन्तम्।
(Heart-to-Genital) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ळं सर्वधातुरूपायै भारत्यै नम: हृदयादि-गुह्यान्तम्।
(Heart-to-Crown) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: क्षं दोषत्रयरूपायै विद्यात्मिकायै नम: हृदयादिमूर्धान्तम्।
व्यापक न्यास में किसी भी अंग को स्पर्श किये बिना सर्वांग में मंत्र न्यास करते है।
(Full-body) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं ऌं ॡं एं ऐं ओं औं अं अ: कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं सकल प्रपञ्चाधिदेवतायै शक्त्यम्बादेव्यै नम: स्हौ: ह्सौ: ऐं श्रीं क्लीं ह्रीं ॐ सर्वाङ्गे। इति व्यापकं न्यास कुर्यात्। इति प्रपञ्चन्यास:।
॥भुवनन्यास:॥
(Feet) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: अं आं इं अतललोक-निलय शतकोटि गुह्याद्य योगिनी मूलदेवतायुताधार शक्त्यम्बादेव्यै नम: पादयो:।
(Ankle) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ईं उं ऊं वितललोक निलय शतकोटि गुह्यतरांत योगिनी मूलदेवतायुताधार शक्त्यम्बादेव्यै नम: गुल्फयो:।
(Thighs) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ऋं ॠं ऌं सुतललोक निलय शतकोटि गुह्याचिन्त्य योगिनी मूलदेवतायुताधार शक्त्यम्बादेव्यै नम: जंघयो:।
(Shin-bone) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ॡं एं ऐं महातललोक निलय शतकोटि महागुह्येच्छा योगिनी मूलदेवतायुताधार शक्त्यम्बादेव्यै नम: जान्वो।
(Thighs) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ओं औं तलातललोक निलय शतकोटि परमगुह्येच्छा योगिनी मूलदेवतायुताधार शक्त्यम्बादेव्यै नम: ऊर्वो:।
(Genital) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: अं अ: रसातललोक निलय शतकोटि रहस्यज्ञान योगिनी मूलदेवतायुताधार शक्त्यम्बादेव्यै नम: गुह्ये।
(Root) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं पाताललोक भूर्लोक निलय शतकोटि रहस्यतर क्रिया डाकिनी योगिनी मूलदेवतायुताधार शक्त्यम्बादेव्यै नम: मूलाधारे।
(Bladder) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: टं ठं डं ढं णं भुवर्लोक निलय शतकोटि अतिरहस्य राकिनी योगिनी मूलदेवतायुताधार शक्त्यम्बादेव्यै नम: स्वाधिष्ठाने।
(Naval) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: तं थं दं धं नं स्वर्लोक निलय शतकोटि परमरहस्य लाकिनी योगिनी मूलदेवतायुताधार शक्त्यम्बादेव्यै नम: मणिपूरे।
(Heart) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: पं फं बं भं मं महर्लोक निलय शतकोटि गुप्त काकिनी योगिनी मूलदेवतायुताधार शक्त्यम्बादेव्यै नम: अनाहते।
(Throat) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: यं रं लं वं जन: लोक निलय शतकोटि गुप्ततर साकिनी योगिनी मूलदेवतायुताधार शक्त्यम्बादेव्यै नम: विशुद्धौ।
(Third-eye) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: शं षं सं हं तपोलोक निलय शतकोटि अतिगुप्त हाकिनी योगिनी मूलदेवतायुताधार शक्त्यम्बादेव्यै नम: आज्ञायाम्।
(Crown) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ळं क्षं सत्यलोक निलय शतकोटि महागुप्त याकिनी योगिनी मूलदेवतायुताधार शक्त्यम्बादेव्यै नम: ब्रह्मरन्ध्रे।
व्यापक न्यास में किसी भी अंग को स्पर्श किये बिना सर्वांग में मंत्र न्यास करते है।
(Full-body) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं ऌं ॡं एं ऐं ओं औं अं अ: कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं
सकलभुवाधिपतायै मूलदेवतायुताधार शक्त्यम्बादेव्यै नम: स्हौ: ह्सौ: ऐं श्रीं क्लीं ह्रीं ॐ सर्वाङ्गे। इति व्यापकं कुर्यात्। इति भुवनन्यास:।
॥मूर्तिन्यास:॥
(Head-शिरसि) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: अं केशवाय-अक्षर-शक्त्यै नम:।
(Mouth-मुखे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: आं नारायणाय-आद्य-शक्त्यै नम:।
(Right-hand-दक्षिणांसे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: इं माधवाय-इष्टदायै नम:।
(Left-hand-वामांसे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ईं गोविन्दाय-ईशान्यै नम:।
(Right-side-दक्षपार्श्वे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: उं विष्णवे उग्रायै नम:।
(Left-side-वामपार्श्वे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ऊं मधुसूदनाय-उर्ध्वनयनायै नम:।
(Right-waist-दक्षकट्यां) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ऋं त्रिविक्रमाय ऋध्यै नम:।
(Left-waist-वामकट्यां) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ॠं वामनाय रूपिण्यै नम:।
(Right-thigh-bone-दक्ष-उरु) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ऌं श्रीधराय लुप्तायै नम:।
(Left-thigh-bone-वाम-उरु) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ॡं हृषीकेशाय लूनदोषायै नम:।
(Right-knee-दक्षजानुनि) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: एं पद्मनाभायै कनायिकायै नम:।
(Left-knee-वामजानुनि) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ऐं दामोदराय कारिण्यै नम:।
(Right-thigh-दक्षजंघायां) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ओं वासुदेवाय उघवत्यै नम:।
(Left-thigh-वामजंघायां) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: औं सङ्कर्षणायौर्वकामायै नम:।
(Right-foot-दक्षपादे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: अं प्रद्युम्नाय-अञ्ञनप्रभायै नम:।
(Left-foot-वामपादे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: अ: अनिरूद्धाय-अस्थिमालाधरायै नम:।
(Right-foot-toes-tips-to-root-of-right-thigh-bone-दक्षपादाग्रादूरूमूलपर्यन्तम्) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: कं भं भवाय कराभायै नम:।
(Left-foot-toes-tips-to-root-of-left-thigh-bone-वामपादाग्रादूरूमूलपर्यन्तम्) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: खं वं शर्वाय खगलबायै नम:।
(Right-side-दक्षपार्श्वे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: गं फं हराय गरिमफलप्रदायै नम:।
(Right-side-वामपार्श्वे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: घं पं पशुपतये घोर पादायौ नम:।
(Right-side-uterus-दक्षदोर्मूले) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ङं मं उग्राय पंक्तिवासायै नम:।
(Left-side-uterus-वामदोर्मूले) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: चं धं महादेवाय चन्द्रार्धधारिण्यै नम:।
(Throat) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: छं दं भीमाय छन्दोमय्यै नम:।
(Face-वदने) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: जं थं ईशानाय जगत्स्थानायै नम:।
(Right-ear-दक्षकर्णे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: झं तं तत्पुरुषाय झंकृत्यै नम:।
(Left-ear-वामकर्णे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ञं णं अघोराय ज्ञानदायै नम:।
(Forehead-भाले) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: टं ढं सद्योजाताय टंकढक्कधरायै नम:।
(Head-शिरसि) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ठं डं वामदेवाय टं कृतिडामर्यै नम:।
(Root-मूलाधारे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: यं ब्रह्मणे यक्षिण्यै नम:।
(Bladder-स्वाधिष्ठाने) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: रं प्रजापतये रञ्ञिण्यै नम:।
(Naval-मणिपूरके) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: लं वेधसे लक्ष्म्यै नम:।
(Heart-अनाहते) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: वं परमेष्ठिने वज्रिण्यै नम:।
(Throat-विशुद्धौ) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: शं पितामह शशिधरायै नम:।
(Third-eye-आज्ञायां) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: षं विधात्रे षडाधारालयायै नम:।
(Crown-अर्धेन्दौ) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: सं पिरञ्चये सर्वनायिकायै नम:।
(Crown-रोधिन्यां) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हं स्त्रष्ट्रे हसिताननायै नम:।
(Crown-नादे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ळं चतुराननाय ललितायै नम:।
(Crown-नादान्ते) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: क्षं हिरण्यगर्भाय क्षमायै नम:।
इति विन्यस्य।
व्यापक न्यास में किसी भी अंग को स्पर्श किये बिना सर्वांग में मंत्र न्यास करते है।
(Full-body) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं ऌं ॡं एं ऐं ओं औं अं अ: कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं सकलत्रिमूर्तर्त्यात्मिकायै शक्त्यम्बादेव्यै नम: स्हौ: ह्सौ: ऐं श्रीं क्लीं ह्रीं ॐ सर्वाङ्गे। इति व्यापकं न्यास कुर्यात्। इति मूर्तिन्यास:।
॥मंत्रन्यास:॥
(Root-मूलाधारे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: अं आं इं एकलक्षकोटिभेद प्रणवाद्येकाक्षरात्मक-अखिल मंत्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै एककूटेश्वर्यम्बादेव्यै नम:।
(Bladder-स्वाधिष्ठाने) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ईं उं ऊं द्विलक्षकोटिभेद संसादिद्विक्षरात्मक-अखिल मंत्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै द्विकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नम:।
(Naval-मणिपूरके) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ऋं ॠं ऌं त्रिलक्षकोटिभेद वह्न्यादित्र्यक्षरात्मक-अखिल मंत्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै त्रिकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नम:।
(Heart-अनाहते) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ॡं एं ऐं चतुर्लक्षकोटिभेद चन्द्रादिचतुरक्षरात्मक-अखिल मंत्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै चतुष्कूटेश्वर्यम्बादेव्यै नम:।
(Throat-विशुद्धे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ओं औं अं अ: पञ्चलक्षकोटिभेद सृयोदिपञ्चाक्षरात्मक-अखिल मंत्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै पञ्चकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नम:।
(Third-eye-आज्ञायां) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: कं खं गं षड᳭लक्षकोटिभेद सूर्यादि षटाक्षरात्मक-अखिल मंत्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै षट᳭कूटेश्वर्यम्बादेव्यै नम:।
(Crown-बिन्दु) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: घं ङं चं सप्तलक्षकोटिभेद गणपत्यादि सप्ताक्षरात्मक-अखिल मंत्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै सप्तकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नम:।
(Crown-अर्धेन्दु) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: छं जं झं अष्टलक्षकोटिभेद बटुकाद्य् अष्टाक्षरात्मक-अखिल मंत्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै अष्टकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नम:।
(Crown-रोधिनी) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ञं टं ठं नवलक्षकोटिभेद ब्रह्मादि नवाक्षरात्मक-अखिल मंत्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै नवकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नम:।
(Crown-नाद) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: डं ढं णं दक्षकलक्षकोटिभेद विष्णवादि दशक्षरात्मक-अखिल मंत्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै दशकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नम:।
(Crown-नादान्त) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: तं थं दं एकादशलक्षकोटिभेद रुद्राद्य् एकादशाक्षरात्मक-अखिल मंत्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै एकादशकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नम:।
(Crown-शक्ति-कौण्डिली) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: धं नं पं द्वादशलक्षकोटिभेद वाण्यादि द्वादशाक्षरात्मक-अखिल मंत्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै द्वादशकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नम:।
(Crown-व्यापिनी) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: फं बं भं त्रयोदशलक्षकोटिभेद लक्ष्म्यादि त्रयोदशाक्षरात्मक-अखिल मंत्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै त्रयोदशकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नम:।
(Crown-समना) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: मं यं रं चतुर्दशलक्षकोटिभेद गौर्यादि चतुर्दशाक्षरात्मक-अखिल मंत्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै चतुर्दशकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नम:।
(Crown-उन्मनी) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: लं वं शं पञ्चलक्षकोटिभेद दुर्गादि पञ्चदशाक्षरात्मक-अखिल मंत्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै पञ्चदशकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नम:।
(Crown-ध्रुवमण्डल) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: षं सं हं ळं क्षं षोड᳭शलक्षकोटिभेद त्रिपुरादिषोड᳭शाक्षरात्मक-अखिल मंत्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै षोड᳭शकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नम:।
व्यापक न्यास में किसी भी अंग को स्पर्श किये बिना सर्वांग में मंत्र न्यास करते है।
(Full-body) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं ऌं ॡं एं ऐं ओं औं अं अ: कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं सकलमंत्राधिदेवतायै शक्त्यम्बादेव्यै नम: स्हौ: ह्सौ: ऐं श्रीं क्लीं ह्रीं ॐ सर्वाङ्गे। इति व्यापकं न्यास कुर्यात्। इति मन्त्रन्यास:।
॥देवतान्यास:॥
(Right-foot-दक्षपादे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: अं आं सहस्त्रकोटि ऋषिकुल सेवितायै निवृत्यम्बादेव्यै नम:।
(Left-foot-वामपादे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: इं ईं सहस्त्रकोटि योगिनीकुल सेवितायै प्रतिष्ठाम्बादेव्यै नम:।
(Right-ankle-दक्षगुल्फे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: उं ऊं सहस्त्रकोटि तपस्विकुल सेवितायै विद्याम्बादेव्यै नम:।
(Left-ankle-वामगुल्फे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ऋं ॠं सहस्त्रकोटि शान्तकुल सेवितायै शान्ताम्बादेव्यै नम:।
(Right-thigh-दक्षजंघायां) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ऌं ॡं सहस्त्रकोटि मुनिकुल सेवितायै शान्त्यतीताम्बादेव्यै नम:।
(Left-thigh-वामजंघायां) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: एं ऐं सहस्त्रकोटि देवताकुल सेवितायै हृल्लेखाम्बादेव्यै नम:।
(Right-knee-दक्षजानुनि) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ओं औं सहस्त्रकोटि राक्षसकुल सेवितायै गगनाम्बादेव्यै नम:।
(Left-knee-वामजानुनि) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: अं अ: सहस्त्रकोटि विद्याधरकुल सेवितायै रक्तम्बादेव्यै नम:।
