ASTROPRINCIPLE

A Signature Advisory Practice by Ashish Shrungarpure

Demystifying Your Destiny Through Authentic Vedic Astrology & Vastu Shastra

Consultation & Coaching:

Vedic Astrology | Numerology | Vastu Shastra
Kundalini Awakening | Sadhana & Tantra Marg

॥पुरुष सूक्त॥

यजुर्वेद माध्यन्दिन संहिता, अध्याय ३१

ॐ श्री गुरुभ्यो नमः । हरिः ओम् ।

ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात ।
स भूमिं सर्वत स्पृत्वाऽत्यत्तिष्ठद्दशाङ᳭गुलम् ॥१॥
जो सहस्रों सिर वाले, सहस्रों नेत्रवाले और सहस्रों चरण वाले विराट पुरुष हैं, वे सारे ब्रह्माण्ड को आवृत करके भी दस अंगुल शेष रहते हैं ।।1।।

पुरुष एवेदं सर्वं यद᳭भूतं यच्च भाव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥२॥
जो सृष्टि बन चुकी, जो बनने वाली है, यह सब विराट पुरुष ही हैं । इस अमर जीव-जगत के भी वे ही स्वामी हैं और जो अन्न द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हैं, उनके भी वे ही स्वामी हैं ।।2।।

एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥३॥
विराट पुरुष की महत्ता अति विस्तृत है । इस श्रेष्ठ पुरुष के एक चरण में सभी प्राणी हैं और तीन भाग अनंत अंतरिक्ष में स्थित हैं ।।3।।

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः ।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत् साशनानशने अभि ॥४॥
चार भागों वाले विराट पुरुष के एक भाग में यह सारा संसार, जड़ और चेतन विविध रूपों में समाहित है । इसके तीन भाग अनंत अंतरिक्ष में समाये हुए हैं ।।4।।

ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः ।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥५॥
उस विराट पुरुष से यह ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ। उस विराट से समष्टि जीव उत्पन्न हुए । वही देहधारीरूप में सबसे श्रेष्ठ हुआ, जिसने सबसे पहले पृथ्वी को, फिर शरीरधारियों को उत्पन्न किया ।।5।।

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् ।
पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ॥६॥
उस सर्वश्रेष्ठ विराट प्रकृति यज्ञ से दधियुक्त घृत प्राप्त हुआ (जिससे विराट पुरुष की पूजा होती है) । वायुदेव से संबंधित पशु, हरिण, गौ, अश्वादि की उत्पत्ति उस विराट पुरुष के द्वारा ही हुई ।।6।।

तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दासि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥७॥
उस विराट यज्ञ-पुरुष से ऋग्वेद एवं सामवेद का प्रकटीकरण हुआ । उसी से यजुर्वेद एवं अथर्ववेद का प्रादुर्भाव हुआ अर्थात् वेद की ऋचाओं का प्रकटीकरण हुआ ।।7।।

तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः ।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः ॥८॥
उस विराट यज्ञ-पुरुष से दोनों तरफ दाँतवाले घोड़े हुए और उसी विराट पुरुष से गौएँ, बकरियाँ और भेड़ें आदि पशु भी उत्पन्न हुए ।।8।।

तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः ।
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥९॥
मंत्रद्रष्टा ऋषियों एवं योगाभ्यासियों ने सर्वप्रथम प्रकट हुए पूजनीय विराट पुरुष को यज्ञ (सृष्टि के पूर्व विद्यमान महान ब्रह्मांडरूप यज्ञ अर्थात् सृष्टि-यज्ञ) में अभिषिक्त करके उसी यज्ञरूप परम पुरुष से ही यज्ञ (आत्मयज्ञ) का प्रादुर्भाव किया ।।9।।

यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् ।
मुखं किमस्यासीत किं बाहू किमूरू पादा उच्येते ॥१०॥
संकल्प द्वारा प्रकट हुए जिस विराट पुरुष का ज्ञानीजन विविध प्रकार से वर्णन करते हैं, वे उसकी कितने प्रकार से कल्पना करते हैं ? उसका मुख क्या है ? भुजा, जाँघें और पाँव कौन-से हैं ? शरीर-संरचना में वह पुरुष किस प्रकार पूर्ण बना ? ।।10।।

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद᳭भ्यां शूद्रो अजायत ॥११॥
विराट पुरुष का मुख ब्राह्मण अर्थात् ज्ञानीजन (विवेकवान) हुए। क्षत्रिय अर्थात् पराक्रमी व्यक्ति, उसके शरीर में विद्यमान बाहुओं के समान हैं। वैश्य अर्थात् पोषणशक्ति-सम्पन्न व्यक्ति उसके जंघा एवं सेवाधर्म व्यक्ति उसके पैर हुए।।11।।

चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत ।
श्रोत्राद् वायुश्च​ प्राणश्च मुखादग्निरजायत ॥१२॥
विराट पुरुष परमात्मा के मन से चन्द्रमा, नेत्रों से सूर्य, कर्ण से वायु एवं प्राण तथा मुख से अग्नि का प्रकटीकरण हुआ ।।12।।

नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत​ ।
पद᳭भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ लोकाँ अकल्पयन् ॥१३॥
विराट पुरुष की नाभि से अंतरिक्ष, सिर से द्युलोक, पाँवों से भूमि तथा कानों से दिशाएँ प्रकट हुईं। इसी प्रकार (अनेकानेक) लोकों को कल्पित किया गया है (रचा गया है) ।।13।।

यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।
वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥१४॥
जब देवों ने विराट पुरुष को हवि मानकर यज्ञ का शुभारम्भ किया, तब घृत वसंत ऋतु, ईंधन (समिधा) ग्रीष्म ऋतु एवं हवि शरद ऋतु हुई ।।14।।

सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः ।
देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम् ॥१५॥
देवों ने जिस यज्ञ का विस्तार किया, उसमें विराट पुरुष को ही पशु (हव्य) रूप की भावना से बाँधा (नियुक्त किया), उसमें यज्ञ की सात परिधियाँ (सात समुद्र) एवं इक्कीस (छंद) समिधाएँ हुईं ।।15।।

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पू र्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥१६॥
आदिश्रेष्ठ धर्मपरायण देवों ने यज्ञ से यज्ञरूप विराट सत्ता का यजन किया । यज्ञीय जीवन जीने वाले धार्मिक महात्माजन पूर्वकाल के साध्य देवताओं के निवास स्वर्गलोक को प्राप्त करते हैं ।।16।।

ॐ शांतिः । शांतिः । शांतिः ॥ (यजुर्वेदः 31.1-16)
सूर्य के समतुल्य तेजसम्पन्न, अहंकाररहित वह विराट पुरुष है, जिसको जानने के बाद साधक या उपासक को मोक्ष की प्राप्ति होती है । मोक्षप्राप्ति का यही मार्ग है, इससे भिन्न और कोई मार्ग नहीं । (यजुर्वेदः 31.18)

Zodiac Sign & Health

♈ ARIES

Birthday from 21 March to 19 April

Aries

Aries is the guardian of the face, head.

Afflicted zodiac may cause –

Gall bladder outbreak, unbearable heat, inflammation of the body, painful gallstones, headache, heat built-up on the face, increase in body current, giddiness, dizziness, internal blood accumulation in the brains, hemicrania (migraine), baldness, hair follicles, delirium, brains disorder.

♉ TAURUS

Birthday from 20 April to 20 May

Taurus

Taurus is the guardian of neck, throat, ear throat (upper part of the food passage or esophagus), palate, uvula (a small pendant fleshy lobe at the back of the soft palate), jugular vein, tonsils, esophagus from the throat to the cell, vocal cords and respiratory tract.

Afflicted zodiac may cause –

Sore throat, diphtheria, stomatitis ulcerative, acute inflammation of the throat, neoplasm, cough, or swelling of the nodules around the neck, epilepsy, suffocation, irritation in the chest, growing cushion in a body part, goiter, swelling on the voice cord, nasal congestion, sore throat, breathlessness.

♊ GEMINI

Birthday from 21 May to 20 June

Gemini

Gemini is the guardian of the shoulders, arms, nerve, and lungs (windpipe, throat, pulse, respiratory tract), armpit, the outline of the arm from shoulders to fingers. This zodiac controls oxygen in the blood. Saturn is an aerodynamic planet, and so is this zodiac, where Mercury is the lord this zodiac – Saturn and Mercury both rule hair as the primary and secondary lords. Thus, this zodiac rules hair on the body to quite some extent.

Afflicted zodiac may cause -

Respiratory tract, nerve disorder, cough, lung abscess, nerve disease, young fever, pneumonia, fracture of the hand, water in the lungs, pleuritic pain.

♋ CANCER

Birthday from 21 June to 22 July

Cancer

Cancer is the guardian of the chest, breasts, hollow part of the chest, stomach, the abdominal region between the chest-shoulder-armpit-navel, digestive tract, food vessels, pancreas, thorax, the ovarian body and some part of the uterus. However, constipation is not with Cancer.