(Right-thigh-bone-दक्ष-उरु) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: कं खं सहस्त्रकोटि सिद्धकुल सेवितायै महोच्छुष्माम्बादेव्यै नम:।
(Left-thigh-bone-वाम-उरु) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: गं घं सहस्त्रकोटि साध्यकुल सेवितायै करालिकाम्बादेव्यै नम:।
(Root-of-right-thigh-bone-pelvis-bone-दक्ष-उरु-मूले) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: ङं चं सहस्त्रकोटि अप्सर:कुल सेवितायै जयाम्बादेव्यै नम:।
(Root-of-left-thigh-bone-pelvis-bone-वाम-उरु-मूले) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: छं जं सहस्त्रकोटि गन्धर्वकुल सेवितायै विजयाम्बादेव्यै नम:।
(Right-side-दक्षपार्श्वे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: झं ञं सहस्त्रकोटि गुह्यककुल सेवितायै अजिताम्बादेव्यै नम:।
(Left-side-वामपार्श्वे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: टं ठं सहस्त्रकोटि यक्षकुल सेवितायै अपराजिताम्बादेव्यै नम:।
(Right-breast-दक्षस्तने) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: डं ढं सहस्त्रकोटि किन्नरकुल सेवितायै वामाम्बादेव्यै नम:।
(Left-breast-वामस्तने) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: णं तं सहस्त्रकोटि पन्नगकुल सेवितायै ज्येष्ठाम्बादेव्यै नम:।
(Right-side-uterus-दक्षदोर्मूले) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: थं दं सहस्त्रकोटि पितृकुल सेवितायै रौद्राम्बादेव्यै नम:।
(Left-side-uterus-वामदोर्मूले) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: धं नं सहस्त्रकोटि गणेश्वरकुल सेवितायै छायाम्बादेव्यै नम:।
(Right-arm-दक्षभुजे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: पं फं सहस्त्रकोटि भैरवकुल सेवितायै कुण्डलिन्यम्बादेव्यै नम:।
(Left-arm-वामभुजे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: बं भं सहस्त्रकोटि वटुककुल सेवितायै काल्यम्बादेव्यै नम:।
(Right-hand-दक्षांसे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: मं यं सहस्त्रकोटि क्षेत्रेशकुल सेवितायै कालरात्र्यम्बादेव्यै नम:।
(Left-hand-वामांसे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: रं लं सहस्त्रकोटि प्रथमकुल सेवितायै भगवत्यम्बादेव्यै नम:।
(Right-ear-दक्षकर्णे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: वं शं सहस्त्रकोटि ब्रह्मकुल सेवितायै सर्वेश्वर्यम्बादेव्यै नम:।
(Left-ear-वामकर्णे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: षं सं सहस्त्रकोटि विष्णुकुल सेवितायै सर्वज्ञात्र्यम्बादेव्यै नम:।
(Forehead-भाले) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: हं ळं सहस्त्रकोटि रुद्रकुल सेवितायै सर्वकत्र्यम्बादेव्यै नम:।
(Crown-ब्रह्मरन्ध्रे) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: क्षं सहस्त्रकोटि चराचरकुल सेवितायै कुलशक्त्यम्बादेव्यै नम:।
व्यापक न्यास में किसी भी अंग को स्पर्श किये बिना सर्वांग में मंत्र न्यास करते है।
(Full-body) ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं ह्सौ: स्हौ: अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं ऌं ॡं एं ऐं ओं औं अं अ: कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं समस्त देवताधिपायै शक्त्यम्बादेव्यै नम: स्हौ: ह्सौ: ऐं श्रीं क्लीं ह्रीं ॐ। इति व्यापकं कुर्यात्। इति देवतान्यास:।
इति महाषोढान्यास:॥
॥श्रीदुर्गासप्तशती - प्रथमोऽध्यायः॥
मेधा ऋषि का राजा सुरथ और समाधि को भगवती की महिमा बताते हुए मधु-कैटभ-वध का प्रसंग सुनाना।
॥विनियोगः॥
ॐ प्रथमचरित्रस्य
ब्रह्मा ऋषिः
महाकाली देवता
गायत्री छन्दः
नन्दा शक्तिः
रक्तदन्तिका बीजम्
अग्निस्तत्त्वम्
ऋग्वेदः स्वरूपम्
श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे प्रथमचरित्रजपे विनियोगः।
॥ध्यानम्॥
ॐ खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥१॥
ॐ नमश्चण्डिकायै
"ॐ ऐं" मार्कण्डेय उवाच॥१॥
सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः। निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद् गदतो मम॥२॥
महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः। स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः॥३॥
स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः। सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले॥४॥
तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान्। बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा॥५॥
तस्य तैरभवद् युद्धमतिप्रबलदण्डिनः। न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः॥६॥
ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत्। आक्रान्तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः॥७॥
अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः। कोशो बलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः॥८॥
ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः। एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम्॥९॥
स तत्राश्रममद्राक्षीद् द्विजवर्यस्य मेधसः। प्रशान्तश्वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम्॥१०॥
तस्थौ कंचित्स कालं च मुनिना तेन सत्कृतः। इतश्चेतश्च विचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे॥११॥
सोऽचिन्तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्टचेतनः। मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत्॥१२॥
मद्भृत्यैस्तैरसद्वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा। न जाने स प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः॥१३॥
मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते। ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः॥१४॥
अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम्। असम्यग्व्यशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततं व्ययम्॥१५॥
संचितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति। एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः॥१६॥
तत्र विप्राश्रमाभ्याशे वैश्यमेकं ददर्श सः। स पृष्टस्तेन कस्त्वं भो हेतुश्चागमनेऽत्र कः॥१७॥
सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे। इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम्॥१८॥
प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम्॥१९॥
वैश्य उवाच॥२०॥
समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले॥२१॥
पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः। विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम्॥२२॥
वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः। सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम्॥२३॥
प्रवृत्तिं स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः। किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम्॥२४॥
कथं ते किं नु सद्वृत्ता दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः॥२५॥
राजोवाच॥२६॥
यैर्निरस्तो भवाँल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः॥२७॥
तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम्॥२८॥
वैश्य उवाच॥२९॥
एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वचः॥३०॥
किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः। यैः संत्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः॥३१॥
पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः। किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते॥३२॥
यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु। तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते॥३३॥
करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम्॥३४॥
मार्कण्डेय उवाच॥३५॥
ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ॥३६॥
समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः। कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्हं तेन संविदम्॥३७॥
उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ॥३८॥
राजोवाच॥३९॥
भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत्॥४०॥
दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना। ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि॥४१॥
जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम। अयं च निकृतः पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः॥४२॥
स्वजनेन च संत्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति। एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ॥४३॥
दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ। तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि॥४४॥
ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता॥४५॥
ऋषिरुवाच॥४६॥
ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे॥४७॥
विषयश्च महाभागयाति चैवं पृथक् पृथक्। दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे॥४८॥
केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः। ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम्॥४९॥
यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः। ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम्॥५०॥
मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः। ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु॥५१॥
कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा। मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति॥५२॥
लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं न पश्यसि। तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः॥५३॥
महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणा। तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः॥५४॥
महामाया हरेश्चैषा तया सम्मोह्यते जगत्। ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥५५॥
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति। तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम्॥५६॥
सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये। सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी॥५७॥
संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी॥५८॥
राजोवाच॥५९॥
भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान्॥६०॥
ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कर्मास्याश्च किं द्विज। यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा॥६१॥
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर॥६२॥
ऋषिरुवाच॥६३॥
नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम्॥६४॥
तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम। देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा॥६५॥
उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते। योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते॥६६॥
आस्तीर्य शेषमभजत्कल्पान्ते भगवान् प्रभुः। तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ॥६७॥
विष्णुकर्णमलोद्भूतो हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ। स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः॥६८॥
दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम्। तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः॥६९॥
विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम्। विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्॥७०॥
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः॥७१॥
ब्रह्मोवाच॥७२॥
त्वं स्वाहा त्वं स्वधां त्वं हि वषट्कारःस्वरात्मिका॥७३॥
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता। अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः॥७४॥
त्वमेव संध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा। त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत्॥७५॥
त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा। विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने॥७६॥
तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये। महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः॥७७॥
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी। प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी॥७८॥
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा। त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा॥७९॥
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च। खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा॥८०॥
शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा। सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी॥८१॥
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी। यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके॥८२॥
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा। यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत्॥८३॥
सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः। विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च॥८४॥
कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत्। सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता॥८५॥
मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ। प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु॥८६॥
बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ॥८७॥
ऋषिरुवाच॥८८॥
एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा॥८९॥
विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ। नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः॥९०॥
निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः। उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः॥९१॥
एकार्णवेऽहिशयनात्ततः स ददृशे च तौ। मधुकैटभो दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ॥९२॥
क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ। समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः॥९३॥
पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुप्रहरणो विभुः। तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ॥९४॥
उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम्॥९५॥
श्रीभगवानुवाच॥९६॥
भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि॥९७॥
किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मम॥९८॥
ऋषिरुवाच॥९९॥
वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत्॥१००॥
विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः। आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता॥१०१॥
ऋषिरुवाच॥१०२॥
तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता। कृत्वा चक्रेण वै च्छिन्ने जघने शिरसी तयोः॥१०३॥
एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम्। प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः श्रृणु वदामि ते॥ ऐं ॐ॥१०४॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये मधुकैटभवधो नाम प्रथमोऽध्यायः॥१॥
उवाच १४, अर्धश्लोकाः २४, श्लोकाः ६६, एवमादितः॥१०४॥
॥श्रीदुर्गासप्तशती - द्वितीयोऽध्यायः॥
देवताओं के तेज से देवी का प्रादुर्भाव और महिषासुर की सेना का वध।
॥विनियोगः॥
ॐ मध्यमचरित्रस्य
विष्णुर्ऋषिः
महालक्ष्मीर्देवता
उष्णिक् छन्दः
शाकम्भरी शक्तिः
दुर्गा बीजम्
वायुस्तत्त्वम्
यजुर्वेदः स्वरूपम्
श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थं मध्यमचरित्रजपे विनियोगः।
॥ध्यानम्॥
ॐ अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥
"ॐ ह्रीं" ऋषिरुवाच॥१॥
देवासुरमभूद्युद्धं पूर्णमब्दशतं पुरा। महिषेऽसुराणामधिपे देवानां च पुरन्दरे॥२॥
तत्रासुरैर्महावीर्यैर्देवसैन्यं पराजितम्। जित्वा च सकलान् देवानिन्द्रोऽभून्महिषासुरः॥३॥
ततः पराजिता देवाः पद्मयोनिं प्रजापतिम्। पुरस्कृत्य गतास्तत्र यत्रेशगरुडध्वजौ॥४॥
यथावृत्तं तयोस्तद्वन्महिषासुरचेष्टितम्। त्रिदशाः कथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम्॥५॥
सूर्येन्द्राग्न्यनिलेन्दूनां यमस्य वरुणस्य च। अन्येषां चाधिकारान् स स्वयमेवाधितिष्ठति॥६॥
स्वर्गान्निराकृताः सर्वे तेन देवगणा भुवि। विचरन्ति यथा मर्त्या महिषेण दुरात्मना॥७॥
एतद्वः कथितं सर्वममरारिविचेष्टितम्। शरणं वः प्रपन्नाः स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम्॥८॥
इत्थं निशम्य देवानां वचांसि मधुसूदनः। चकार कोपं शम्भुश्च भ्रुकुटीकुटिलाननौ॥९॥
ततोऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्ततः। निश्चक्राम महत्तेजो ब्रह्मणः शंकरस्य च॥१०॥
अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः। निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत॥११॥
अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम्। ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम्॥१२॥
अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम्। एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा॥१३॥
यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजायत तन्मुखम्। याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा॥१४॥
सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत्। वारुणेन च जङ्घोरू नितम्बस्तेजसा भुवः॥१५॥
ब्रह्मणस्तेजसा पादौ तदङ्गुल्योऽर्कतेजसा। वसूनां च कराङ्गुल्यः कौबेरेण च नासिका॥१६॥
तस्यास्तु दन्ताः सम्भूताः प्राजापत्येन तेजसा। नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा॥१७॥
भ्रुवौ च संध्ययोस्तेजः श्रवणावनिलस्य च। अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा॥१८॥
ततः समस्तदेवानां तेजोराशिसमुद्भवाम्। तां विलोक्य मुदं प्रापुरमरा महिषार्दिताः॥१९॥
शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य ददौ तस्यै पिनाकधृक्। चक्रं च दत्तवान् कृष्णः समुत्पाद्य स्वचक्रतः॥२०॥
शङ्खं च वरुणः शक्तिं ददौ तस्यै हुताशनः। मारुतो दत्तवांश्चापं बाणपूर्णे तथेषुधी॥२१॥
वज्रमिन्द्रः समुत्पाद्य कुलिशादमराधिपः। ददौ तस्यै सहस्राक्षो घण्टामैरावताद् गजात्॥२२॥
कालदण्डाद्यमो दण्डं पाशं चाम्बुपतिर्ददौ। प्रजापतिश्चाक्षमालां ददौ ब्रह्मा कमण्डलुम्॥२३॥
समस्तरोमकूपेषु निजरश्मीन् दिवाकरः। कालश्च दत्तवान् खड्गं तस्याश्चर्म च निर्मलम्॥२४॥
क्षीरोदश्चामलं हारमजरे च तथाम्बरे। चूडामणिं तथा दिव्यं कुण्डले कटकानि च॥२५॥
अर्धचन्द्रं तथा शुभ्रं केयूरान् सर्वबाहुषु। नूपुरौ विमलौ तद्वद् ग्रैवेयकमनुत्तमम्॥२६॥
अङ्गुलीयकरत्नानि समस्तास्वङ्गुलीषु च। विश्वकर्मा ददौ तस्यै परशुं चातिनिर्मलम्॥२७॥
अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यं च दंशनम्। अम्लानपङ्कजां मालां शिरस्युरसि चापराम्॥२८॥
अददज्जलधिस्तस्यै पङ्कजं चातिशोभनम्। हिमवान् वाहनं सिंहं रत्नानि विविधानि च॥२९॥
ददावशून्यं सुरया पानपात्रं धनाधिपः। शेषश्च सर्वनागेशो महामणिविभूषितम्॥३०॥
नागहारं ददौ तस्यै धत्ते यः पृथिवीमिमाम्॥ अन्यैरपि सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा॥३१॥
सम्मानिता ननादोच्चैः साट्टहासं मुहुर्मुहुः। तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नभः॥३२॥
अमायतातिमहता प्रतिशब्दो महानभूत्। चुक्षुभुः सकला लोकाः समुद्राश्च चकम्पिरे॥३३॥
चचाल वसुधा चेलुः सकलाश्च महीधराः। जयेति देवाश्च मुदा तामूचुः सिंहवाहिनीम्॥३४॥
तुष्टुवुर्मुनयश्चैनां भक्तिनम्रात्ममूर्तयः। दृष्ट्वा समस्तं संक्षुब्धं त्रैलोक्यममरारयः॥३५॥
सन्नद्धाखिलसैन्यास्ते समुत्तस्थुरुदायुधाः। आः किमेतदिति क्रोधादाभाष्य महिषासुरः॥३६॥
अभ्यधावत तं शब्दमशेषैरसुरैर्वृतः। स ददर्श ततो देवीं व्याप्तलोकत्रयां त्विषा॥३७॥
पादाक्रान्त्या नतभुवं किरीटोल्लिखिताम्बराम्। क्षोभिताशेषपातालां धनुर्ज्यानिःस्वनेन ताम्॥३८॥
दिशो भुजसहस्रेण समन्ताद् व्याप्य संस्थिताम्। ततः प्रववृते युद्धं तया देव्या सुरद्विषाम्॥३९॥
शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम्। महिषासुरसेनानीश्चिक्षुराख्यो महासुरः॥४०॥
युयुधे चामरश्चान्यैश्चतुरङ्गबलान्वितः। रथानामयुतैः षड्भिरुदग्राख्यो महासुरः॥४१॥
अयुध्यतायुतानां च सहस्रेण महाहनुः। पञ्चाशद्भिश्च नियुतैरसिलोमा महासुरः॥४२॥
अयुतानां शतैः षड्भिर्बाष्कलो युयुधे रणे। गजवाजिसहस्रौघैरनेकैः परिवारितः॥४३॥
वृतो रथानां कोट्या च युद्धे तस्मिन्नयुध्यत। बिडालाख्योऽयुतानां च पञ्चाशद्भिरथायुतैः॥४४॥
युयुधे संयुगे तत्र रथानां परिवारितः। अन्ये च तत्रायुतशो रथनागहयैर्वृताः॥४५॥
युयुधुः संयुगे देव्या सह तत्र महासुराः। कोटिकोटिसहस्रैस्तु रथानां दन्तिनां तथा॥४६॥
हयानां च वृतो युद्धे तत्राभून्महिषासुरः। तोमरैर्भिन्दिपालैश्च शक्तिभिर्मुसलैस्तथा॥४७॥
युयुधुः संयुगे देव्या खड्गैः परशुपट्टिशैः। केचिच्च चिक्षिपुः शक्तीः केचित्पाशांस्तथापरे॥४८॥
देवीं खड्गप्रहारैस्तु ते तां हन्तुं प्रचक्रमुः। सापि देवी ततस्तानि शस्त्राण्यस्त्राणि चण्डिका॥४९॥
लीलयैव प्रचिच्छेद निजशस्त्रास्त्रवर्षिणी। अनायस्तानना देवी स्तूयमाना सुरर्षिभिः॥५०॥
मुमोचासुरदेहेषु शस्त्राण्यस्त्राणि चेश्वरी। सोऽपि क्रुद्धो धुतसटो देव्या वाहनकेशरी॥५१॥
चचारासुरसैन्येषु वनेष्विव हुताशनः। निःश्वासान् मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका॥५२॥
त एव सद्यः सम्भूता गणाः शतसहस्रशः। युयुधुस्ते परशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशैः॥५३॥
नाशयन्तोऽसुरगणान् देवीशक्त्युपबृंहिताः। अवादयन्त पटहान् गणाः शङ्खांस्तथापरे॥५४॥
मृदङ्गांश्च तथैवान्ये तस्मिन् युद्धमहोत्सवे। ततो देवी त्रिशूलेन गदया शक्तिवृष्टिभिः॥५५॥
खड्गादिभिश्च शतशो निजघान महासुरान्। पातयामास चैवान्यान् घण्टास्वनविमोहितान्॥५६॥
असुरान् भुवि पाशेन बद्ध्वा चान्यानकर्षयत्। केचिद् द्विधा कृतास्तीक्ष्णैः खड्गपातैस्तथापरे॥५७॥
विपोथिता निपातेन गदया भुवि शेरते। वेमुश्च केचिद्रुधिरं मुसलेन भृशं हताः॥५८॥
केचिन्निपतिता भूमौ भिन्नाः शूलेन वक्षसि। निरन्तराः शरौघेण कृताः केचिद्रणाजिरे॥५९॥
श्येनानुकारिणः प्राणान् मुमुचुस्त्रिदशार्दनाः। केषांचिद् बाहवश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे॥६०॥
शिरांसि पेतुरन्येषामन्ये मध्ये विदारिताः। विच्छिन्नजङ्घास्त्वपरे पेतुरुर्व्यां महासुराः॥६१॥
एकबाह्वक्षिचरणाः केचिद्देव्या द्विधा कृताः। छिन्नेऽपि चान्ये शिरसि पतिताः पुनरुत्थिताः॥६२॥
कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधाः। ननृतुश्चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिताः॥६३॥
कबन्धाश्छिन्नशिरसः खड्गशक्त्यृष्टिपाणयः। तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो देवीमन्ये महासुराः॥६४॥
पातितै रथनागाश्वैरसुरैश्च वसुन्धरा। अगम्या साभवत्तत्र यत्राभूत्स महारणः॥६५॥
शोणितौघा महानद्यः सद्यस्तत्र प्रसुस्रुवुः। मध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम्॥६६॥
क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका। निन्ये क्षयं यथा वह्निस्तृणदारुमहाचयम्॥६७॥
स च सिंहो महानादमुत्सृजन्धुतकेसरः। शरीरेभ्योऽमरारीणामसूनिव विचिन्वति॥६८॥
देव्या गणैश्च तैस्तत्र कृतं युद्धं महासुरैः। यथैषां तुतुषुर्देवाः पुष्पवृष्टिमुचो दिवि॥ॐ॥६९॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये महिषासुरसैन्यवधो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥
उवाच १, श्लोकाः ६८, एवम् ६९, एवमादितः॥१७३॥
॥श्रीदुर्गासप्तशती - तृतीयोऽध्यायः॥
सेनापतियोंसहित महिषासुर का वध।
॥ध्यानम्॥
ॐ उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां
रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम्।
हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं
देवीं बद्धहिमांशुरत्नमुकुटां वन्देऽरविन्दस्थिताम्॥
"ॐ" ऋषिररुवाच॥१॥
निहन्यमानं तत्सैन्यमवलोक्य महासुरः। सेनानीश्चिक्षुरः कोपाद्ययौ योद्धुमथाम्बिकाम्॥२॥
स देवीं शरवर्षेण ववर्ष समरेऽसुरः। यथा मेरुगिरेः श्रृङ्गं तोयवर्षेण तोयदः॥३॥
तस्यच्छित्त्वा ततो देवी लीलयैव शरोत्करान्। जघान तुरगान् बाणैर्यन्तारं चैव वाजिनाम्॥४॥
चिच्छेद च धनुः सद्यो ध्वजं चातिसमुच्छ्रितम्। विव्याध चैव गात्रेषु छिन्नधन्वानमाशुगैः॥५॥
सच्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः। अभ्यधावत तां देवीं खड्गचर्मधरोऽसुरः॥६॥
सिंहमाहत्य खड्गेन तीक्ष्णधारेण मूर्धनि। आजघान भुजे सव्ये देवीमप्यतिवेगवान्॥७॥
तस्याः खड्गो भुजं प्राप्य पफाल नृपनन्दन। ततो जग्राह शूलं स कोपादरुणलोचनः॥८॥
चिक्षेप च ततस्तत्तु भद्रकाल्यां महासुरः। जाज्वल्यमानं तेजोभी रविबिम्बमिवाम्बरात्॥९॥
दृष्ट्वा तदापतच्छूलं देवी शूलममुञ्चत। तच्छूलं शतधा तेन नीतं स च महासुरः॥१०॥
हते तस्मिन्महावीर्ये महिषस्य चमूपतौ। आजगाम गजारूढश्चामरस्त्रिदशार्दनः॥११॥
सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ देव्यास्तामम्बिका द्रुतम्। हुंकाराभिहतां भूमौ पातयामास निष्प्रभाम्॥१२॥
भग्नां शक्तिं निपतितां दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः। चिक्षेप चामरः शूलं बाणैस्तदपि साच्छिनत्॥१३॥
ततः सिंहः समुत्पत्य गजकुम्भान्तरे स्थितः। बाहुयुद्धेन युयुधे तेनोच्चैस्त्रिदशारिणा॥१४॥
युद्ध्यमानौ ततस्तौ तु तस्मान्नागान्महीं गतौ। युयुधातेऽतिसंरब्धौ प्रहारैरतिदारुणैः॥१५॥
ततो वेगात् खमुत्पत्य निपत्य च मृगारिणा। करप्रहारेण शिरश्चामरस्य पृथक्कृतम्॥१६॥
उदग्रश्च रणे देव्या शिलावृक्षादिभिर्हतः। दन्तमुष्टितलैश्चैव करालश्च निपातितः॥१७॥
देवी क्रुद्धा गदापातैश्चूर्णयामास चोद्धतम्। वाष्कलं भिन्दिपालेन बाणैस्ताम्रं तथान्धकम्॥१८॥
उग्रास्यमुग्रवीर्यं च तथैव च महाहनुम्। त्रिनेत्रा च त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी॥१९॥
बिडालस्यासिना कायात्पातयामास वै शिरः। दुर्धरं दुर्मुखं चोभौ शरैर्निन्ये यमक्षयम्॥२०॥
एवं संक्षीयमाणे तु स्वसैन्ये महिषासुरः। माहिषेण स्वरूपेण त्रासयामास तान् गणान्॥२१॥
कांश्चित्तुण्डप्रहारेण खुरक्षेपैस्तथापरान्। लाङ्गूलताडितांश्चान्याञ्छृङ्गाभ्यां च विदारितान्॥२२॥
वेगेन कांश्चिदपरान्नादेन भ्रमणेन च। निःश्वासपवनेनान्यान् पातयामास भूतले॥२३॥
निपात्य प्रमथानीकमभ्यधावत सोऽसुरः। सिंहं हन्तुं महादेव्याः कोपं चक्रे ततोऽम्बिका॥२४॥
सोऽपि कोपान्महावीर्यः खुरक्षुण्णमहीतलः। श्रृङ्गाभ्यां पर्वतानुच्चांश्चिक्षेप च ननाद च॥२५॥
वेगभ्रमणविक्षुण्णा मही तस्य व्यशीर्यत। लाङ्गूलेनाहतश्चाब्धिः प्लावयामास सर्वतः॥२६॥
धुतश्रृङ्गविभिन्नाश्च खण्डं खण्डं ययुर्घनाः। श्वासानिलास्ताः शतशो निपेतुर्नभसोऽचलाः॥२७॥
इति क्रोधसमाध्मातमापतन्तं महासुरम्। दृष्ट्वा सा चण्डिका कोपं तद्वधाय तदाकरोत्॥२८॥
सा क्षिप्त्वा तस्य वै पाशं तं बबन्ध महासुरम्। तत्याज माहिषं रूपं सोऽपि बद्धो महामृधे॥२९॥
ततः सिंहोऽभवत्सद्यो यावत्तस्याम्बिका शिरः। छिनत्ति तावत्पुरुषः खड्गपाणिरदृश्यत॥३०॥
तत एवाशु पुरुषं देवी चिच्छेद सायकैः। तं खड्गचर्मणा सार्धं ततः सोऽभून्महागजः॥३१॥
करेण च महासिंहं तं चकर्ष जगर्ज च। कर्षतस्तु करं देवी खड्गेन निरकृन्तत॥३२॥
ततो महासुरो भूयो माहिषं वपुरास्थितः। तथैव क्षोभयामास त्रैलोक्यं सचराचरम्॥३३॥
ततः क्रुद्धा जगन्माता चण्डिका पानमुत्तमम्। पपौ पुनः पुनश्चैव जहासारुणलोचना॥३४॥
ननर्द चासुरः सोऽपि बलवीर्यमदोद्धतः। विषाणाभ्यां च चिक्षेप चण्डिकां प्रति भूधरान्॥३५॥
सा च तान् प्रहितांस्तेन चूर्णयन्ती शरोत्करैः। उवाच तं मदोद्धूतमुखरागाकुलाक्षरम्॥३६॥
देव्युवाच॥३७॥
गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम्।
मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः॥३८॥
ऋषिरुवाच॥३९॥
एवमुक्त्वा समुत्पत्य साऽऽरूढा तं महासुरम्। पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत्॥४०॥
ततः सोऽपि पदाऽऽक्रान्तस्तया निजमुखात्ततः। अर्धनिष्क्रान्त एवासीद् देव्या वीर्येण संवृतः॥४१॥
अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः। तया महासिना देव्या शिरश्छित्त्वा निपातितः॥४२॥
ततो हाहाकृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत्। प्रहर्षं च परं जग्मुः सकला देवतागणाः॥४३॥
तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं सह दिव्यैर्महर्षिभिः। जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ॐ॥४४॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये महिषासुरवधो नाम तृतीयोऽध्यायः॥३॥
उवाच ३, श्लोकाः ४१, एवम् ४४, एवमादितः॥२१७॥
॥श्रीदुर्गासप्तशती - चतुर्थोऽध्यायः॥
इन्द्रादि देवताओं द्वारा देवी की स्तुति।
॥ध्यानम्॥
ॐ कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां
शड्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्।
सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं
ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः॥
"ॐ" ऋषिरुवाच॥१॥
शक्रादयः सुरगणा निहतेऽतिवीर्ये तस्मिन्दुरात्मनि सुरारिबले च देव्या। तां तुष्टुवुः प्रणतिनम्रशिरोधरांसा वाग्भिः प्रहर्षपुलकोद्गमचारुदेहाः॥२॥
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥३॥
यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तो ब्रह्मा हरश्च न हि वक्तुमलं बलं च। सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय
नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु॥४॥
या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः। श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम्॥५॥
किं वर्णयाम तव रूपमचिन्त्यमेतत् किं चातिवीर्यमसुरक्षयकारि भूरि। किं चाहवेषु चरितानि तवाद्भुतानि सर्वेषु देव्यसुरदेवगणादिकेषु॥६॥
हेतुः समस्तजगतां त्रिगुणापि दोषैर्न ज्ञायसे हरिहरादिभिरप्यपारा। सर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूत-मव्याकृता हि परमा प्रकृतिस्त्वमाद्या॥७॥
यस्याः समस्तसुरता समुदीरणेन तृप्तिं प्रयाति सकलेषु मखेषु देवि। स्वाहासि वै पितृगणस्य च तृप्तिहेतु-रुच्चार्यसे त्वमत एव जनैः स्वधा च॥८॥
या मुक्तिहेतुरविचिन्त्यमहाव्रता त्व-मभ्यस्यसे सुनियतेन्द्रियतत्त्वसारैः। मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषै-र्विर्द्यासि सा भगवती परमा हि देवि॥९॥
शब्दात्मिका सुविमलर्ग्यजुषां निधान-मुद्गीथरम्यपदपाठवतां च साम्नाम्। देवी त्रयी भगवती भवभावनाय वार्ता च सर्वजगतां परमार्तिहन्त्री॥१०॥