Afflicted zodiac may cause –

Weak chest, botchy chest, digestive disorders, gastric, ascites, dropsy, cough, tussis, cancer, chest irritation, pyrosis, burning sensation in the chest, soreness, ache, pain, burp, dysfunction caused by seven significant metastases in the body, diseases caused bad air in the body, bile, cholera, vitiligo, beriberi, whiteness due to blood deficiency, anemia.

♌ LEO

Birthday from 23 July to 22 August

Leo

Leo is the guardian of the heart, circulatory system, back, spinal cord, the nerve of the spinal cord, the part of the bone marrow material.

Afflicted zodiac may cause –

Many disorders of the heart, fast breathing, swooning, faintness, cardiac arrest, fever, inflammation of the spinal cord, staggering because of the deformity of the spinal cord (walk as if unable to control), glandular malfunctions, chest pain.

♍ VIRGO

Birthday from 23 August to 22 September

Virgo Yearly Horoscope

Virgo is the guardian of the large and small intestine or bowels, lumbar, and the sympathetic nerve.

Afflicted zodiac may cause -

Nerve disorder, intestinal disorder, pain in the gut/intestine, absorb the juice/liquid from the body, stomach pain, griping, dysentery, anemia, Intestinal fever, cholera, Constipation, inflammation of the intestine.

♎ LIBRA

Birthday from 23 September to 22 October

Libra

Libra is the guardian of the bladder, the seed produced in men and women, pelvis, waist, kidney, kidney function to clear urine, renal arteries, renal veins, renal pelvis, renal columns, fibrous capsule, minor/major calyx, ureter, and hilum.

Afflicted zodiac may cause –

inflammation of the kidney, nephrectomy, ablation, kidney disease, bladder control problems, urinary tract infection, urine blockage.

♏ SCORPIO

Birthday from 23 October to 22 November

Scorpio Yearly Horoscope

Scorpio is the guardian of waist, kidney, genital, penis, urethra, scrotum, seminal vesicle, testes, vas deferens, epididymis, prostate, bulbourethral gland, ejaculatory duct, mons pubis, vagina, labia majora, labia minora, Bartholin glands, clitoris, vulva, urinary tract, external emitting vein of testicles, Cowper duct, liver, gallbladder, anus, rectum, and gland enlargement located near the mouth of the men's bladder.

Afflicted zodiac may cause –

Ovulation/syphilis affects the throat/nasal congestion, urinary tract inflammation, urine accumulation, stone, corpuscle problem, clitoris problems, piles, acute sensation without feeling, bile, swelling of the gums and blood flowing through them, pox, gonorrhea, malignant disorders, vaginal inflammation, semen defects.

♐ SAGITTARIUS

Birthday from 23 November to 22 December

Sagittarius

Sagittarius is the guardian of hips, buttocks, Scalp, Femur, Rectum, Sacrum, and thighs.

Afflicted zodiac may cause –

Injury from a bullet/shotgun, wounds, accidents, thigh burn, intestinal fever, arthritis, slip disc, rheumatism.

♑ CAPRICORN

Birthday from 23 December to 22 January

Capricorn

Capricorn is the guardian of the knees, bones, joints, regulating the body functions, sense of sensitivity, unproductive body parts, skin, control of the natural life cycle, and external skin.

Afflicted zodiac may cause –

Constipation, nausea, dermatitis, the air in the veins, rheumatism, hysteria, knee jerk, leprosy, acne, rashes, rheumatoid arthritis.

♒ AQUARIUS

Birthday from 23 January to 22 February

Aquarius

Aquarius is the guardian of calf, soleus, the part below the knee, removing carbonic acid gas from the body, blood, and circulatory system.

Afflicted zodiac may cause –

Blood contamination, lack of oxygen in the blood, bent knee, broken knees, dehydration, blood deficiency, swelling of knees, cramps, heart weakening, muscle pull, nerve disorder, poisoning.

♓ PISCES

Birthday from 23 February to 20 March

Pisces

Pisces is the guardian of feet, toes, succulent flow, dormant or cold blood in the body, fingerprints of hands and toes.

The afflicted zodiac may cause –

Numbness or dullness on the nerves, mucus, pus, and nasal congestion often creates nausea, syphilis, any liquid discharge in the body, pox, rheumatism, soaked feet, Deformity of the feet, cold feet, cold in the body, dropsy, ascites, bones softening, a disorder of Vaata-Pitta-Kapha, The side effects of addiction.