मेधासि देवि विदिताखिलशास्त्रसारा दुर्गासि दुर्गभवसागरनौरसङ्गा। श्रीः कैटभारिहृदयैककृताधिवासा गौरी त्वमेव शशिमौलिकृतप्रतिष्ठा॥११॥
ईषत्सहासममलं परिपूर्णचन्द्र-बिम्बानुकारि कनकोत्तमकान्तिकान्तम्। अत्यद्भुतं प्रहृतमात्तरुषा तथापि वक्त्रं विलोक्य सहसा महिषासुरेण॥१२॥
दृष्ट्वा तु देवि कुपितं भ्रुकुटीकराल-मुद्यच्छशाङ्कसदृशच्छवि यन्न सद्यः। प्राणान्मुमोच महिषस्तदतीव चित्रंकैर्जीव्यते हि कुपितान्तकदर्शनेन॥१३॥
देवि प्रसीद परमा भवती भवाय सद्यो विनाशयसि कोपवती कुलानि। विज्ञातमेतदधुनैव यदस्तमेतन्नीतं बलं सुविपुलं महिषासुरस्य॥१४॥
ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्गः। धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारायेषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना॥१५॥
धर्म्याणि देवि सकलानि सदैव कर्माण्यत्यादृतः प्रतिदिनं सुकृती करोति। स्वर्गं प्रयाति च ततो भवतीप्रसादाल्लोकत्रयेऽपि फलदा ननु देवि तेन॥१६॥
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि। दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता॥१७॥
एभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम्। संग्राममृत्युमधिगम्य दिवं प्रयान्तुमत्वेति नूनमहितान् विनिहंसि देवि॥१८॥
दृष्ट्वैव किं न भवती प्रकरोति भस्म सर्वासुरानरिषु यत्प्रहिणोषि शस्त्रम्। लोकान् प्रयान्तु रिपवोऽपि हि शस्त्रपूता इत्थं मतिर्भवति तेष्वपि तेऽतिसाध्वी॥१९॥
खड्गप्रभानिकरविस्फुरणैस्तथोग्रैः शूलाग्रकान्तिनिवहेन दृशोऽसुराणाम्। यन्नागता विलयमंशुमदिन्दुखण्ड-योग्याननं तव विलोकयतां तदेतत्॥२०॥
दुर्वृत्तवृत्तशमनं तव देवि शीलं रूपं तथैतदविचिन्त्यमतुल्यमन्यैः। वीर्यं च हन्तृ हृतदेवपराक्रमाणां वैरिष्वपि प्रकटितैव दया त्वयेत्थम्॥२१॥
केनोपमा भवतु तेऽस्य पराक्रमस्य रूपं च शत्रुभयकार्यतिहारि कुत्र। चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता च दृष्टा
त्वय्येव देवि वरदे भुवनत्रयेऽपि॥२२॥
त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन त्रातं त्वया समरमूर्धनि तेऽपि हत्वा। नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्त-मस्माकमुन्मदसुरारिभवं नमस्ते॥२३॥
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके। घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च॥२४॥
प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे। भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि॥२५॥
सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते। यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम्॥२६॥
खड्गशूलगदादीनि यानि चास्त्राणी तेऽम्बिके। करपल्लवसङ्गीनि तैरस्मान् रक्ष सर्वतः॥२७॥
ऋषिरुवाच॥२८॥
एवं स्तुता सुरैर्दिव्यैः कुसुमैर्नन्दनोद्भवैः। अर्चिता जगतां धात्री तथा गन्धानुलेपनैः॥२९॥
भक्त्या समस्तैस्त्रिदशैर्दिव्यैर्धूपैस्तु धूपिता। प्राह प्रसादसुमुखी समस्तान् प्रणतान् सुरान्॥३०॥
देव्युवाच॥३१॥
व्रियतां त्रिदशाः सर्वे यदस्मत्तोऽभिवाञ्छितम्॥३२॥
देवा ऊचुः॥३३॥
भगवत्या कृतं सर्वं न किंचिदवशिष्यते॥३४॥
यदयं निहतः शत्रुरस्माकं महिषासुरः। यदि चापि वरो देयस्त्वयास्माकं महेश्वरि॥३५॥
संस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमापदः। यश्च मर्त्यः स्तवैरेभिस्त्वां स्तोष्यत्यमलानने॥३६॥
तस्य वित्तर्द्धिविभवैर्धनदारादिसम्पदाम्। वृद्धयेऽस्मत्प्रसन्ना त्वं भवेथाः सर्वदाम्बिके॥३७॥
ऋषिरुवाच॥३८॥
इति प्रसादिता देवैर्जगतोऽर्थे तथाऽऽत्मनः। तथेत्युक्त्वा भद्रकाली बभूवान्तर्हिता नृप॥३९॥
इत्येतत्कथितं भूप सम्भूता सा यथा पुरा। देवी देवशरीरेभ्यो जगत्त्रयहितैषिणी॥४०॥
पुनश्च गौरीदेहात्सा समुद्भूता यथाभवत्। वधाय दुष्टदैत्यानां तथा शुम्भनिशुम्भयोः॥४१॥
रक्षणाय च लोकानां देवानामुपकारिणी। तच्छृणुष्व मयाऽऽख्यातं यथावत्कथयामि ते॥ह्रीं ॐ॥४२॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शक्रादिस्तुतिर्नाम चतुर्थोऽध्यायः॥४॥
उवाच ५, अर्धश्लोकौः २, श्लोकाः ३५, एवम् ४२, एवमादितः॥२५९॥
॥श्रीदुर्गासप्तशती - पञ्चमोऽध्यायः॥
देवताओं द्वारा देवी की स्तुति, चण्ड-मुण्डके मुख से अम्बिका के रूप की प्रशंसा सुनकर शुम्भ का उनके पास दूत भेजना और दूत का निराश लौटना।
॥विनियोगः॥
ॐ अस्य श्रीउत्तरचरित्रस्य
रूद्र ऋषिः
महासरस्वती देवता
अनुष्टुप् छन्दः
भीमा शक्तिः
भ्रामरी बीजम्
सूर्यस्तत्त्वम्
सामवेदः स्वरूपम्
महासरस्वतीप्रीत्यर्थे उत्तरचरित्रपाठे विनियोगः।
॥ध्यानम्॥
ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥
"ॐ क्लीं" ऋषिरुवाच॥१॥
पुरा शुम्भनिशुम्भाभ्यामसुराभ्यां शचीपतेः। त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्च हृता मदबलाश्रयात्॥२॥
तावेव सूर्यतां तद्वदधिकारं तथैन्दवम्। कौबेरमथ याम्यं च चक्राते वरुणस्य च॥३॥
तावेव पवनर्द्धिं च चक्रतुर्वह्निकर्म च। ततो देवा विनिर्धूता भ्रष्टराज्याः पराजिताः॥४॥
हृताधिकारास्त्रिदशास्ताभ्यां सर्वे निराकृताः। महासुराभ्यां तां देवीं संस्मरन्त्यपराजिताम्॥५॥
तयास्माकं वरो दत्तो यथाऽऽपत्सु स्मृताखिलाः। भवतां नाशयिष्यामि तत्क्षणात्परमापदः॥६॥
इति कृत्वा मतिं देवा हिमवन्तं नगेश्वरम्। जग्मुस्तत्र ततो देवीं विष्णुमायां प्रतुष्टुवुः॥७॥
देवा ऊचुः॥८॥
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥९॥
रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्ये धात्र्यै नमो नमः। ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः॥१०॥
कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः। नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः॥११॥
दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै। ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः॥१२॥
अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः। नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः॥१३॥
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता। नमस्तस्यै॥१४॥
नमस्तस्यै॥१५॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥१६॥
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते। नमस्तस्यै॥१७॥
नमस्तस्यै॥१८॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥१९॥
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥२०॥
नमस्तस्यै॥२१॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥२२॥
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥२३॥
नमस्तस्यै॥२४॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥२५॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥२६॥
नमस्तस्यै॥२७॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥२८॥
या देवी सर्वभूतेषुच्छायारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥२९॥
नमस्तस्यै॥३०॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥३१॥
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥३२॥
नमस्तस्यै॥३३॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥३४॥
या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥३५॥
नमस्तस्यै॥३६॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥३७॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥३८॥
नमस्तस्यै॥३९॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥४०॥
या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥४१॥
नमस्तस्यै॥४२॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥४३॥
या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥४४॥
नमस्तस्यै॥४५॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥४६॥
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥४७॥
नमस्तस्यै॥४८॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥४९॥
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥५०॥
नमस्तस्यै॥५१॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥५२॥
या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥५३॥
नमस्तस्यै॥५४॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥५५॥
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥५६॥
नमस्तस्यै॥५७॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥५८॥
या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥५९॥
नमस्तस्यै॥६०॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥६१॥
या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥६२॥
नमस्तस्यै॥६३॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥६४॥
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥६५॥
नमस्तस्यै॥६६॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥६७॥
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥६८॥
नमस्तस्यै॥६९॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥७०॥
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥७१॥
नमस्तस्यै॥७२॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥७३॥
या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै॥७४॥
नमस्तस्यै॥७५॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥७६॥
इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या। भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः॥७७॥
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत्। नमस्तस्यै॥७८॥
नमस्तस्यै॥७९॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥८०॥
स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता। करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि
भद्राण्यभिहन्तु चापदः॥८१॥
या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितैरस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते। या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः॥८२॥
ऋषिरुवाच॥८३॥
एवं स्तवादियुक्तानां देवानां तत्र पार्वती। स्नातुमभ्याययौ तोये जाह्नव्या नृपनन्दन॥८४॥
साब्रवीत्तान् सुरान् सुभ्रूर्भवद्भिः स्तूयतेऽत्र का। शरीरकोशतश्चास्याः समुद्भूताब्रवीच्छिवा॥८५॥
स्तोत्रं ममैतत् क्रियते शुम्भदैत्यनिराकृतैः। देवैः समेतैः समरे निशुम्भेन पराजितैः॥८६॥
शरीरकोशाद्यत्तस्याः पार्वत्या निःसृताम्बिका। कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु गीयते॥८७॥
तस्यां विनिर्गतायां तु कृष्णाभूत्सापि पार्वती। कालिकेति समाख्याता हिमाचलकृताश्रया॥८८॥
ततोऽम्बिकां परं रूपं बिभ्राणां सुमनोहरम्। ददर्श चण्डो मुण्डश्च भृत्यौ शुम्भनिशुम्भयोः॥८९॥
ताभ्यां शुम्भाय चाख्याता अतीव सुमनोहरा। काप्यास्ते स्त्री महाराज भासयन्ती हिमाचलम्॥९०॥
नैव तादृक् क्वचिद्रूपं दृष्टं केनचिदुत्तमम्। ज्ञायतां काप्यसौ देवी गृह्यतां चासुरेश्वर॥९१॥
स्त्रीरत्नमतिचार्वङ्गी द्योतयन्ती दिशस्त्विषा। सा तु तिष्ठति दैत्येन्द्र तां भवान् द्रष्टुमर्हति॥९२॥
यानि रत्नानि मणयो गजाश्वादीनि वै प्रभो। त्रैलोक्ये तु समस्तानि साम्प्रतं भान्ति ते गृहे॥९३॥
ऐरावतः समानीतो गजरत्नं पुरन्दरात्। पारिजाततरुश्चायं तथैवोच्चैःश्रवा हयः॥९४॥
विमानं हंससंयुक्तमेतत्तिष्ठति तेऽङ्गणे। रत्नभूतमिहानीतं यदासीद्वेधसोऽद्भुतम्॥९५॥
निधिरेष महापद्मः समानीतो धनेश्वरात्। किञ्जल्किनीं ददौ चाब्धिर्मालामम्लानपङ्कजाम्॥९६॥
छत्रं ते वारुणं गेहे काञ्चनस्रावि तिष्ठति। तथायं स्यन्दनवरो यः पुराऽऽसीत्प्रजापतेः॥९७॥
मृत्योरुत्क्रान्तिदा नाम शक्तिरीश त्वया हृता। पाशः सलिलराजस्य भ्रातुस्तव परिग्रहे॥९८॥
निशुम्भस्याब्धिजाताश्च समस्ता रत्नजातयः। वह्निरपि ददौ तुभ्यमग्निशौचे च वाससी॥९९॥
एवं दैत्येन्द्र रत्नानि समस्तान्याहृतानि ते। स्त्रीरत्नमेषा कल्याणी त्वया कस्मान्न गृह्यते॥१००॥
ऋषिरुवाच॥१०१॥
निशम्येति वचः शुम्भः स तदा चण्डमुण्डयोः। प्रेषयामास सुग्रीवं दूतं देव्या महासुरम्॥१०२॥
इति चेति च वक्तव्या सा गत्वा वचनान्मम। यथा चाभ्येति सम्प्रीत्या तथा कार्यं त्वया लघु॥१०३॥
स तत्र गत्वा यत्रास्ते शैलोद्देशेऽतिशोभने। सा देवी तां ततः प्राहश्लक्ष्णं मधुरया गिरा॥१०४॥
दूत उवाच॥१०५॥
देवि दैत्येश्वरः शुम्भस्त्रैलोक्ये परमेश्वरः। दूतोऽहं प्रेषितस्तेन त्वत्सकाशमिहागतः॥१०६॥
अव्याहताज्ञः सर्वासु यः सदा देवयोनिषु। निर्जिताखिलदैत्यारिः स यदाह श्रृणुष्व तत्॥१०७॥
मम त्रैलोक्यमखिलं मम देवा वशानुगाः। यज्ञभागानहं सर्वानुपाश्नामि पृथक् पृथक्॥१०८॥
त्रैलोक्ये वररत्नानि मम वश्यान्यशेषतः। तथैव गजरत्नं च हृत्वा देवेन्द्रवाहनम्॥१०९॥
क्षीरोदमथनोद्भूतमश्वरत्नं ममामरैः। उच्चैःश्रवससंज्ञं तत्प्रणिपत्य समर्पितम्॥११०॥
यानि चान्यानि देवेषु गन्धर्वेषूरगेषु च। रत्नभूतानि भूतानि तानि मय्येव शोभने॥१११॥
स्त्रीरत्नभूतां त्वां देवि लोके मन्यामहे वयम्। सा त्वमस्मानुपागच्छ यतो रत्नभुजो वयम्॥११२॥
मां वा ममानुजं वापि निशुम्भमुरुविक्रमम्। भज त्वं च चञ्चलापाङ्गि रत्नभूतासि वै यतः॥११३॥
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यसे मत्परिग्रहात्। एतद् बुद्ध्या समालोच्य मत्परिग्रहतां व्रज॥११४॥
ऋषिरुवाच॥११५॥
इत्युक्ता सा तदा देवी गम्भीरान्तःस्मिता जगौ। दुर्गा भगवती भद्रा ययेदं धार्यते जगत्॥११६॥
देव्युवाच॥११७॥
सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चित्त्वयोदितम्। त्रैलोक्याधिपतिः शुम्भो निशुम्भश्चापि तादृशः॥११८॥
किं त्वत्र यत्प्रतिज्ञातं मिथ्या तत्क्रियते कथम्। श्रूयतामल्पबुद्धित्वात्प्रतिज्ञा या कृता पुरा॥११९॥
यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति। यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति॥१२०॥
तदागच्छतु शुम्भोऽत्र निशुम्भो वा महासुरः। मां जित्वा किं चिरेणात्र पाणिं गृह्णातु मे लघु॥१२१॥
दूत उवाच॥१२२॥
अवलिप्तासि मैवं त्वं देवि ब्रूहि ममाग्रतः। त्रैलोक्ये कः पुमांस्तिष्ठेदग्रे शुम्भनिशुम्भयोः॥१२३॥
अन्येषामपि दैत्यानां सर्वे देवा न वै युधि। तिष्ठन्ति सम्मुखे देवि किं पुनः स्त्री त्वमेकिका॥१२४॥
इन्द्राद्याः सकला देवास्तस्थुर्येषां न संयुगे। शुम्भादीनां कथं तेषां स्त्री प्रयास्यसि सम्मुखम्॥१२५॥
सा त्वं गच्छ मयैवोक्ता पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः। केशाकर्षणनिर्धूतगौरवा मा गमिष्यसि॥१२६॥
देव्युवाच॥१२७॥
एवमेतद् बली शुम्भो निशुम्भश्चातिवीर्यवान्। किं करोमि प्रतिज्ञा मे यदनालोचिता पुरा॥१२८॥
स त्वं गच्छ मयोक्तं ते यदेतत्सर्वमादृतः। तदाचक्ष्वासुरेन्द्राय स च युक्तं करोतु तत्॥ॐ॥१२९॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये देव्या दूतसंवादो नाम पञ्चमोऽध्यायः॥५॥
उवाच ९, त्रिपान्मन्त्राः ६६, श्लोकाः ५४, एवम् १२९, एवमादितः॥३८८॥
॥श्रीदुर्गासप्तशती - षष्ठोऽध्यायः॥
धूम्रलोचन-वध।
॥ध्यानम्॥
ॐ नागाधीश्वरविष्टरां फणिफणोत्तंसोरुरत्नावली-
भास्वद्देहलतां दिवाकरनिभां नेत्रत्रयोद्भासिताम्।
मालाकुम्भकपालनीरजकरां चन्द्रार्धचूडां परां
सर्वज्ञेश्वरभैरवाङ्कनिलयां पद्मावतीं चिन्तये॥
"ॐ" ऋषिरुवाच॥१॥
इत्याकर्ण्य वचो देव्याः स दूतोऽमर्षपूरितः। समाचष्ट समागम्य दैत्यराजाय विस्तरात्॥२॥
तस्य दूतस्य तद्वाक्यमाकर्ण्यासुरराट् ततः। सक्रोधः प्राह दैत्यानामधिपं धूम्रलोचनम्॥३॥
हे धूम्रलोचनाशु त्वं स्वसैन्यपरिवारितः। तामानय बलाद् दुष्टां केशाकर्षणविह्वलाम्॥४॥
तत्परित्राणदः कश्चिद्यदि वोत्तिष्ठतेऽपरः। स हन्तव्योऽमरो वापि यक्षो गन्धर्व एव वा॥५॥