शयनकक्ष

Bedroom vastu shastra आपका शयनकक्ष प्रशान्ति का आश्रय होना चाहिए। स्वयं के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए आवश्यक मात्रा में नींद लेना महत्वपूर्ण है। व्यक्ति दिन भर मेहनत करता है और रात को चैन की नींद सोना चाहता है। ऐसे में जब हम घर बनाते हैं तो हमारा पूरा ध्यान अपने शयनकक्ष पर होता है क्योंकि रात को चैन की नींद सोने के बाद ही हम अगले दिन फिर से ज्यादा उत्साह के साथ काम पर जाएंगे। Remove stress with vastu shastra महिलाओं के लिए, संतुलन बनाना विशेष रूप से कठिन हो सकता है। आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप अपना करियर बनाए रखें, अपने बच्चों की परवरिश करें, स्वस्थ रहें और अपने सभी अन्य जुनून और शौक को बनाए रखें। इससे सोने के लिए ज्यादा समय नहीं बचता।

✔️*दिशा*

Vastu shastra direction सही ढंग से निर्मित शयनकक्ष होने से आप अपने तनाव के स्तर को कम कर सकते हैं। व्यक्ति जिस शयन कक्ष का निर्माण करने जा रहा है वह यदि वास्तु सम्मत है तो नींद भी सुखमय आएगी और जीवन सुखी व समृद्धशाली होगा। परन्तु यदि वह वास्तु के प्रतिकूल हुआ तो नींद के साथ व्यक्ति का सुख चैन भी छिन जाएगा। इसलिए वास्तु शास्त्री शयनकक्ष के वास्तु पर बहुत ध्यान देते हैं। यहां मैं भारतीय वास्तु शास्त्र के सामान्य नियमों पर प्रकाश डाल रहा हू। हालाँकि, यहां दिए गए सुझाव व्यक्ति की व्यक्तिगत कुंडली विन्यास पर निर्भर करते हैं। वास्तु सुझाव का निर्णय व्यक्ति को अपनी व्यक्तिगत कुंडली के आधार पर करना चाहिए।
  • वास्तु शास्त्र के अनुसार सामान्यतः शयन कक्ष को घर के मध्य से, जिसे ब्रह्म-स्थान कहा जाता है वहां से, नीचे बताई गई दिशाओं में बनवाना चाहिए।
    • दक्षिण दिशा में वायव्य की ओर।
    • पश्चिम दिशा में वायव्य की ओर।
    • पश्चिम दिशा में नैरृत्य की ओर।
  • बच्चो एवं अविवाहित का शयन कक्ष पूर्व दिशा में होना चाहिए। इस दिशा में नव॑विवाहित जोड़ों का या युवा लिवइन कपल का शयन कक्ष नहीं होना चाहिए वरना परिवार पर संकट आ सकते है।
  • दक्षिण अथवा नैरृत्य में शयनकक्ष विवाहित और छोटे बच्चों के लिए उपयुक्त होता है।
  • घर के स्वामी का शयनकक्ष मुख्य रूप से नैऋत्य या पश्चिम दिशा में होना चाहिए। इससे उनके जीवन में स्थिरता और स्वास्थ्य आता है।
  • यदि शयन कक्ष में शेड (टांड) बनाना हो तो उसे पश्चिम या दक्षिण की दीवार पर बनवाएं। हालांकि इसके नीचे बेड न रखें।
  • १२ वर्ष के नीचे के संतान को उत्तर के कक्ष में सुलाने से वह परिवार का नाम रोशन करते है। आग्नेय कोण में बच्चों का शयनकक्ष बनाया जा सकता है।
  • ईशान कोण में सिर्फ घर का मंदिर होना चाहिए। बच्चे, युवा और कपल के लिए ये दिशा वर्जित है। इस कोने के शयनकक्ष में यदि कोई कमाने वाला व्यक्ति, पति-पत्नी, अन्य दंपत्ति, बच्चे या युवक सोते हैं तो उनके सभी कार्यों में बाधा, तलाक या जुदाई, विवाह में देरी, आर्थिक या व्यावसायिक प्रगति में बाधा और मानसिक अशांति हो सकती है। ईशान कोण में शयनकक्ष नहीं बनाना चाहिए। इससे रोग और क्लेश घर में आते है।
  • पूर्व व उत्तर दिशा के शयन कक्ष स्वास्थ्य के लिए अति उत्तम होते हैं। अस्वस्थ व्यक्ति इस शयनकक्ष में रहे तो उनके स्वास्थ्य में लाभ हो सकता है।
  • शयनकक्ष का नैरृत्य कोण अलमारी या भारी फर्नीचर से वजनदार करना चाहिए।
  • घर के आग्नेय कोण में दूसरी संतान के सोने से घर में अनंत सुखों की वर्षा होती है।
  • घर के वायव्य कोण में तीसरी संतान सोती है तो वह संतान उन्नति करती है और समाज में कीर्तिमन्त होती है।
  • कुंवारी कन्या व मेहमानों का शयनकक्ष वायव्य कोण में होना चाहिए। इससे मेहमान अधिक नहीं ठहरेंगे तथा कन्या का विवाह शीघ्र हो सकता है।