ऋषिरुवाच॥६॥
तेनाज्ञप्तस्ततः शीघ्रं स दैत्यो धूम्रलोचनः। वृतः षष्ट्या सहस्राणामसुराणां द्रुतं ययौ॥७॥
स दृष्ट्वा तां ततो देवीं तुहिनाचलसंस्थिताम्। जगादोच्चैः प्रयाहीति मूलं शुम्भनिशुम्भयोः॥८॥
न चेत्प्रीत्याद्य भवती मद्भर्तारमुपैष्यति। ततो बलान्नयाम्येष केशाकर्षणविह्वलाम्॥९॥
देव्युवाच॥१०॥
दैत्येश्वरेण प्रहितो बलवान् बलसंवृतः। बलान्नयसि मामेवं ततः किं ते करोम्यहम्॥११॥
ऋषिरुवाच॥१२॥
इत्युक्तः सोऽभ्यधावत्तामसुरो धूम्रलोचनः। हुंकारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका ततः॥१३॥
अथ क्रुद्धं महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका। ववर्ष सायकैस्तीक्ष्णैस्तथा शक्तिपरश्वधैः॥१४॥
ततो धुतसटः कोपात्कृत्वा नादं सुभैरवम्। पपातासुरसेनायां सिंहो देव्याः स्ववाहनः॥१५॥
कांश्चित् करप्रहारेण दैत्यानास्येन चापरान्। आक्रम्य चाधरेणान्यान् स जघान महासुरान्॥१६॥
केषांचित्पाटयामास नखैः कोष्ठानि केसरी। तथा तलप्रहारेण शिरांसि कृतवान् पृथक्॥१७॥
विच्छिन्नबाहुशिरसः कृतास्तेन तथापरे। पपौ च रुधिरं कोष्ठादन्येषां धुतकेसरः॥१८॥
क्षणेन तद्बलं सर्वं क्षयं नीतं महात्मना। तेन केसरिणा देव्या वाहनेनातिकोपिना॥१९॥
श्रुत्वा तमसुरं देव्या निहतं धूम्रलोचनम्। बलं च क्षयितं कृत्स्नं देवीकेसरिणा ततः॥२०॥
चुकोप दैत्याधिपतिः शुम्भः प्रस्फुरिताधरः। आज्ञापयामास च तौ चण्डमुण्डौ महासुरौ॥२१॥
हे चण्ड हे मुण्ड बलैर्बहुभिः परिवारितौ। तत्र गच्छत गत्वा च सा समानीयतां लघु॥२२॥
केशेष्वाकृष्य बद्ध्वा वा यदि वः संशयो युधि। तदाशेषायुधैः सर्वैरसुरैर्विनिहन्यताम्॥२३॥
तस्यां हतायां दुष्टायां सिंहे च विनिपातिते। शीघ्रमागम्यतां बद्ध्वा गृहीत्वा तामथाम्बिकाम्॥ॐ॥२४॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शुम्भनिशुम्भसेनानीधूम्रलोचनवधो नाम षष्ठोऽध्यायः॥६॥
उवाच ४, श्लोकाः २०, एवम्२४, एवमादितः॥४१२॥
॥श्रीदुर्गासप्तशती - सप्तमोऽध्यायः॥
चण्ड और मुण्डका वध।
॥ध्यानम्॥
ॐ ध्यायेयं रत्नपीठे शुककलपठितं शृण्वतीं श्यामलाङ्गीं
न्यस्तैकाङ्घ्रिं सरोजे शशिशकलधरां वल्लकीं वादयन्तीम्।
कह्लाराबद्धमालां नियमितविलसच्चोलिकां रक्तवस्त्रां
मातङ्गीं शङ्खपात्रां मधुरमधुमदां चित्रकोद्भासिभालाम्॥
"ॐ" ऋषिरुवाच॥१॥
आज्ञप्तास्ते ततो दैत्याश्चण्डमुण्डपुरोगमाः। चतुरङ्गबलोपेता ययुरभ्युद्यतायुधाः॥२॥
ददृशुस्ते ततो देवीमीषद्धासां व्यवस्थिताम्। सिंहस्योपरि शैलेन्द्रशृङ्गे महति काञ्चने॥३॥
ते दृष्ट्वा तां समादातुमुद्यमं चक्रुरुद्यताः। आकृष्टचापासिधरास्तथान्ये तत्समीपगाः॥४॥
ततः कोपं चकारोच्चैरम्बिका तानरीन् प्रति। कोपेन चास्या वदनं मषीवर्णमभूत्तदा॥५॥
भ्रुकुटीकुटिलात्तस्या ललाटफलकाद्द्रुतम्। काली करालवदना विनिष्क्रान्तासिपाशिनी॥६॥
विचित्रखट्वाङ्गधरा नरमालाविभूषणा। द्वीपिचर्मपरीधाना शुष्कमांसातिभैरवा॥७॥
अतिविस्तारवदना जिह्वाललनभीषणा। निमग्नारक्तनयना नादापूरितदिङ्मुखा॥८॥
सा वेगेनाभिपतिता घातयन्ती महासुरान्। सैन्ये तत्र सुरारीणामभक्षयत तद्बलम्॥९॥
पार्ष्णिग्राहाङ्कुशग्राहियोधघण्टासमन्वितान्। समादायैकहस्तेन मुखे चिक्षेप वारणान्॥१०॥
तथैव योधं तुरगै रथं सारथिना सह। निक्षिप्य वक्त्रे दशनैश्चर्वयन्त्यतिभैरवम्॥११॥
एकं जग्राह केशेषु ग्रीवायामथ चापरम्। पादेनाक्रम्य चैवान्यमुरसान्यमपोथयत्॥१२॥
तैर्मुक्तानि च शस्त्राणि महास्त्राणि तथासुरैः। मुखेन जग्राह रुषा दशनैर्मथितान्यपि॥१३॥
बलिनां तद् बलं सर्वमसुराणां दुरात्मनाम्। ममर्दाभक्षयच्चान्यानन्यांश्चाताडयत्तथा॥१४॥
असिना निहताः केचित्केचित्खट्वाङ्गताडिताः। जग्मुर्विनाशमसुरा दन्ताग्राभिहतास्तथा॥१५॥
क्षणेन तद् बलं सर्वमसुराणां निपातितम्। दृष्ट्वा चण्डोऽभिदुद्राव तां कालीमतिभीषणाम्॥१६॥
शरवर्षैर्महाभीमैर्भीमाक्षीं तां महासुरः। छादयामास चक्रैश्च मुण्डः क्षिप्तैः सहस्रशः॥१७॥
तानि चक्राण्यनेकानि विशमानानि तन्मुखम्। बभुर्यथार्कबिम्बानि सुबहूनि घनोदरम्॥१८॥
ततो जहासातिरुषा भीमं भैरवनादिनी। कालीकरालवक्त्रान्तर्दुर्दर्शदशनोज्ज्वला॥१९॥
उत्थाय च महासिं हं देवी चण्डमधावत। गृहीत्वा चास्य केशेषु शिरस्तेनासिनाच्छिनत्॥२०॥
अथ मुण्डोऽभ्यधावत्तां दृष्ट्वा चण्डं निपातितम्। तमप्यपातयद्भूमौ सा खड्गाभिहतं रुषा॥२१॥
हतशेषं ततः सैन्यं दृष्ट्वा चण्डं निपातितम्। मुण्डं च सुमहावीर्यं दिशो भेजे भयातुरम्॥२२॥
शिरश्चण्डस्य काली च गृहीत्वा मुण्डमेव च। प्राह प्रचण्डाट्टहासमिश्रमभ्येत्य चण्डिकाम्॥२३॥
मया तवात्रोपहृतौ चण्डमुण्डौ महापशू। युद्धयज्ञे स्वयं शुम्भं निशुम्भं च हनिष्यसि॥२४॥
ऋषिरुवाच॥२५॥
तावानीतौ ततो दृष्ट्वा चण्डमुण्डौ महासुरौ। उवाच कालीं कल्याणी ललितं चण्डिका वचः॥२६॥
यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता। चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि॥ॐ॥२७॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये चण्डमुण्डवधो नाम सप्तमोऽध्यायः॥७॥
उवाच २, श्लोकाः २५, एवम् २७, एवमादितः॥४३९॥
॥श्रीदुर्गासप्तशती - अष्टमोऽध्यायः॥
रक्तबीज-वध।
॥ध्यानम्॥
ॐ अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं धृतपाशाङ्कुशबाणचापहस्ताम्।
अणिमादिभिरावृतां मयूखै-रहमित्येव विभावये भवानीम्॥
"ॐ" ऋषिरुवाच॥१॥
चण्डे च निहते दैत्ये मुण्डे च विनिपातिते। बहुलेषु च सैन्येषु क्षयितेष्वसुरेश्वरः॥२॥
ततः कोपपराधीनचेताः शुम्भः प्रतापवान्। उद्योगं सर्वसैन्यानां दैत्यानामादिदेश ह॥३॥
अद्य सर्वबलैर्दैत्याः षडशीतिरुदायुधाः। कम्बूनां चतुरशीतिर्निर्यान्तु स्वबलैर्वृताः॥४॥
कोटिवीर्याणि पञ्चाशदसुराणां कुलानि वै। शतं कुलानि धौम्राणां निर्गच्छन्तु ममाज्ञया॥५॥
कालका दौर्हृद मौर्याः कालकेयास्तथासुराः। युद्धाय सज्जा निर्यान्तु आज्ञया त्वरिता मम॥६॥
इत्याज्ञाप्यासुरपतिः शुम्भो भैरवशासनः। निर्जगाम महासैन्यसहस्रैर्बहुभिर्वृतः॥७॥
आयान्तं चण्डिका दृष्ट्वा तत्सैन्यमतिभीषणम्। ज्यास्वनैः पूरयामास धरणीगगनान्तरम्॥८॥
ततः सिंहो महानादमतीव कृतवान् नृप। घण्टास्वनेन तन्नादमम्बिका चोपबृंहयत्॥९॥
धनुर्ज्यासिंहघण्टानां नादापूरितदिङ्मुखा। निनादैर्भीषणैः काली जिग्ये विस्तारितानना॥१०॥
तं निनादमुपश्रुत्य दैत्यसैन्यैश्चतुर्दिशम्। देवी सिंहस्तथा काली सरोषैः परिवारिताः॥११॥
एतस्मिन्नन्तरे भूप विनाशाय सुरद्विषाम्। भवायामरसिंहानामतिवीर्यबलान्विताः॥१२॥
ब्रह्मेशगुहविष्णूनां तथेन्द्रस्य च शक्तयः। शरीरेभ्यो विनिष्क्रम्य तद्रूपैश्चण्डिकां ययुः॥१३॥
यस्य देवस्य यद्रूपं यथाभूषणवाहनम्। तद्वदेव हि तच्छक्तिरसुरान् योद्धुमाययौ॥१४॥
हंसयुक्तविमानाग्रे साक्षसूत्रकमण्डलुः। आयाता ब्रह्मणः शक्तिर्ब्रह्माणी साभिधीयते॥१५॥
माहेश्वरी वृषारूढा त्रिशूलवरधारिणी। महाहिवलया प्राप्ता चन्द्ररेखाविभूषणा॥१६॥
कौमारी शक्तिहस्ता च मयूरवरवाहना। योद्धुमभ्याययौ दैत्यानम्बिका गुहरूपिणी॥१७॥
तथैव वैष्णवी शक्तिर्गरुडोपरि संस्थिता। शङ्खचक्रगदाशाङ्र्गखड्गहस्ताभ्युपाययौ॥१८॥
यज्ञवाराहमतुलं रूपं या बिभ्रतो हरेः। शक्तिः साप्याययौ तत्र वाराहीं बिभ्रती तनुम्॥१९॥
नारसिंही नृसिंहस्य बिभ्रती सदृशं वपुः। प्राप्ता तत्र सटाक्षेपक्षिप्तनक्षत्रसंहतिः॥२०॥
वज्रहस्ता तथैवैन्द्री गजराजोपरि स्थिता। प्राप्ता सहस्रनयना यथा शक्रस्तथैव सा॥२१॥
ततः परिवृतस्ताभिरीशानो देवशक्तिभिः। हन्यन्तामसुराः शीघ्रं मम प्रीत्याऽऽहचण्डिकाम्॥२२॥
ततो देवीशरीरात्तु विनिष्क्रान्तातिभीषणा। चण्डिकाशक्तिरत्युग्रा शिवाशतनिनादिनी॥२३॥
सा चाह धूम्रजटिलमीशानमपराजिता। दूत त्वं गच्छ भगवन् पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः॥२४॥
ब्रूहि शुम्भं निशुम्भं च दानवावतिगर्वितौ। ये चान्ये दानवास्तत्र युद्धाय समुपस्थिताः॥२५॥
त्रैलोक्यमिन्द्रो लभतां देवाः सन्तु हविर्भुजः। यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ॥२६॥
बलावलेपादथ चेद्भवन्तो युद्धकाङ्क्षिणः। तदागच्छत तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः॥२७॥
यतो नियुक्तो दौत्येन तया देव्या शिवः स्वयम्। शिवदूतीति लोकेऽस्मिंस्ततः सा ख्यातिमागता॥२८॥
तेऽपि श्रुत्वा वचो देव्याः शर्वाख्यातं महासुराः। अमर्षापूरिता जग्मुर्यत्र कात्यायनी स्थिता॥२९॥
ततः प्रथममेवाग्रे शरशक्त्यृष्टिवृष्टिभिः। ववर्षुरुद्धतामर्षास्तां देवीममरारयः॥३०॥
सा च तान् प्रहितान् बाणाञ्छूलशक्तिपरश्वधान्। चिच्छेद लीलयाऽऽध्मातधनुर्मुक्तैर्महेषुभिः॥३१॥
तस्याग्रतस्तथा काली शूलपातविदारितान्। खट्वाङ्गपोथितांश्चारीन् कुर्वती व्यचरत्तदा॥३२॥
कमण्डलुजलाक्षेपहतवीर्यान् हतौजसः। ब्रह्माणी चाकरोच्छत्रून् येन येन स्म धावति॥३३॥
माहेश्वरी त्रिशूलेन तथा चक्रेण वैष्णवी। दैत्याञ्जघान कौमारी तथा शक्त्यातिकोपना॥३४॥
ऐन्द्रीकुलिशपातेन शतशो दैत्यदानवाः। पेतुर्विदारिताः पृथ्व्यां रुधिरौघप्रवर्षिणः॥३५॥
तुण्डप्रहारविध्वस्ता दंष्ट्राग्रक्षतवक्षसः। वाराहमूर्त्या न्यपतंश्चक्रेण च विदारिताः॥३६॥
नखैर्विदारितांश्चान्यान् भक्षयन्ती महासुरान्। नारसिंही चचाराजौ नादापूर्णदिगम्बरा॥३७॥
चण्डाट्टहासैरसुराः शिवदूत्यभिदूषिताः। पेतुः पृथिव्यां पतितांस्तांश्चखादाथ सा तदा॥३८॥
इति मातृगणं क्रुद्धं मर्दयन्तं महासुरान्। दृष्ट्वाभ्युपायैर्विविधैर्नेशुर्देवारिसैनिकाः॥३९॥
पलायनपरान् दृष्ट्वा दैत्यान् मातृगणार्दितान्। योद्धुमभ्याययौ क्रुद्धो रक्तबीजो महासुरः॥४०॥
रक्तबिन्दुर्यदा भूमौ पतत्यस्य शरीरतः। समुत्पतति मेदिन्यां तत्प्रमाणस्तदासुरः॥४१॥
युयुधे स गदापाणिरिन्द्रशक्त्या महासुरः। ततश्चैन्द्री स्ववज्रेण रक्तबीजमताडयत्॥४२॥
कुलिशेनाहतस्याशु बहु सुस्राव शोणितम्। समुत्तस्थुस्ततो योधास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः॥४३॥
यावन्तः पतितास्तस्य शरीराद्रक्तबिन्दवः। तावन्तः पुरुषा जातास्तद्वीर्यबलविक्रमाः॥४४॥
ते चापि युयुधुस्तत्र पुरुषा रक्तसम्भवाः। समं मातृभिरत्युग्रशस्त्रपातातिभीषणम्॥४५॥
पुनश्च वज्रपातेन क्षतमस्य शिरो यदा। ववाह रक्तं पुरुषास्ततो जाताः सहस्रशः॥४६॥
वैष्णवी समरे चैनं चक्रेणाभिजघान ह। गदया ताडयामास ऐन्द्री तमसुरेश्वरम्॥४७॥
वैष्णवीचक्रभिन्नस्य रुधिरस्रावसम्भवैः। सहस्रशो जगद्व्याप्तं तत्प्रमाणैर्महासुरैः॥४८॥
शक्त्या जघान कौमारी वाराही च तथासिना। माहेश्वरी त्रिशूलेन रक्तबीजं महासुरम्॥४९॥
स चापि गदया दैत्यः सर्वा एवाहनत् पृथक्। मातॄः कोपसमाविष्टो रक्तबीजो महासुरः॥५०॥
तस्याहतस्य बहुधा शक्तिशूलादिभिर्भुवि। पपात यो वै रक्तौघस्तेनासञ्छतशोऽसुराः॥५१॥
तैश्चासुरासृक्सम्भूतैरसुरैः सकलं जगत्। व्याप्तमासीत्ततो देवा भयमाजग्मुरुत्तमम्॥५२॥
तान् विषण्णान् सुरान् दृष्ट्वा चण्डिका प्राह सत्वरा। उवाच कालीं चामुण्डे विस्तीर्णं वदनं कुरु॥५३॥
मच्छस्त्रपातसम्भूतान् रक्तबिन्दून्महासुरान्। रक्तबिन्दोः प्रतीच्छ त्वं वक्त्रेणानेन वेगिना॥५४॥
भक्षयन्ती चर रणे तदुत्पन्नान्महासुरान्। एवमेष क्षयं दैत्यः क्षीणरक्तो गमिष्यति॥५५॥
भक्ष्यमाणास्त्वया चोग्रा न चोत्पत्स्यन्ति चापरे। इत्युक्त्वा तां ततो देवी शूलेनाभिजघान तम्॥५६॥
मुखेन काली जगृहे रक्तबीजस्य शोणितम्। ततोऽसावाजघानाथ गदया तत्र चण्डिकाम्॥५७॥
न चास्या वेदनां चक्रे गदापातोऽल्पिकामपि। तस्याहतस्य देहात्तु बहु सुस्राव शोणितम्॥५८॥
यतस्ततस्तद्वक्त्रेण चामुण्डा सम्प्रतीच्छति। मुखे समुद्गता येऽस्या रक्तपातान्महासुराः॥५९॥
तांश्चखादाथ चामुण्डा पपौ तस्य च शोणितम्। देवी शूलेन वज्रेण बाणैरसिभिर्ऋष्टिभिः॥६०॥
जघान रक्तबीजं तं चामुण्डापीतशोणितम्। स पपात महीपृष्ठे शस्त्रसङ्घसमाहतः॥६१॥
नीरक्तश्च महीपाल रक्तबीजो महासुरः। ततस्ते हर्षमतुलमवापुस्त्रिदशा नृप॥६२॥
तेषां मातृगणो जातो ननर्तासृङ्मदोद्धतः॥ॐ॥६३॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये रक्तबीजवधो नामाष्टमोऽध्यायः॥८॥
उवाच १, अर्धश्लोकः १, श्लोकाः ६१, एवम् ६३, एवमादितः॥५०२॥
॥श्रीदुर्गासप्तशती - नवमोऽध्यायः॥
निशुम्भ-वध।
॥ध्यानम्॥
ॐ बन्धूककाञ्चननिभं रुचिराक्षमालां पाशाङ्कुशौ च वरदां निजबाहुदण्डैः।
बिभ्राणमिन्दुशकलाभरणं त्रिनेत्र-मर्धाम्बिकेशमनिशं वपुराश्रयामि॥
"ॐ" राजोवाच॥१॥
विचित्रमिदमाख्यातं भगवन् भवता मम। देव्याश्चरितमाहात्म्यं रक्तबीजवधाश्रितम्॥२॥
भूयश्चेच्छाम्यहं श्रोतुं रक्तबीजे निपातिते। चकार शुम्भो यत्कर्म निशुम्भश्चातिकोपनः॥३॥
ऋषिरुवाच॥४॥
चकार कोपमतुलं रक्तबीजे निपातिते। शुम्भासुरो निशुम्भश्च हतेष्वन्येषु चाहवे॥५॥
हन्यमानं महासैन्यं विलोक्यामर्षमुद्वहन्। अभ्यधावन्निशुम्भोऽथ मुख्ययासुरसेनया॥६॥
तस्याग्रतस्तथा पृष्ठे पार्श्वयोश्च महासुराः। संदष्टौष्ठपुटाः क्रुद्धा हन्तुं देवीमुपाययुः॥७॥
आजगाम महावीर्यः शुम्भोऽपि स्वबलैर्वृतः। निहन्तुं चण्डिकां कोपात्कृत्वा युद्धं तु मातृभिः॥८॥
ततो युद्धमतीवासीद्देव्या शुम्भनिशुम्भयोः। शरवर्षमतीवोग्रं मेघयोरिव वर्षतोः॥९॥
चिच्छेदास्ताञ्छरांस्ताभ्यां चण्डिका स्वशरोत्करैः। ताडयामास चाङ्गेषु शस्त्रौघैरसुरेश्वरौ॥१०॥
निशुम्भो निशितं खड्गं चर्म चादाय सुप्रभम्। अताडयन्मूर्ध्नि सिंहं देव्या वाहनमुत्तमम्॥११॥
ताडिते वाहने देवी क्षुरप्रेणासिमुत्तमम्। निशुम्भस्याशु चिच्छेद चर्म चाप्यष्टचन्द्रकम्॥१२॥
छिन्ने चर्मणि खड्गे च शक्तिं चिक्षेप सोऽसुरः। तामप्यस्य द्विधा चक्रे चक्रेणाभिमुखागताम्॥१३॥
कोपाध्मातो निशुम्भोऽथ शूलं जग्राह दानवः। आयातं मुष्टिपातेन देवी तच्चाप्यचूर्णयत्॥१४॥
आविध्याथ गदां सोऽपि चिक्षेप चण्डिकां प्रति। सापि देव्या त्रिशूलेन भिन्ना भस्मत्वमागता॥१५॥
ततः परशुहस्तं तमायान्तं दैत्यपुङ्गवम्। आहत्य देवी बाणौघैरपातयत भूतले॥१६॥
तस्मिन्निपतिते भूमौ निशुम्भे भीमविक्रमे। भ्रातर्यतीव संक्रुद्धः प्रययौ हन्तुमम्बिकाम्॥१७॥
स रथस्थस्तथात्युच्चैर्गृहीतपरमायुधैः। भुजैरष्टाभिरतुलैर्व्याप्याशेषं बभौ नभः॥१८॥
तमायान्तं समालोक्य देवी शङ्खमवादयत्। ज्याशब्दं चापि धनुषश्चकारातीव दुःसहम्॥१९॥
पूरयामास ककुभो निजघण्टास्वनेन च। समस्तदैत्यसैन्यानां तेजोवधविधायिना॥२०॥
ततः सिंहो महानादैस्त्याजितेभमहामदैः। पूरयामास गगनं गां तथैव दिशो दश॥२१॥
ततः काली समुत्पत्य गगनं क्ष्मामताडयत्। कराभ्यां तन्निनादेन प्राक्स्वनास्ते तिरोहिताः॥२२॥
अट्टाट्टहासमशिवं शिवदूती चकार ह। तैः शब्दैरसुरास्त्रेसुः शुम्भः कोपं परं ययौ॥२३॥
दुरात्मंस्तिष्ठ तिष्ठेति व्याजहाराम्बिका यदा। तदा जयेत्यभिहितं देवैराकाशसंस्थितैः॥२४॥
शुम्भेनागत्य या शक्तिर्मुक्ता ज्वालातिभीषणा। आयान्ती वह्निकूटाभा सा निरस्ता महोल्कया॥२५॥
सिंहनादेन शुम्भस्य व्याप्तं लोकत्रयान्तरम्। निर्घातनिःस्वनो घोरो जितवानवनीपते॥२६॥
शुम्भमुक्ताञ्छरान्देवी शुम्भस्तत्प्रहिताञ्छरान्। चिच्छेद स्वशरैरुग्रैः शतशोऽथ सहस्रशः॥२७॥
ततः सा चण्डिका क्रुद्धा शूलेनाभिजघान तम्। स तदाभिहतो भूमौ मूर्च्छितो निपपात ह॥२८॥
ततो निशुम्भः सम्प्राप्य चेतनामात्तकार्मुकः। आजघान शरैर्देवीं कालीं केसरिणं तथा॥२९॥
पुनश्च कृत्वा बाहूनामयुतं दनुजेश्वरः। चक्रायुधेन दितिजश्छादयामास चण्डिकाम्॥३०॥
ततो भगवती क्रुद्धा दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी। चिच्छेद तानि चक्राणि स्वशरैः सायकांश्च तान्॥३१॥
ततो निशुम्भो वेगेन गदामादाय चण्डिकाम्। अभ्यधावत वै हन्तुं दैत्यसेनासमावृतः॥३२॥
तस्यापतत एवाशु गदां चिच्छेद चण्डिका। खड्गेन शितधारेण स च शूलं समाददे॥३३॥
शूलहस्तं समायान्तं निशुम्भममरार्दनम्। हृदि विव्याध शूलेन वेगाविद्धेन चण्डिका॥३४॥
भिन्नस्य तस्य शूलेन हृदयान्निःसृतोऽपरः। महाबलो महावीर्यस्तिष्ठेति पुरुषो वदन्॥३५॥
तस्य निष्क्रामतो देवी प्रहस्य स्वनवत्ततः। शिरश्चिच्छेद खड्गेन ततोऽसावपतद्भुवि॥३६॥
ततः सिंहश्चखादोग्रं दंष्ट्राक्षुण्णशिरोधरान्। असुरांस्तांस्तथा काली शिवदूती तथापरान्॥३७॥
कौमारीशक्तिनिर्भिन्नाः केचिन्नेशुर्महासुराः। ब्रह्माणीमन्त्रपूतेन तोयेनान्ये निराकृताः॥३८॥
माहेश्वरीत्रिशूलेन भिन्नाः पेतुस्तथापरे। वाराहीतुण्डघातेन केचिच्चूर्णीकृता भुवि॥३९॥
खण्डं खण्डं च चक्रेण वैष्णव्या दानवाः कृताः। वज्रेण चैन्द्रीहस्ताग्रविमुक्तेन तथापरे॥४०॥
केचिद्विनेशुरसुराः केचिन्नष्टा महाहवात्। भक्षिताश्चापरे कालीशिवदूतीमृगाधिपैः॥ॐ॥४१॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये निशुम्भवधो नाम नवमोऽध्यायः॥९॥
उवाच २, श्लोकाः ३९, एवम् ४१, एवमादितः॥५४३॥
॥श्रीदुर्गासप्तशती - दशमोऽध्यायः॥
शुम्भ-वध।
॥ध्यानम्॥
ॐ उत्तप्तहेमरुचिरां रविचन्द्रवह्नि-नेत्रां धनुश्शरयुताङ्कुशपाशशूलम्।
रम्यैर्भुजैश्च दधतीं शिवशक्तिरूपां कामेश्वरीं हृदि भजामि धृतेन्दुलेखाम्॥
"ॐ" ऋषिरुवाच॥१॥
निशुम्भं निहतं दृष्ट्वा भ्रातरं प्राणसम्मितम्। हन्यमानं बलं चैव शुम्भः क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः॥२॥
बलावलेपाद्दुष्टे त्वं मा दुर्गे गर्वमावह। अन्यासां बलमाश्रित्य युद्ध्यसे यातिमानिनी॥३॥
देव्युवाच॥४॥
एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा। पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः॥५॥
ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम्। तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकैवासीत्तदाम्बिका॥६॥
देव्युवाच॥७॥
अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता। तत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव॥८॥
ऋषिरुवाच।।९॥
ततः प्रववृते युद्धं देव्याः शुम्भस्य चोभयोः। पश्यतां सर्वदेवानामसुराणां च दारुणम्॥१०॥
शरवर्षैः शितैः शस्त्रैस्तथास्त्रैश्चैव दारुणैः। तयोर्युद्धमभूद्भूयः सर्वलोकभयङ्करम्॥११॥
दिव्यान्यस्त्राणि शतशो मुमुचे यान्यथाम्बिका। बभञ्ज तानि दैत्येन्द्रस्तत्प्रतीघातकर्तृभिः॥१२॥
मुक्तानि तेन चास्त्राणि दिव्यानि परमेश्वरी। बभञ्ज लीलयैवोग्रहुङ्कारोच्चारणादिभिः॥१३॥
ततः शरशतैर्देवीमाच्छादयत सोऽसुरः। सापि तत्कुपिता देवी धनुश्चिच्छेद चेषुभिः॥१४॥
छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रस्तथा शक्तिमथाददे। चिच्छेद देवी चक्रेण तामप्यस्य करे स्थिताम्॥१५॥
ततः खड्गमुपादाय शतचन्द्रं च भानुमत्। अभ्यधावत्तदा देवीं दैत्यानामधिपेश्वरः॥१६॥
तस्यापतत एवाशु खड्गं चिच्छेद चण्डिका। धनुर्मुक्तैः शितैर्बाणैश्चर्म चार्ककरामलम्॥१७॥
हताश्वः स तदा दैत्यश्छिन्नधन्वा विसारथिः। जग्राह मुद्गरं घोरमम्बिकानिधनोद्यतः॥१८॥
चिच्छेदापततस्तस्य मुद्गरं निशितैः शरैः। तथापि सोऽभ्यधावत्तां मुष्टिमुद्यम्य वेगवान्॥१९॥
स मुष्टिं पातयामास हृदये दैत्यपुङ्गवः। देव्यास्तं चापि सा देवी तलेनोरस्यताडयत्॥२०॥
तलप्रहाराभिहतो निपपात महीतले। स दैत्यराजः सहसा पुनरेव तथोत्थितः॥२१॥
उत्पत्य च प्रगृह्योच्चैर्देवीं गगनमास्थितः। तत्रापि सा निराधारा युयुधे तेन चण्डिका॥२२॥
नियुद्धं खे तदा दैत्यश्चण्डिका च परस्परम्। चक्रतुः प्रथमं सिद्धमुनिविस्मयकारकम्॥२३॥
ततो नियुद्धं सुचिरं कृत्वा तेनाम्बिका सह। उत्पात्य भ्रामयामास चिक्षेप धरणीतले॥२४॥
स क्षिप्तो धरणीं प्राप्य मुष्टिमुद्यम्य वेगितः। अभ्यधावत दुष्टात्मा चण्डिकानिधनेच्छया॥२५॥
तमायान्तं ततो देवी सर्वदैत्यजनेश्वरम्। जगत्यां पातयामास भित्त्वा शूलेन वक्षसि॥२६॥
स गतासुः पपातोर्व्यां देवीशूलाग्रविक्षतः। चालयन् सकलां पृथ्वीं साब्धिद्वीपां सपर्वताम्॥२७॥
ततः प्रसन्नमखिलं हते तस्मिन् दुरात्मनि। जगत्स्वास्थ्यमतीवाप निर्मलं चाभवन्नभः॥२८॥
उत्पातमेघाः सोल्का ये प्रागासंस्ते शमं ययुः। सरितो मार्गवाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते॥२९॥
ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः। बभूवुर्निहते तस्मिन् गन्धर्वा ललितं जगुः॥३०॥
अवादयंस्तथैवान्ये ननृतुश्चाप्सरोगणाः। ववुः पुण्यास्तथा वाताः सुप्रभोऽभूद्दिवाकरः॥३१॥
जज्वलुश्चाग्नयः शान्ताः शान्ता दिग्जनितस्वनाः॥ॐ॥३२॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शुम्भवधो नाम दशमोऽध्यायः॥१०॥
उवाच ४, अर्धश्लोकः १, श्लोकाः २७, एवम् ३२, एवमादितः॥५७५॥
॥श्रीदुर्गासप्तशती - एकादशोऽध्यायः॥
देवताओं द्वारा देवी की सतुति तथा देवी द्वारा देवताओं को वरदान।
॥ध्यानम्॥
ॐ बालरविद्युतिमिन्दुकिरीटां तुङ्गकुचां नयनत्रययुक्ताम्।
स्मेरमुखीं वरदाङ्कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम्॥
"ॐ" ऋषिरुवाच॥१॥
देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम्। कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद्
विकाशिवक्त्राब्जविकाशिताशाः॥२॥
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य। प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥३॥
आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतः स्थितासि। अपां स्वरूपस्थितया त्वयैतदाप्यायते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये॥४॥
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया। सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः॥५॥
विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु। त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः॥६॥
सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी। त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः॥७॥
सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते। स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥८॥
कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनि। विश्वस्योपरतौ शक्ते नारायणि नमोऽस्तु ते॥९॥
सर्वमङ्गलमंङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥१०॥
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि। गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥११॥
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे। सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥१२॥
हंसयुक्तविमानस्थे ब्रह्माणीरूपधारिणि। कौशाम्भःक्षरिके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥१३॥
त्रिशूलचन्द्राहिधरे महावृषभवाहिनि। माहेश्वरीस्वरूपेण नारायणि नमोऽस्तु ते॥१४॥
मयूरकुक्कुटवृते महाशक्तिधरेऽनघे। कौमारीरूपसंस्थाने नारायणि नमोऽस्तु ते॥१५॥
शङ्खचक्रगदाशाङ्र्गगृहीतपरमायुधे। प्रसीद वैष्णवीरूपे नारायणि नमोऽस्तु ते॥१६॥
गृहीतोग्रमहाचक्रे दंष्ट्रोद्धृतवसुंधरे। वराहरूपिणि शिवे नारायणि नमोऽस्तु ते॥१७॥
नृसिंहरूपेणोग्रेण हन्तुं दैत्यान् कृतोद्यमे। त्रैलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमोऽस्तु ते॥१८॥
किरीटिनि महावज्रे सहस्रनयनोज्ज्वले। वृत्रप्राणहरे चैन्द्रि नारायणि नमोऽस्तु ते॥१९॥
शिवदूतीस्वरूपेण हतदैत्यमहाबले। घोररूपे महारावे नारायणि नमोऽस्तु ते॥२०॥
दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे। चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते॥२१॥
लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टिस्वधे ध्रुवे। महारात्रि महाऽविद्ये नारायणि नमोऽस्तु ते॥२२॥
मेधे सरस्वति वरे भूति बाभ्रवि तामसि। नियते त्वं प्रसीदेशे नारायणि नमोऽस्तु ते॥२३॥
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते। भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥२४॥
एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्। पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥२५॥
ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम्। त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते॥२६॥
हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्। सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽनः सुतानिव॥२७॥
असुरासृग्वसापङ्कचर्चितस्ते करोज्ज्वलः। शुभाय खड्गो भवतु चण्डिके त्वां नता वयम्॥२८॥
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्। त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥२९॥
एतत्कृतं यत्कदनं त्वयाद्य धर्मद्विषां देवि महासुराणाम्। रूपैरनेकैर्बहुधाऽऽत्ममूर्तिं कृत्वाम्बिके तत्प्रकरोति कान्या॥३०॥
विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपे-ष्वाद्येषु वाक्येषु च का त्वदन्या। ममत्वगर्तेऽतिमहान्धकारे विभ्रामयत्येतदतीव विश्वम्॥३१॥
रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र। दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम्॥३२॥
विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम्। विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः॥३३॥
देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते-र्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः। पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु
उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान्॥३४॥
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि। त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव॥३५॥
देव्युवाच॥३६॥
वरदाहं सुरगणा वरं यन्मनसेच्छथ। तं वृणुध्वं प्रयच्छामि जगतामुपकारकम्॥३७॥
देवा ऊचुः॥३८॥
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥३९॥
देव्युवाच॥४०॥
वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे। शुम्भो निशुम्भश्चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ॥४१॥
नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा। ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी॥४२॥
पुनरप्यतिरौद्रेण रूपेण पृथिवीतले। अवतीर्य हनिष्यामि वैप्रचित्तांस्तु दानवान्॥४३॥
भक्षयन्त्याश्च तानुग्रान् वैप्रचित्तान्महासुरान्। रक्ता दन्ता भविष्यन्ति दाडिमीकुसुमोपमाः॥४४॥
ततो मां देवताः स्वर्गे मर्त्यलोके च मानवाः। स्तुवन्तो व्याहरिष्यन्ति सततं रक्तदन्तिकाम्॥४५॥
भूयश्च शतवार्षिक्यामनावृष्ट्यामनम्भसि। मुनिभिः संस्तुता भूमौ सम्भविष्याम्ययोनिजा॥४६॥
ततः शतेन नेत्राणां निरीक्षिष्यामि यन्मुनीन्। कीर्तयिष्यन्ति मनुजाः शताक्षीमिति मां ततः॥४७॥
ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः। भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः॥४८॥
शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि। तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यं महासुरम्॥४९॥
दुर्गा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति। पुनश्चाहं यदा भीमं रूपं कृत्वा हिमाचले॥५०॥
रक्षांसि भक्षयिष्यामि मुनीनां त्राणकारणात्। तदा मां मुनयः सर्वे स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः॥५१॥
भीमा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति। यदारुणाख्यस्त्रैलोक्ये महाबाधां करिष्यति॥५२॥
तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वाऽसंख्येयषट्पदम्। त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम्॥५३॥
भ्रामरीति च मां लोकास्तदा स्तोष्यन्ति सर्वतः। इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति॥५४॥
तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्॥ॐ॥५५॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये देव्याः स्तुतिर्नामैकादशोऽध्यायः॥११॥
उवाच ४, अर्धश्लोकः १, श्लोकाः ५०, एवम् ५५, एवमादितः॥६३०॥
॥श्रीदुर्गासप्तशती - द्वादशोऽध्यायः॥
देवी-चरित्रों के पाठ का माहात्म्य।
॥ध्यानम्॥
ॐ विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां
कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम्।
हस्तैश्चक्रगदासिखेटविशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं
बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे॥
"ॐ" देव्युवाच॥१॥
एभिः स्तवैश्च मां नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः। तस्याहं सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम्॥२॥
मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम्। कीर्तयिष्यन्ति ये तद्वद् वधं शुम्भनिशुम्भयोः॥३॥
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां चैकचेतसः। श्रोष्यन्ति चैव ये भक्त्या मम माहात्म्यमुत्तमम्॥४॥
न तेषां दुष्कृतं किञ्चिद् दुष्कृतोत्था न चापदः। भविष्यति न दारिद्र्यं न चैवेष्टवियोजनम्॥५॥
शत्रुतो न भयं तस्य दस्युतो वा न राजतः। न शस्त्रानलतोयौघात्कदाचित्सम्भविष्यति॥६॥
तस्मान्ममैतन्माहात्म्यं पठितव्यं समाहितैः। श्रोतव्यं च सदा भक्त्या परं स्वस्त्ययनं हि तत्॥७॥
उपसर्गानशेषांस्तु महामारीसमुद्भवान्। तथा त्रिविधमुत्पातं माहात्म्यं शमयेन्मम॥८॥
यत्रैतत्पठ्यते सम्यङ्नित्यमायतने मम। सदा न तद्विमोक्ष्यामि सांनिध्यं तत्र मे स्थितम्॥९॥
बलिप्रदाने पूजायामग्निकार्ये महोत्सवे। सर्वं ममैतच्चरितमुच्चार्यं श्राव्यमेव च॥१०॥
जानताऽजानता वापि बलिपूजां तथा कृताम्। प्रतीच्छिष्याम्यहं प्रीत्या वह्निहोमं तथा कृतम्॥११॥
शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी। तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः॥१२॥
सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः। मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः॥१३॥
श्रुत्वा ममैतन्माहात्म्यं तथा चोत्पत्तयः शुभाः। पराक्रमं च युद्धेषु जायते निर्भयः पुमान्॥१४॥
रिपवः संक्षयं यान्ति कल्याणं चोपपद्यते। नन्दते च कुलं पुंसां माहात्म्यं मम शृण्वताम्॥१५॥
शान्तिकर्मणि सर्वत्र तथा दुःस्वप्नदर्शने। ग्रहपीडासु चोग्रासु माहात्म्यं शृणुयान्मम॥१६॥
उपसर्गाः शमं यान्ति ग्रहपीडाश्च दारुणाः। दुःस्वप्नं च नृभिर्दृष्टं सुस्वप्नमुपजायते॥१७॥
बालग्रहाभिभूतानां बालानां शान्तिकारकम्। संघातभेदे च नृणां मैत्रीकरणमुत्तमम्॥१८॥
दुर्वृत्तानामशेषाणां बलहानिकरं परम्। रक्षोभूतपिशाचानां पठनादेव नाशनम्॥१९॥
सर्वं ममैतन्माहात्म्यं मम सन्निधिकारकम्। पशुपुष्पार्घ्यधूपैश्च गन्धदीपैस्तथोत्तमैः॥२०॥
विप्राणां भोजनैर्होमैः प्रोक्षणीयैरहर्निशम्। अन्यैश्च विविधैर्भोगैः प्रदानैर्वत्सरेण या॥२१॥
प्रीतिर्मे क्रियते सास्मिन् सकृत्सुचरिते श्रुते। श्रुतं हरति पापानि तथाऽऽरोग्यं प्रयच्छति॥२२॥
रक्षां करोति भूतेभ्यो जन्मनां कीर्तनं मम। युद्धेषु चरितं यन्मे दुष्टदैत्यनिबर्हणम्॥२३॥
तस्मिञ्छ्रुते वैरिकृतं भयं पुंसां न जायते। युष्माभिः स्तुतयो याश्च याश्च ब्रह्मर्षिभिःकृताः॥२४॥
ब्रह्मणा च कृतास्तास्तु प्रयच्छन्ति शुभां मतिम्। अरण्ये प्रान्तरे वापि दावाग्निपरिवारितः॥२५॥
दस्युभिर्वा वृतः शून्ये गृहीतो वापि शत्रुभिः। सिंहव्याघ्रानुयातो वा वने वा वनहस्तिभिः॥२६॥
राज्ञा क्रुद्धेन चाज्ञप्तो वध्यो बन्धगतोऽपि वा। आघूर्णितो वा वातेन स्थितः पोते महार्णवे॥२७॥
पतत्सु चापि शस्त्रेषु संग्रामे भृशदारुणे। सर्वाबाधासु घोरासु वेदनाभ्यर्दितोऽपि वा॥२८॥
स्मरन्ममैतच्चरितं नरो मुच्येत संकटात्। मम प्रभावात्सिंहाद्या दस्यवो वैरिणस्तथा॥२९॥
दूरादेव पलायन्ते स्मरतश्चरितं मम॥३०॥
ऋषिरुवाच॥३१॥
इत्युक्त्वा सा भगवती चण्डिका चण्डविक्रमा॥३२॥
पश्यतामेव देवानां तत्रैवान्तरधीयत। तेऽपि देवा निरातङ्काः स्वाधिकारान् यथा पुरा॥३३॥
यज्ञभागभुजः सर्वे चक्रुर्विनिहतारयः। दैत्याश्च देव्या निहते शुम्भे देवरिपौ युधि॥३४॥
जगद्विध्वंसिनि तस्मिन् महोग्रेऽतुलविक्रमे। निशुम्भे च महावीर्ये शेषाः पातालमाययुः॥३५॥