✔️*पलंग*

The head of the bed should always be towards the south.
  • पलंग का सिरहाना हमेशा दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए।
    • यदि सिरहाना दक्षिण की ओर हो तो पलंग का सिरा दक्षिण की दीवार को छूता हुआ होना चाहिए।
  • पलंग का सिरहाना विशेष परिस्थिति में पश्चिम की ओर हो सकता है।
    • यदि सिरहाना पश्चिम में हो तो पलंग का सिर पश्चिम की दीवार को छूता हुआ होना चाहिए।
    • विद्यार्थियों को पश्चिम दिशा में सिर करके सोना चाहिए। इससे पढ़ाई में उनकी एकाग्रता बढ़ सकती है।
  • पलंग का सिरहाना विशेष परिस्थिति में पूर्व की ओर हो सकता है।
    • यदि सिराहना पूर्व की ओर हो तो पलंग दीवार से थोड़ा हटकर होना चाहिए।
    • ६० वर्ष से ऊपर के बुजुर्गों का माथा पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। यह अच्छी निद्रा और आध्यात्मिक उन्नयन के लिए अच्छा रहता है।
  • पलंग का सिरहाना किसी भी परिस्थिति में उत्तर की ओर नहीं होना चाहिए।
    • उत्तर दिशा का सीधा संबंध चुंबकीय ध्रुव से है। इस दिशा में सिर रखने से सिरदर्द, चिंता, अनिद्रा आदि का सामना करना पड़ता है।
  • पलंग बेडरूम के दरवाजे के ठीक सामने नहीं होना चाहिए। यह मन को अशांत करेगा और चिंता पैदा करेगा।
  • शयनकक्ष में यदि बीम है तो उसके नीचे पलंग नहीं रखना चाहिए।
  • दर्पण का प्रतिबिंब पलंग पर नहीं पड़ना चाहिए। यहां यह जीवनसाथी या बिस्तर पर सोने वालों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
  • पलंग के पीछे मजबूत दीवार होनी चाहिए। पलंग के पीछे रिक्त स्थान, प्लाई की दीवार या खिड़की नहीं होनी चाहिए।
  • नए गद्दे से रात को अच्छी नींद लेने में मदद मिल सकती है। यदि आपके पास लंबे समय से वर्तमान गद्दा है, और यह बहुत गांठदार, कठोर या नरम है, तो यह आपको सोने के लिए पर्याप्त आरामदायक होने से रोक देगा।

✔️*शयन कक्ष का प्रवेश द्वार*

Bedroom Entrance as per vastu shastra
  • शयनकक्ष के प्रवेश द्वार में केवल एक ही दरवाजा होना चाहिए।किसी भी स्थिति में शयनकक्ष का दरवाजा पश्चिम दिशा की ओर नहीं खुलना चाहिए। लेकिन अगर शयनकक्ष का द्वार पश्चिम की तरफ खुलता है तो एक द्वार पूर्व की तरफ भी खुलना चाहिए और उत्तर एवं पूर्व दिशा में खिड़की होनी चाहिए।
  • शयनकक्ष के दरवाजे के ठीक सामने पलंग नहीं होना चाहिए, इससे मानसिक अशांति और अनावश्यक चिंताएं मनुष्य को घेर लेती हैं।
  • सोते समय मुख्य द्वार की ओर पैर नहीं रखना चाहिए क्योंकि मृत्यु के बाद मुख्य द्वार की ओर पैर करके लिटाया जाता है।