एवं भगवती देवी सा नित्यापि पुनः पुनः। सम्भूय कुरुते भूप जगतः परिपालनम्॥३६॥
तयैतन्मोह्यते विश्वं सैव विश्वं प्रसूयते। सा याचिता च विज्ञानं तुष्टा ऋद्धिं प्रयच्छति॥३७॥
व्याप्तं तयैतत्सकलं ब्रह्माण्डं मनुजेश्वर। महाकाल्या महाकाले महामारीस्वरूपया॥३८॥
सैव काले महामारी सैव सृष्टिर्भवत्यजा। स्थितिं करोति भूतानां सैव काले सनातनी॥३९॥
भवकाले नृणां सैव लक्ष्मीर्वृद्धिप्रदा गृहे। सैवाभावे तथाऽलक्ष्मीर्विनाशायोपजायते॥४०॥
स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्धूपगन्धादिभिस्तथा। ददाति वित्तं पुत्रांश्च मतिं धर्मे गतिं शुभाम्॥ॐ॥४१॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये फलस्तुतिर्नाम द्वादशोऽध्यायः॥१२॥
उवाच २, अर्धश्लोकौ २, श्लोकाः ३७, एवम् ४१, एवमादितः॥६७१॥
॥श्रीदुर्गासप्तशती - त्रयोदशोऽध्यायः॥
सुरथ और वैश्य को देवी का वरदान।
॥ध्यानम्॥
ॐ बालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम्।
पाशाङ्कुशवराभीतीर्धारयन्तीं शिवां भजे॥
"ॐ" ऋषिरुवाच॥१॥
एतत्ते कथितं भूप देवीमाहात्म्यमुत्तमम्। एवंप्रभावा सा देवी ययेदं धार्यते जगत्॥२॥
विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया। तया त्वमेष वैश्यश्च तथैवान्ये विवेकिनः॥३॥
मोह्यन्ते मोहिताश्चैव मोहमेष्यन्ति चापरे। तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्वरीम्॥४॥
आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा॥५॥
मार्कण्डेय उवाच॥६॥
इति तस्य वचः श्रुत्वा सुरथः स नराधिपः॥७॥
प्रणिपत्य महाभागं तमृषिं शंसितव्रतम्। निर्विण्णोऽतिममत्वेन राज्यापहरणेन च॥८॥
जगाम सद्यस्तपसे स च वैश्यो महामुने। संदर्शनार्थमम्बाया नदीपुलिनसंस्थितः॥९॥
स च वैश्यस्तपस्तेपे देवीसूक्तं परं जपन्। तौ तस्मिन पुलिने देव्याः कृत्वा मूर्तिं महीमयीम्॥१०॥
अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः। निराहारौ यताहारौ तन्मनस्कौ समाहितौ॥११॥
ददतुस्तौ बलिं चैव निजगात्रासृगुक्षितम्। एवं समाराधयतोस्त्रिभिर्वर्षैर्यतात्मनोः॥१२॥
परितुष्टा जगद्धात्री प्रत्यक्षं प्राह चण्डिका॥१३॥
देव्युवाच॥१४॥
यत्प्रार्थ्यते त्वया भूप त्वया च कुलनन्दन। मत्तस्तत्प्राप्यतां सर्वं परितुष्टा ददामि तत्॥१५॥
मार्कण्डेय उवाच॥१६॥
ततो वव्रे नृपो राज्यमविभ्रंश्यन्यजन्मनि। अत्रैव च निजं राज्यं हतशत्रुबलं बलात्॥१७॥
सोऽपि वैश्यस्ततो ज्ञानं वव्रे निर्विण्णमानसः। ममेत्यहमिति प्राज्ञः सङ्गविच्युतिकारकम्॥१८॥
देव्युवाच॥१९॥
स्वल्पैरहोभिर्नृपते स्वं राज्यं प्राप्स्यते भवान्॥२०॥
हत्वा रिपूनस्खलितं तव तत्र भविष्यति॥२१॥
मृतश्च भूयः सम्प्राप्य जन्म देवाद्विवस्वतः॥२२॥
सावर्णिको नाम मनुर्भवान् भुवि भविष्यति॥२३॥
वैश्यवर्य त्वया यश्च वरोऽस्मत्तोऽभिवाञ्छितः॥२४॥
तं प्रयच्छामि संसिद्ध्यै तव ज्ञानं भविष्यति॥२५॥
मार्कण्डेय उवाच॥२६॥
इति दत्त्वा तयोर्देवी यथाभिलषितं वरम्॥२७॥
बभूवान्तर्हिता सद्यो भक्त्या ताभ्यामभिष्टुता। एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः॥२८॥
सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः॥२९॥
एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः॥क्लीं ॐ॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये सुरथवैश्ययोर्वरप्रदानं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥
१३॥
उवाच ६, अर्धश्लोकाः ११, श्लोकाः १२, एवम् २९, एवमादितः॥७००॥
समस्ता उवाचमन्त्राः ५७, अर्धश्लोकाः ४२, श्लोकाः ५३५, अवदानानि॥६६॥
दस महाविद्या
काली, तारा महाविद्या, षोडशी भुवनेश्वरी।
भैरवी, छिन्नमस्तिका च विद्या धूमावती तथा॥
बगला सिद्धविद्या च मातंगी कमलात्मिका।
एता दश-महाविद्याः सिद्ध-विद्याः प्रकीर्तिताः॥
दस महाविद्या दुर्गा के ही रूप है जिसे सिद्धि देने वाली मानी जाती है। मां दुर्गा के इन दस महाविद्याओं की साधना करने वाला व्यक्ति सभी भौतिक सुखों को प्राप्त कर बंधन से भी मुक्त हो जाता है। ये दस महाविद्याएं इस प्रकार है - काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी व कमला।
श्री देवीभागवत पुराण के अनुसार महाविद्याओं की उत्पत्ति भगवान शिव और सती के बीच एक विवाद के कारण हुई। सती के पिता दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने सभी देवी-देवताओं को आमन्त्रित किया लेकिन द्वेषवश उन्होंने अपने जामाता भगवान शंकर और अपनी पुत्री सती को निमन्त्रित नहीं किया। सती, पिता के द्वारा आयोजित यज्ञ में जाने की जिद करने लगीं जिसे शिव ने उन्हें न जाने के लिए समझाया। परंतु सती अपने पिता के आयोजित यज्ञ में जाने के लिए हठ कर रही थी। तब शिव के समझाने पर भी अपनी हठ पकड़े हुए सती ने स्वयं को एक भयानक रूप में परिवर्तित कर लिया। जो स्वयं में महाकाली अवतार में प्रकट हुई। जिसे देख भगवान शिव वहां से भागने को उद्यत हुए। अपने पति को डरा या रुष्ट हुआ जानकर माता सती उन्हें रोकने लगीं। शिव जिस दिशा में गये उस दिशा में माँ का एक अन्य विग्रह प्रकट होकर उन्हें रोकता है। इस प्रकार दसों दिशाओं में माँ ने वे दस रूप लिए थे वे ही दस महाविद्याएँ कहलाईं। इस प्रकार देवी दस रूपों में विभाजित हो गयीं जिनसे वह शिव के विरोध को हराकर यज्ञ में भाग लेने गयीं।
हमारे प्राचीन ग्रंथों में दस महाविद्याओं का उल्लेख है जिनकी पूजा हर प्रकार की शक्तियों को प्राप्त करने के लिए की जाती है। महाविद्या पूजा को साधना के रूप में जाना जाता है जिसमें उपासक एक ही देवी को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए ध्यान केंद्रित करता है। किसी भी साधना में यंत्र और मंत्र बहुत ही प्रभावशाली माध्यम माने जाते हैं जिनके माध्यम से उपासक अपने लक्ष्य तक पहुंच सकता है और उसे करने के अपने मकसद को पूरा कर सकता है। तांत्रिकों द्वारा दस महाविद्याओं की साधना की जाती है, जो कि गुप्त होती हैं।
दस महाविद्याओं की पूजा से भक्तो को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
काली कुल तथा श्रीकुल
दस महाविद्याओं को दो कुलों में विभाजित किया गया है।
काली कुल – मां काली, मां तारा और मां भुवनेश्वरी
श्रीकुल – मां बगलामुखी, मां कमला, मां छिन्नमस्ता, मां त्रिपुर सुंदरी, मां भैरवी, मां मांतगी और मां धूमावती
प्रथम महाविद्या - काली
दस महाविद्या की प्रथम देवी - आदिशक्ति काली
काली, परब्रह्म का परम रूप, "काल की भी काल," कालीकुल प्रणालियों की सर्वोच्च देवता, महाकाली। महाकाली का रंग गहरा काला है, जो मृत्यु-रात्रि के अंधेरे से भी गहरा है। उनकी तीन आंखें हैं, जो भूत, वर्तमान और भविष्य का प्रतिनिधित्व करती हैं। उसके चमकदार सफेद, नुकीले दांत, खुला मुंह और उसकी लाल, खूनी जीभ वहां से लटकी हुई है। उसके असीमित, अस्त-व्यस्त बाल हैं। उसने अपने वस्त्र के रूप में बाघ की खाल, खोपड़ियों की माला और गले में गुलाबी लाल फूलों की माला पहनी हुई थी, और उसकी कमर पर कंकाल की हड्डियाँ, कंकाल के हाथ और साथ ही बोहोतसारे कटे हुए हाथ और पाँव उसके आभूषण के रूप में सुशोभित है। उस देवी के चार हाथ हैं, उनमें से दो के पास त्रिशूल और तलवार है और एक राक्षस का कटा हुआ सिर पकड़े हुए है और एक कटोरा है जो राक्षस के सिर से टपकते खून को इकट्ठा करता है।
उद्देश्य - विद्या, लक्ष्मी, राज्य, अष्टसिद्धि, वशीकरण, प्रतियोगिता विजय, युद्ध-चुनाव आदि में विजय एवम् मोक्ष तक प्राप्त होता है।
इनके भैरव कालभैरव हैं।
लाल रंग के वस्त्र पहन कर तथा लाल आसन पर बैठकर काली हकीक की माला से जप करें ।
दिशा - पूर्व अथवा उत्तर।
नियमित उपासक - ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय से डेढ़ घंटे के भीतर करें।
साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।
मूल मंत्र - ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं स्वाहा।
शाबर मन्त्र - ॐ निरंजन निराकार अवगत पुरुष तत-सार, तत-सार मध्ये ज्योत, ज्योत मध्ये परम-ज्योत, परम-ज्योत मध्ये उत्पन्न भई माता शम्भु शिवानी काली ॐ काली काली महाकाली, कृष्ण वर्णी, शव वाहिनी, रुद्र की पोषणी, हाथ खप्पर खडग धारी, गले मुण्डमाला हंस मुखी । जिह्वा ज्वाला दन्त काली । मद्यमांस कारी श्मशान की राणी । मांस खाये रक्त पीवे । भस्मन्ती माई जहां पाई तहां लगाई। सत की नाती धर्म की बेटी इन्द्र की साली काल की काली जोग की जोगन, नागों की नागन मन माने तो संग रमाई नहीं तो श्मशान फिरे अकेली चार वीर अष्ट भैरों, घोर काली अघोर काली अजर बजर अमर काली भख जून निर्भय काली बला भख, दुष्ट को भख, काल भख पापी पाखण्डी को भख जती सती को रख, ॐ काली तुम बाला ना वृद्धा, देव ना दानव, नर ना नारी देवीजी तुम तो हो परब्रह्मा काली ।
द्वितीय महाविद्या - तारा
दस महाविद्या की द्वितीय देवी – तारा अथवा श्मशान तारा
तारा देवी मार्गदर्शक और रक्षक के रूप में है। जो परम ज्ञान प्रदान करती है जो मोक्ष देती है। वह ऊर्जा के सभी स्रोतों की देवी हैं। सूर्य को भी उसीसे ऊर्जा प्राप्त है। वह समुद्र मंथन की घटना के बाद भगवान शिव की मां के रूप में प्रकट हुईं ताकि उन्हें अपने बच्चे के रूप में पाकर शिव जी को स्वस्थ कर सके। तारा हल्के नीले रंग की है। उसके बाल बिखरे हुए हैं, वह अर्धचंद्र के अंक से सुशोभित मुकुट पहने हुए है। उसकी तीन आंखें हैं, उसके गले में मौज से लिपटा एक सांप, बाघ की खाल पहने हुए, और खोपड़ी की एक माला। वह बाघ की खाल से बना पल्ला अपनी कमर में पहने हुई हैं। उसके चार हाथों में एक कमल, कृपाण, राक्षस का सिर और कतरनी है। उनका बायां पैर लेटे हुए शिव पर टिका है। समय आने पर वह अपनी भुजाओ की क्षमता बढ़ा सकती है।
उद्देश्य - शत्रुओं का नाश, ज्ञान तथा जीवन के हर क्षेत्र में सफलता के लिए इनकी साधना की जाती है।
इनके भैरव अक्षोभ्य हैं।
श्वेत वस्त्र पहन कर तथा लाल आसन पर बैठकर स्फटिक माला से जप करें ।
दिशा - दक्षिण
स्थान - श्मशान भूमि
नियमित उपासक - इनकी साधना न करें।
साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।
मूल मंत्र - ॐ ऐं ओं क्रीं क्रीं हूं फट्।
मंत्र - ऐं ऊँ ह्रीं क्रीं हूं फट्।
मंत्र - ॐ ह्रीं स्त्रीं फट्।
शाबर मन्त्र - ॐ आदि योग अनादि माया जहाँ पर ब्रह्माण्ड उत्पन्न भया । ब्रह्माण्ड समाया आकाश मण्डल तारा त्रिकुटा तोतला माता तीनों बसै ब्रह्म कापलि, जहाँ पर ब्रह्मा-विष्णु-महेश उत्पत्ति, सूरज मुख तपे चंद मुख अमिरस पीवे, अग्नि मुख जले, आद कुंवारी हाथ खड्ग गल मुण्ड माल, मुर्दा मार ऊपर खड़ी देवी तारा । नीली काया पीली जटा, काली दन्त में जिह्वा दबाया । घोर तारा अघोर तारा, दूध पूत का भण्डार भरा । पंच मुख करे हां हां ऽऽकारा, डाकिनी शाकिनी भूत पलिता सौ सौ कोस दूर भगाया । चण्डी तारा फिरे ब्रह्माण्डी तुम तो हों तीन लोक की जननी ।
तीसरा महाविद्या - षोडशी | त्रिपुर सुंदरी
दस महाविद्या की तीसरी देवी – षोडशी, ललिता त्रिपुर सुंदरी, श्रीविद्या, राजराजेश्वरी, महात्रिपुरसुन्दरी, बाला, बालापञ्चदशी जैसे अनेक नाम है ।
कुछ ग्रंथो के अनुसार ये चतुर्थ देवी है। परंतु इनकी पूजा नवरात्री की तीसरी रात्रि को करते है।
त्रिपुरा सुंदरी (षोडशी, ललिता) देवी जो "तीन लोकों में सुंदर" हैं। श्रीकुल प्रणालियों की सर्वोच्च देवता है। "तांत्रिक पार्वती" या "मोक्ष मुक्ता" नाम से भी जानी जाती है। यह देवी के शाश्वत सर्वोच्च निवास मणिद्वीप की प्रमुख देवता हैं। षोडशी का रंग पिघले हुए सोने की तरह है। वह तीन शांत आँखे, शांत चेहरे, लाल और गुलाबी वस्त्र पहने हुए, अपने दिव्य अंगों और चार हाथों पर आभूषणों से सुशोभित दिख रही है। उसके हाथ में अंकुश, कमल, धनुष और तीर है। वह सिंहासन पर बैठी है।
उद्देश्य - हर क्षेत्र में सफलता हेतु इनकी साधना की जाती है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए। अपार धन-समृद्धी एवम् यश प्राप्ति के लिए।
इनके भैरव पंचवक्त्र शिव हैं।
प्रतिरूप - श्री यंत्र अथवा कमल पर विराजमान माता लक्ष्मी।
दिशा - पूर्व अथवा उत्तर।
कुशासन अथवा लाल या पीला कंबल आसन। वस्त्र, नैवेद्य सभी पीत अथवा लाल अथवा श्वेत होने चाहिए। स्फटिक माला से जप करें ।
नियमित उपासक - ब्रह्म मुहूर्त करें।
नियमित उपासक - ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय से डेढ़ घंटे के भीतर अथवा रात्रि १० के बाद करें।
साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।
मूल मंत्र - श्री ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं क्रीं कए इल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।
मंत्र - ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं क ए ह ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं महाज्ञानमयी विद्या षोडशी मॉं सदा अवतु।।
शाबर मन्त्र - ॐ निरञ्जन निराकार अवधू मूल द्वार में बन्ध लगाई पवन पलटे गगन समाई, ज्योति मध्ये ज्योत ले स्थिर हो भई ॐ मध्याः उत्पन्न भई उग्र त्रिपुरा सुन्दरी शक्ति आवो शिवधर बैठो, मन उनमन, बुध सिद्ध चित्त में भया नाद । तीनों एक त्रिपुर सुन्दरी भया प्रकाश । हाथ चाप शर धर एक हाथ अंकुश । त्रिनेत्रा अभय मुद्रा योग भोग की मोक्षदायिनी । इडा पिंगला सुषम्ना देवी नागन जोगन त्रिपुर सुन्दरी । उग्र बाला, रुद्र बाला तीनों ब्रह्मपुरी में भया उजियाला । योगी के घर जोगन बाला, ब्रह्मा विष्णु शिव की माता ।
पाठ - श्री सूक्तम् ।
चतुर्थ महाविद्या - छिन्नमस्ता
दस महाविद्या की चतुर्थ देवी – छिन्नमस्ता।
कुछ ग्रंथो के अनुसार ये तृतीय देवी है। परंतु इनकी पूजा नवरात्री की चतुर्थ रात्रि को करते है।
छिन्नमस्ता स्वयंभू देवी है जिसने जय और विजय अर्थात रजस और तमस गुणों को संतुष्ट करने के लिए उसने अपना सिर काट लिया है । छिन्नमस्ता का रंग लाल है, जो भयानक रूप के साथ सन्निहित है। उसके बिखरे बाल हैं। उसके चार हाथ हैं, जिनमें से एक हाथ में तलवार है और दूसरे हाथ में स्वयं का कटा हुआ सिर है। वह भयानक चेहरे वाली तीन चमकती आंखें धारण किये, मुकुट पहने हुए है। उसके दो अन्य हाथों में से एक में कमंद और दूसरे में पीने का कटोरा है। वह एक आंशिक रूप से कपड़े पहने महिला है, जो उसके अंगों पर आभूषणों से सुशोभित है और उसके शरीर पर खोपड़ी की माला है। वह एक मैथुन करने वाले जोड़े की पीठ पर खड़ी है।
उद्देश्य - संतान प्राप्ति, दरिद्रता निवारण, काव्य शक्ति लेखन, शत्रु-विजय, समूह-स्तम्भन, राज्य-प्राप्ति, कुंडलिनी जागरण एवम् मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इनके भैरव क्रोध भैरव हैं।
श्वेत वस्त्र पहन कर तथा लाल कंबल आसन पर बैठकर स्फटिक माला से जप करें ।
दिशा – दक्षिण अथवा पूर्व अथवा उत्तर।
स्थान - श्मशान भूमि अथवा गुरु के मार्गदर्शन से मन्दिर में साधना करें ।
नियमित उपासक - इनकी साधना न करें।
साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।
मूल मंत्र - श्री ह्रीं क्लीं ऐं वज्रवैरोचनीये हूं हूं फट् स्वाहा।
शाबर मन्त्र - सत का धर्म सत की काया, ब्रह्म अग्नि में योग जमाया । काया तपाये जोगी (शिव गोरख) बैठा, नाभ कमल पर छिन्नमस्ता, चन्द सूर में उपजी सुष्मनी देवी, त्रिकुटी महल में फिरे बाला सुन्दरी, तन का मुन्डा हाथ में लिन्हा, दाहिने हाथ में खप्पर धार्या । पी पी पीवे रक्त, बरसे त्रिकुट मस्तक पर अग्नि प्रजाली, श्वेत वर्णी मुक्त केशा कैची धारी । देवी उमा की शक्ति छाया, प्रलयी खाये सृष्टि सारी । चण्डी, चण्डी फिरे ब्रह्माण्डी भख भख बाला भख दुष्ट को मुष्ट जती, सती को रख, योगी घर जोगन बैठी, श्री शम्भुजती गुरु गोरखनाथजी ने भाखी । छिन्नमस्ता जपो जाप, पाप कन्टन्ते आपो आप, जो जोगी करे सुमिरण पाप पुण्य से न्यारा रहे । काल ना खाये ।
पांचवी महाविद्या - भुवनेश्वरी
दस महाविद्या की पांचवी देवी – भुवनेश्वरी
कुछ ग्रंथो के अनुसार ये चतुर्थ देवी है। परंतु इनकी पूजा नवरात्री की पांचवी रात्रि को करते है।
भुवनेश्वरी विश्व माता के रूप में हैं। इनका शरीर सभी १४ लोक एवं संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। भुवनेश्वरी गोरी, सुनहरे रंग की है। इसकी तीन संतुष्ट आँखें और साथ ही शांत भाव है। वह लाल और पीले वस्त्र पहनती है। उसके अंग आभूषणों से सुशोभित है और उसके चार हाथ हैं। उसके चार में से दो हाथों में अंकुश और फंदा है जबकि उसके दो अन्य हाथ खुले हैं। वह दिव्य सिंहासन पर विराजमान है। बाघ पर बैठती है तो स्वयं जगदम्बा है।
भगवान कृष्ण की भी माता भुवनेश्वरी आराध्या रही हैं जिससे वे 'योगेश्वर' कहलाए।
उद्देश्य - इनका साधक कीचड़ में कमल की तरह संसार में रहकर भी योगी कहलाता है। वशीकरण, सम्मोहन, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष देती हैं।
इनके भैरव त्र्यम्बक शिव हैं।
रक्त वर्ण के वस्त्र पहन कर तथा रक्त वर्ण के आसन पर बैठकर स्फटिक माला से जप करें ।
दिशा – दक्षिण अथवा पूर्व अथवा उत्तर।
नियमित उपासक - ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय से डेढ़ घंटे के भीतर करें।
साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।
मूल मंत्र - ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं सौ: भुवनेश्वर्ये नम:।
मूल मंत्र - ह्रीं।
मूल मंत्र - ऐं ह्रीं।
मूल मंत्र - ऐं ह्रों ऐं।
मूल मंत्र - ऐं ह्रीं श्रीं।
शाबर मन्त्र - ॐ आदि ज्योति अनादि ज्योत ज्योत मध्ये परम ज्योत परम ज्योति मध्ये शिव गायत्री भई उत्पन्न, ॐ प्रातः समय उत्पन्न भई देवी भुवनेश्वरी । बाला सुन्दरी कर धर वर पाशांकुश अन्नपूर्णी दूध पूत बल दे बालका ऋद्धि सिद्धि भण्डार भरे, बालकाना बल दे जोगी को अमर काया । चौदह भुवन का राजपाट संभाला कटे रोग योगी का, दुष्ट को मुष्ट, काल कन्टक मार । योगी बनखण्ड वासा, सदा संग रहे भुवनेश्वरी माता ।
छठी महाविद्या - त्रिपुर भैरवी
दस महाविद्या की छठी देवी – त्रिपुर भैरवी जिनके अन्य नाम भैरवी, नित्य भैरवी, भद्र भैरवी, श्मशान भैरवी, सकल सिद्धि भैरवी, पाताल भैरवी, संपत-प्रदा भैरवी, कामेश्वरी भैरवी है।
कुछ ग्रंथो के अनुसार ये पांचवी देवी है। परंतु इनकी पूजा नवरात्री की छठी रात्रि को करते है।
भैरवी एक उग्र देवी है। भैरव का स्त्री रूप है। भैरवी उग्र ज्वालामुखी के समान लाल रंग की है, जिसकी तीन उग्र आँखें और अस्त-व्यस्त बाल हैं। उसके उलझे हुए बाल गोखरू में बंधे हैं, और अर्धचंद्र द्वारा सजाये गए है। उसके शीश को दो सींगों सुशोभित कर रहे है। उसके रक्त से लाल मुंह को दो उभरे हुए दांत शोभा दे रहे हैं। वह लाल और नीले रंग के वस्त्र पहनी है और उसके गले में खोपड़ियों की माला सुशोभित है। वह कटे हुए हाथों और उससे जुड़ी हड्डियों से सजी माला अपने कमर में पहनी हुई है । वह अपने आभूषण के रूप में सांपों और नागों से अलंकृत है। उसके चार हाथों में से दो खुले हुए हैं और दो में एक माला और पुस्तक धरे हुए है।
उद्देश्य - ऐश्वर्य प्राप्ति, रोग-शांति, त्रैलोक्य विजय व आर्थिक उन्नति के लिए पूजी जाती हैं।
इनके भैरव बटुक भैरव हैं। चाहे इनके भैरव बटुक भैरव है, इनकी पूजा करते समय काल भैरव की पूजा अवश्य करें।
रक्त वर्ण के वस्त्र पहन कर तथा रक्त वर्ण के आसन पर बैठकर स्फटिक माला से जप करें ।
दिशा – पूर्व।
नियमित उपासक - ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय से डेढ़ घंटे के भीतर करें।
साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।
मूल मंत्र - हसरैं हसकलरीं हसरौ:।
मूल मंत्र - हस: हसकरी हसे।
मंत्र - हस्त्रौं हस्क्लरीं हस्त्रौं।।
मंत्र - ह्रीं भैरवी क्लौं ह्रीं स्वाहा ।
मंत्र - ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम: ।
मंत्र - ॐ ह्रीं सर्वैश्वर्याकारिणी देव्यै नमो नम:।
शाबर मन्त्र - ॐ सती भैरवी भैरो काल यम जाने यम भूपाल तीन नेत्र तारा त्रिकुटा, गले में माला मुण्डन की । अभय मुद्रा पीये रुधिर नाशवन्ती ! काला खप्पर हाथ खंजर कालापीर धर्म धूप खेवन्ते वासना गई सातवें पाताल, सातवें पाताल मध्ये परम-तत्त्व परम-तत्त्व में जोत, जोत में परम जोत, परम जोत में भई उत्पन्न काल-भैरवी, त्रिपुर- भैरवी, समपत-प्रदा-भैरवी, कौलेश- भैरवी, सिद्धा-भैरवी, विध्वंशिनी-भैरवी, चैतन्य-भैरवी, कमेश्वरी-भैरवी, षटकुटा-भैरवी, नित्या-भैरवी, जपा-अजपा गोरक्ष जपन्ती यही मन्त्र मत्स्येन्द्रनाथजी को सदा शिव ने कहायी । ऋद्ध फूरो सिद्ध फूरो सत श्रीशम्भुजती गुरु गोरखनाथजी अनन्त कोट सिद्धा ले उतरेगी काल के पार, भैरवी भैरवी खड़ी जिन शीश पर, दूर हटे काल जंजाल भैरवी मन्त्र बैकुण्ठ वासा । अमर लोक में हुवा निवासा ।
पूजा- श्री दुर्गा सप्तशती में महिषासुर वध का अध्याय करें।
सातवीं महाविद्या - धूमावती
दस महाविद्या की सातवीं देवी – धूमावती है। जो ज्येष्ठा लक्ष्मी कहलाती हैं।
धूमावती एक विधवा का रूप धारण किये है। यह धुएँ के रंग के गहरे भूरे रंग की है। उसकी त्वचा झुर्रीदार है। उसका मुँह सूख गया है। उसके कुछ दाँत गिर गए हैं। उसके लंबे बिखरे हुए बाल भूरे हैं। उसकी आँखें रक्तवर्ण के रूप में दिखाई देती हैं। इस देवी को एक भयावह स्थिति, जिसे क्रोध, दुख, भय, थकावट, बेचैनी, निरंतर भूख और प्यास के संयुक्त स्रोत के रूप में देखा जाता है। वह सफेद कपड़े पहनती है और विधवा के वेश में। वह अपने परिवहन के वाहन के रूप में एक घोड़े रहित रथ में बैठी है। उसके रथ के शीर्ष पर एक ध्वजा है जिसका प्रतिक एक कौआ है। उसके दो कांपते हाथ हैं, उसका एक हाथ वरदान और ज्ञान प्रदान करता है और दूसरे हाथ में सूप की टोकरी है।
उद्देश्य - कर्ज से मुक्ति, दरिद्र दूर करने, जमीन-जायदाद के झगड़े निपटाने, उधारी वसूलने के लिए पूजी जाती हैं।
इनके कोई भैरव नहीं है।
अन्य देवियों की तरह पूजन सामग्री निषेध है। रंगीन वस्तु कोई भी नहीं चढ़ाई जाती है।
श्वेत वर्ण के वस्त्र पहन कर तथा श्वेत वर्ण के आसन पर बैठकर तुलसी की माला से जप करें ।
दिशा – दक्षिण अथवा उत्तर।
स्थान - श्मशान भूमि अथवा शून्यागार में गुरु के मार्गदर्शन में साधना करें ।
नियमित उपासक - इनकी साधना न करें।
साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।
मूल मंत्र - धूं धूं धूमावती स्वाहा ।
मूल मंत्र - धूं धूं धूमावती ठ: ठ:।
शाबर मन्त्र - ॐ पाताल निरंजन निराकार, आकाश मण्डल धुन्धुकार, आकाश दिशा से कौन आये, कौन रथ कौन असवार, आकाश दिशा से धूमावन्ती आई, काक ध्वजा का रथ अस्वार आई थरै आकाश, विधवा रुप लम्बे हाथ, लम्बी नाक कुटिल नेत्र दुष्टा स्वभाव, डमरु बाजे भद्रकाली, क्लेश कलह कालरात्रि । डंका डंकनी काल किट किटा हास्य करी । जीव रक्षन्ते जीव भक्षन्ते जाजा जीया आकाश तेरा होये । धूमावन्तीपुरी में वास, न होती देवी न देव तहा न होती पूजा न पाती तहा न होती जात न जाती तब आये श्रीशम्भुजती गुरु गोरखनाथ आप भयी अतीत ।
आठवीं महाविद्या - बगलामुखी
दस महाविद्या की आठवीं देवी – माँ बगलामुखी है। जो माँ पीताम्बरा कहलाती हैं।
यह युग इनका ही है।
बगलामुखी देवी शत्रुओं का नाश करती हैं। इस देवी को पीताम्बरा भी कहते है। देवी बगलामुखी का रंग पिघले हुए सोने जैसा है। उसकी तीन चमकदार आंखें, हरे-भरे काले बाल और सौम्य चेहरा हैं। वह पीले रंग के वस्त्र और आभूषण पहने हैं। उसके दो हाथों में से एक के गदा है और दूसरे हाथ में राक्षस मदनासुर की जीभ पकड़ी हुई है। वह सिंहासन अर्थात सारस की पीठ पर बैठी हुई है।
उद्देश्य - रोग-दोष, शत्रु शांति, वाद-विवाद, कोर्ट-कचहरी में विजय, युद्ध-चुनाव विजय, वशीकरण, स्तम्भन तथा धन प्राप्ति के लिए अचूक साधना मानी जाती है। व्यापार वृद्धि एवं राजसत्ता की प्राप्ति के लिए पूजी जाती हैं।
इनके भैरव मृत्युंजय है।
विशेष सावधानी आवश्यक है। पीला आसन, पीला वस्त्र, हरिद्रा माला का प्रयोग होता है।
दिशा- पूर्व अथवा उत्तर।
गुरु के मार्गदर्शन में साधना करें ।
नियमित उपासक - इनके मूल मंत्र का सवा लाख का अनुष्ठान स्वयं करके या किसी ब्राह्मण से करवाने के बाद ही दिनचर्या में मंत्र जाप करें।
नियमित उपासक - ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय से डेढ़ घंटे के भीतर करें।
साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।
मूल मंत्र- ह्लीं ।
मूल मंत्र- ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय, जिव्हा कीलय, बुद्धिं विनाश्य ह्लीं ॐ स्वाहा।
शाबर मन्त्र - ॐ सौ सौ दुता समुन्दर टापू, टापू में थापा सिंहासन पीला । संहासन पीले ऊपर कौन बसे । सिंहासन पीला ऊपर बगलामुखी बसे, बगलामुखी के कौन संगी कौन साथी । कच्ची-बच्ची-काक-कूतिया-स्वान-चिड़िया, ॐ बगला बाला हाथ मुद्-गर मार, शत्रु हृदय पर सवार तिसकी जिह्वा खिच्चै बाला । बगलामुखी मरणी करणी उच्चाटण धरणी, अनन्त कोट सिद्धों ने मानी ॐ बगलामुखी रमे ब्रह्माण्डी मण्डे चन्दसुर फिरे खण्डे खण्डे । बाला बगलामुखी नमो नमस्कार ।
नौंवी महाविद्या - मातङ्गी
दस महाविद्या की नौंवी देवी – मातङ्गी है।
देवी मातंगी श्रीकुल प्रणाली में प्रधान मंत्री या अमात्य के रुप में है। इसे "तांत्रिक सरस्वती" भी कहते है। इसका रंग पन्ना की तरह हरा है। उसके चमके अस्त-व्यस्त काले बाल और तीन शांत आँखें है। उनका चेहरा शांत है। वह अपने नाजुक अंगों पर विभिन्न आभूषणों से सजी लाल वस्त्र और परिधान पहने हुए हैं। वह एक राजसी सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके चार हाथ हैं, जिनमें से तीन में एक हाथ में तलवार, एक में खोपड़ी और एक में वीणा है। उनका एक हाथ अपने भक्तों को वरदान देता है। माता ज्ञान देते समय सरस्वती के रुप में दिखाई देती है।
उद्देश्य - शीघ्र विवाह, गृहस्थ जीवन सुखी बनाने, वशीकरण, गीत-संगीत में सिद्धि प्राप्त करने के लिए पूजी जाती हैं।
इनके भैरव मातङ्ग है।
दिशा- पूर्व अथवा उत्तर।
नियमित उपासक - ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय से डेढ़ घंटे के भीतर अथवा रात्रि १० के बाद करें।
साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।
मूल मंत्र- श्री ह्रीं क्लीं हूं मातङ᳭गयै फट् स्वाहा।
शाबर मन्त्र - ॐ शून्य शून्य महाशून्य, महाशून्य में ओंकार, ओंकार मे शक्ति, शक्ति अपन्ते उहज आपो आपना, सुभय में धाम कमल में विश्राम, आसन बैठी, सिंहासन बैठी पूजा पूजो मातंगी बाला, शीश पर शशि अमीरस प्याला हाथ खड्ग नीली काया। बल्ला पर अस्वारी उग्र उन्मत्त मुद्राधारी, उद गुग्गल पाण सुपारी, खीरे खाण्डे मद्य मांसे घृत कुण्डे सर्वांगधारी। बूँद मात्रेन कडवा प्याला, मातंगी माता तृप्यन्ते तृप्यन्ते। ॐ मातंगी, सुंदरी, रूपवन्ती, धनवन्ती, धनदाती, अन्नपूर्णी, अन्नदाती, मातंगी जाप मन्त्र जपे काल का तुम काल को खाये । तिसकी रक्षा शम्भुजती गुरु गोरखनाथजी करे ।
दसवीं महाविद्या - कमला
दस महाविद्या की दसवीं देवी – कमला है। इनके अन्य नाम कमलात्मिका, लक्ष्मी, षोडशी, भार्गवी, त्रिपुरा है।
कमलात्मिका, कमला, कमल, पद्मिनी ऐसे कई नाम है इस देवी के। इसे "तांत्रिक लक्ष्मी" से भी जानते है। यह देवी पिघले हुए सोने के रंग की है। इसके चमकते काले बाल है। इसकी तीन चमकदार और शांत आँखें है। इसकी उदार अभिव्यक्ति है। वह लाल और गुलाबी रंग के वस्त्र और परिधान पहने और अपने अंगों पर विभिन्न आभूषणों और कमलों से सुशोभित दिखाई देती हैं। वह पूरी तरह से खिले हुए कमल पर विराजमान हैं, जबकि उनके चार हाथों में दो कमल हैं, जबकि दो अपने भक्तों की इच्छाओं को पूरी करते हैं और भय से सुरक्षा का आश्वासन देते हैं।
यह देवी त्रिपुर शिव की पत्नी होने से इन्हे त्रिपुरा कहा जाता है। शिव स्वयं की इच्छा से त्रिपुर स्वरूप त्रिधा मतलब तीन भाग में हो गए।
जिनका ऊर्ध्वः भाग गौरवर्ण, चार भुजावला और चतुर्मुख ब्रह्मरूप कहलाया। ब्रह्मा के साथ जुड़ा स्वरूप महासरस्वती कहलाया।
मध्यभाग नीलवर्ण, एक मुख और चतुर्भुज विष्णु कहलाया। विष्णु के साथ जुड़ा स्वरूप कमला एवं महालक्ष्मी कहलाया।
अधोभाग स्फ़टिक वर्ण, पञ्चमुख और चतुर्भुज शिव कहलाया। पार्वती का स्वरूप जो शिव से जुड़ा है वह शक्ति एवं त्रिपुरा कहलाया।
महालक्ष्मी के समुद्र में समाहित होने के पश्चात् देवी कमला समुद्र मंथन के फलस्वरूप प्रादुर्भावित हुई थी। और इन्होने भगवान विष्णु को पतिरुपमें पुनः वरण किया।
उद्देश्य - भौतिक साधनों की वृद्धि, व्यापार-व्यवसाय में वृद्धि, धन-संपत्ति प्राप्त करने एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए के लिए पूजी जाती हैं।
इनके भैरव सदाशिव है।
गुलाबी वस्त्रासन, कमल गट्टे की माला आदि प्रयोग किए जाते हैं। अथवा लाल कंबल आसान एवं स्फटिक या कमलगट्टे की माला का प्रयोग भी किया जा सकता है। बिल्वपत्र एवं बेल फल से हवन एवं पूजा से विशेष लाभ मिलता है।
दिशा- पूर्व अथवा उत्तर। सूर्यास्त के बाद पश्चिम की और मुख करके पूजन कर सकते है।
नियमित उपासक - ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय से डेढ़ घंटे के भीतर अथवा रात्रि १० के बाद करें।
साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।
मूल मंत्र- ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद-प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नम:।
मूल मंत्र- श्रीं ।
मंत्र- ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौः जगत्प्रसूत्यै नमः।।
मंत्र- ॐ ह्रीं क्लीं कमला देवी फट् स्वाहा ।
शाबर मन्त्र - ॐ अयोनि शंकर ॐकार रूप, कमला देवी सती पार्वती का स्वरुप । हाथ में सोने का कलश, मुख से अभय मुद्रा । श्वेत वर्ण सेवा पूजा करे, नारद इन्द्रा । देवी देवत्या ने किया जय ॐकार। कमला देवी पूजो केशर, पान, सुपारी, चकमक चीनी फतरी तिल गुग्गल सहस्र कमलों का किया हवन । कहे गोरख, मन्त्र जपो जाप जपो ऋद्धि-सिद्धि की पहचान गंगा गौरजा पार्वती जान । जिसकी तीन लोक में भया मान । कमला देवी के चरण कमल को आदेश
पाठ - श्री सूक्त, कनकधारा स्तोत्र।
दस महाविद्या दैनिक मंत्र
काली तारा महाविद्या षोडशी भूवनेश्वरी ।
भैरवी छिन्नमस्ता च विद्या धूमावती तथा ॥
बगलासिद्धि विद्या च मातङ᳭गी कमलात्मिका ।
एता दशमहाविद्या: सिद्धी विद्या: प्रकीर्तिता: ॥
दस महाविद्या शाबर मन्त्र
सुनो पार्वती हम मत्स्येन्द्र पूता, आदिनाथ नाती, हम शिव स्वरुप उलटी थापना थापी योगी का योग, दस विद्या शक्ति जानो, जिसका भेद शिव शंकर ही पायो । सिद्ध योग मर्म जो जाने विरला तिसको प्रसन्न भयी महाकालिका । योगी योग नित्य करे प्रातः उसे वरद भुवनेश्वरी माता । सिद्धासन सिद्ध, भया श्मशानी तिसके संग बैठी बगलामुखी । जोगी खड दर्शन को कर जानी, खुल गया ताला ब्रह्माण्ड भैरवी । नाभी स्थाने उडीय्यान बांधी मनीपुर चक्र में बैठी, छिन्नमस्ता रानी । ॐकार ध्यान लाग्या त्रिकुटी, प्रगटी तारा बाला सुन्दरी । पाताल जोगन (कुंडलिनी) गगन को चढ़ी, जहां पर बैठी त्रिपुर सुन्दरी । आलस मोड़े, निद्रा तोड़े तिसकी रक्षा देवी धूमावन्ती करें । हंसा जाये दसवें द्वारे देवी मातंगी का आवागमन खोजे । जो कमला देवी की धूनी चेताये तिसकी ऋद्धि सिद्धि से भण्डार भरे । जो दसविद्या का सुमिरण करे । पाप पुण्य से न्यारा रहे । योग अभ्यास से भये सिद्धा आवागमन निवरते । मन्त्र पढ़े सो नर अमर लोक में जाये ।