✔️*रंग*

color as per vastu shastra शयनकक्ष का रंग उसके मुख्य निवासी की कुंडली अनुसार होना चाहिए. परन्तु यहाँ सामान्य नियम दिए गए है जो व्यक्तिगत कुंडली अनुसार अलग परिणाम दिखा सकते है।
  • हल्का गुलाबी, हल्का पीला और हल्का नीला रंग शयनकक्ष के लिए उपयुक्त हैं। ये रंग निवासियों के बीच प्रेम और सद्भाव को बढ़ाते हैं।
    • आजकल बेडरूम में एकसाथ कई रंग लगाने का चलन है जो कि गलत है। उदाहरण के लिए, पीला रंग बृहस्पति का प्रतीक है और गुलाबी रंग शुक्र का प्रतीक है। ये दोनों ग्रह एक दूसरे के शत्रु ग्रह हैं। इसलिए वास्तु शास्त्र के अनुसार दीवार पर पेंटिंग कराने के बाद परिणाम हानिकारक हो सकते हैं। शयनकक्ष की दीवार का रंग निवासी के लिए उसकी कुंडली के अनुसार कौन सा ग्रह शुभ है, इस पर विचार करके चुनें।
  • कई वास्तु शास्त्री कहते है की शयन कक्ष या घर की दक्षिण की दिवार लाल रंग की होनी चाहिए। परन्तु यह भूल है। लाल रंग आक्रामकता बढ़ाता है। शयन कक्ष में लाल रंग की दिवार वहां के निवासिओं के बिच बहस, झगड़ा या विवाद बढ़ाते और परिवार के मतभेद परिवार को अलग करते पाए गए है।
  • बेडरूम में पर्दे हल्के रंग के होने चाहिए क्योंकि इनसे मन को शांति मिलती है।
  • बुजुर्गों के कमरे में पीले रंग की चादर का प्रयोग करे।
  • छात्रों के कमरे में हरे रंग की चादर का प्रयोग करे।
  • लेखक व बुद्धिजीवी के कमरे में नीले रंग की चादर का प्रयोग करे।
  • नवविवाहितों के कमरे में लाल या गुलाबी रंग की चादर का प्रयोग करे।
ग्रह की प्रधानता के अनुसार रंग का चयन –
  • सूर्य – पीला, सुनहरा, ब्रॉन्ज़, चमकीला सफ़ेद, गोल्डन ब्राउन, हरा, भूरा
  • चंद्र – हल्का पीला, मोतिया सफ़ेद, अंगूरी, कपूर सा सफ़ेद, हल्के से गहरा हरा, क्रीम
  • मंगल – रक्त लाल, गुलाबी, लाल, किरमिजी
  • बुध – सभी रंगों के हल्के शेड, सफेद, चमकीला हरा, सभी प्रकार के हरे रंग, स्लेटी
  • बृहस्पति – पीला, गुलाबी, बैंगनी, किरमिजी, सुनहरा पीला
  • शुक्र – गुलाबी, चांदी जैसा सफेद, गुलाब का रंग, आसमानी, चॉकलेटी
  • शनि – गहरा नीला, भूरा, गहरा स्लेटी, एकदम शुभ्र, जामुनी, सूर्यास्त की आभा वाला, सुनहरा काला, रुपहली धारियों वाला काला

✔️*नकद तिजोरी, अलमारी और दर्पण*

Vash vault as per vastu shastra. Wardrobe as per vastu shastra. Mirror as per vastu shastra.
  • कोशिश करें कि पैसे या गहने (तिजोरी/लॉकर) रखने की जगह बेडरूम में न हो।
    • लेकिन आज के दौर में यह सबसे सुरक्षित जगह है। ऐसी स्थिति में तिजोरी को शयन कक्ष के दक्षिण दिशा में इस प्रकार रखें कि तिजोरी का मुख्य द्वार उत्तर दिशा की ओर खुले।
    • शयन कक्ष में आजकल ड्रेसिंग रूम अलग से बनाने का चलन है। यदि ऐसा है तो कक्ष के नैरृत कोण, वायव्य कोण, पश्चिम व दक्षिण में अलमारी बनाई जा सकती है।
  • शयन कक्ष की अलमारी का दरवाजा नैरृत्य या दक्षिण दिशा की ओर नहीं खुलना चाहिए।
  • बेडरूम में दर्पण नहीं लगाना चाहिए। हालांकि, अगर ड्रेसिंग टेबल या अलमारी के दरवाजे पर एक दर्पण लगा हुआ है, तो अलमारी को उत्तर दिशा में रखें कि दर्पण पूर्व की ओर खुल जाए। यदि यह एक स्वतंत्र दर्पण है, तो इसे पश्चिम में इस प्रकार लगाएं कि इसका मुख पूर्व की ओर हो।
  • दर्पण का प्रतिबिंब पलंग पर नहीं पड़ना चाहिए। यहां यह जीवनसाथी या बिस्तर पर सोने वालों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
  • आपके कमरे में बहुत अधिक गंदगी और अव्यवस्था वास्तव में नींद की कमी का कारण बन सकती है। कपड़ों की विशाल व्यवस्था, जैसे सुव्यवस्थित वार्डरोब और दराजें रखकर, आप न केवल एक स्वच्छ स्थान बना सकते हैं, बल्कि एक स्वच्छ मन भी बना सकते हैं।

✔️*दीवार की घड़ी*

Wall clock as per vastu shastra.
  • शयन कक्ष में घड़ी को पूर्व, पश्चिम या उत्तर की दीवार पर लगाना चाहिए।

✔️*पूजा स्थल*

Temple as per vastu shastra.
  • हो सके तो शयनकक्ष में मंदिर न बनाएं।
  • यदि शयन कक्ष में पूजा स्थल (घर का मंदिर) बनाना हो तो उसे कमरे के ईशान कोण में बनाना चाहिए।
    • रात को इसे पर्दे से ढक देना चाहिए।
    • सोते समय सिर पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए जिससे पैर मंदिर की ओर नहीं होंगे।

✔️*इलेक्ट्रॉनिक उपकरण*

Electronics TV AC as per vastu shastra.
  • टीवी, हीटर, म्यूजिक सिस्टम आदि इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बेडरूम के आग्नेय या दक्षिण में ऱखने चाहिए।
  • बेडरूम के पूर्व, उत्तर या उत्तर-पूर्व में कूलर या एयर कंडीशन लगाना चाहिए। जगह की कमी के कारण इसे वायव्य कोण में भी लगाया जा सकता है।
  • इलेक्ट्रॉनिक्स रोजमर्रा की जिंदगी का मुख्य हिस्सा बन रहे हैं, और उन्हें शयनकक्ष में रखना एक ऐसी चीज हो सकती है जिस पर आप पुनर्विचार करना चाहेंगे, क्योंकि इन उपकरणों से निकलने वाली रोशनी आपकी नींद पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।

✔️*सामान्य समझ*

Understanding as per vastu shastra.
  • शयनकक्ष एक बहुत ही निजी जगह है। वहां किसी अतिथि को बैठने भी नहीं देना चाहिए। ऐसा देखा गया है कि कपल अपने माता-पिता या मेहमानों को अपने बेडरूम में सोने को प्राथमिकता देते हैं। कभी-कभी अगर जोड़े के घर माता-पिता या भाई-बहन या कोई और मेहमान आ रहा हो तो एक साथी किसी दूसरे कमरे में सोएगा और दूसरा साथी मेहमानों के साथ उनके प्राइमरी बेडरूम में सोएगा। इसके कारण वास्तु या बेडरूम की ऊर्जा दंपति के बीच कलह, दूरी या अलगाव लाने लगती है।
  • बेडरूम में कपल्स के अच्छे समय की रोमांटिक तस्वीरें लगानी चाहिए। यह उनके बीच सामंजस्य स्थापित करेगा।
  • दंपति की पसंद की खुशबू बेडरूम में व्याप्त होनी चाहिए। इससे मन प्रसन्न रहता है और गहरी नींद आती है।
  • यदि घर में एक से अधिक मंजिलें हैं तो मकान के मालिक को सबसे ऊपरी मंजिल में रहना चाहिए। आमतौर पर सबसे ऊपरी मंजिल नवविवाहित जोड़े को दी जाती है जो कि गलत है। यह निरंकुश हो सकता है और कलह पैदा कर सकता है। कुछ मामलों में यह बेडरूम बड़े बेटे को दिया जा सकता है अगर घर का मालिक वहां नहीं रह सकता है।
  • शयन कक्ष में लंच, डिनर, नाश्ता आदि नहीं करना चाहिए। इससे पैसे का दुर्व्यय, क्लेश और दरिद्रता को आवाहन मिलता है।
  • किसी भी समय शयनकक्ष में सामान, कपड़े, भोजन, पेय पदार्थ, कुर्सियाँ या अन्य कोई वस्तु बिखरी हुई नहीं रखनी चाहिए। इससे घर में नकारात्मक ऊर्जा का वास हो जाता है और उस कमरे में रहने वाले लोगों के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जैसे आय में कमी, खर्चों में वृद्धि, बढ़ते झगड़े और अशांति, अगर मालिक व्यापारी है तो व्यवसाय कम होना, नौकरी में असफलता, स्वास्थ्य बिगड़ना या बार-बार स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होना, छात्रों को मेहनत से पढ़ाई करने के बाद भी अच्छे परिणाम न मिलना आदि।
  • शयन कक्ष में मछलीघर (एक्वेरियम) नहीं रखना चाहिए।
  • शयनकक्ष में पीने के पानी की व्यवस्था पलंग के दाहिनी ओर होनी चाहिए। यानी अगर आप पलंग के सिरहाने पर पीठ टिका कर बैठते हैं तो अपने दाहिनी ओर पीने के पानी का जग रखें।
  • घर के मुखिया का शयनकक्ष बच्चों के शयनकक्ष से बड़ा होना चाहिए। अन्यथा बच्चे आज्ञाकारी नहीं होंगे और मनमानी करेंगे।
  • शयन कक्ष में शौचालय नहीं होना चाहिए। हालांकि, मौजूदा चलन को देखते हुए इसे बनवाना है तो इसे बेडरूम के उत्तर या पश्चिम हिस्से में बनाना चाहिए।
  • शयनकक्ष में हल्की रोशनी होनी चाहिए जिससे परिवार में प्रेम भाव बना रहता है।
  • यदि आप शयनकक्ष में मेज और कुर्सी रखना चाहते हैं तो पुरुषों के लिए नैरृत्य कोण में और महिलाओं के लिए पश्चिम में लगाए। दोनों परिस्थितियों में पढ़ाई या ऑफिस का काम करते समय मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
  • शयनकक्ष में शराब नहीं पीना चाहिए। यह दरिद्रता, अहंकार और वीरानी लाता है।
  • शयनकक्ष में तेल के डिब्बे, मूसल, दवाएँ व कीटनाशक दवाएँ नहीं होनी चाहिए। यदि कभी रखनी पड़े तो ढँक कर रखे और जल्द से जल्द उसे वहां से हटा दे।
  • शयनकक्ष में कसरत का सामान नहीं रखना चाहिए। इससे रोमांस खत्म हो जाता है।
  • यदि दांपत्य जीवन में रोमांस की कमी है तो शयनकक्ष की उत्तर दिशा में नीले रंग की पेंटिंग या परदे लगाने चाहिए।
  • शयनकक्ष में पूर्व-प्रेम या पूर्व-विवाह की कोई वस्तु, चित्र या स्मृति नहीं होनी चाहिए। यह वर्तमान प्रेम या वर्तमान विवाह में अलगाव ला सकता है।

✔️*माप*

Measurement as per vastu shastra.
  • वास्तु शास्त्र के अनुसार बेडरूम की लंबाई और चौड़ाई ऐसी होनी चाहिए कि नौ से गुणा करने और आठ से भाग देने पर तीन या पांच शेष रह जाएं।
  • यदि तीन शेष हो तो घर के केंद्र से दक्षिण दिशा में शयन कक्ष बनाने से शत्रु पर विजय प्राप्त होती है। यह वित्तीय और भौतिक सुख का भी संकेत देता है।
  • शेष पांच हो तो घर के केंद्र से पश्चिम दिशा में बने शयन कक्ष के परिणाम से आर्थिक सफलता मिलती है।

BEDROOM

Bedroom vastu shastra Your bedroom should be a haven of tranquility. It is important to get the required amount of sleep in order to perform at your best. A person works hard throughout the day and wants to sleep peacefully at night. In such a situation, when we build a house, our full attention is on our bedroom because only after a peaceful sleep at night, we shall go to work again the next day with more enthusiasm. Remove stress with vastu shastra For women, striking a balance can be especially difficult. You are expected to maintain your career, raise your children, stay healthy, and maintain all of your other passions and hobbies. This does not leave much time for sleeping.

✔️*DIRECTION*

Vastu shastra direction Having a properly designed bedroom can help you reduce your stress levels. If the bedroom that a person is going to construct is Vastu-compliant, then sleep will also be pleasant and life will be happy and prosperous. But if it is against Vastu, then along with sleep, the person’s happiness and peace will also be snatched away. That’s why Vastu Shastri pays a lot of attention to the Vastu of the bedroom. Here, I am highlighting the general principles of Bharatiya Vastu Shastra. However, the suggestions given here depend on the individual’s personal horoscope configuration. One should decide Vastu suggestion based on their personal Horoscope.
  • According to Vastu Shastra, generally the bedroom should be made from the middle of the house, which is called Brahma-sthan, in the directions mentioned below. Towards the northwest in the south. Towards the northwest in the west. Towards the southwest in the west.
  • The bedroom of children and unmarried should be in the East. There should not be bedroom of a newly married couple or young live-in couple in this direction, otherwise there may be problems in the family.
  • Bedroom in the south or southwest is suitable for married and young children.
  • The bedroom of the master of the house should mainly be in the southwest or west. This brings stability and health in their lives.
  • If a shed is to be made in the bedroom, then make it on the west or south wall. However, do not keep the bed under it.
  • By making children below 12 years of age sleep in the north side bed room, they bring glory to the family. Children’s bedroom can be made in the southeast.
  • Only the temple of the house should be in the Northeast corner. This direction is forbidden for children, youth and couples. If an earning person, spouse, other couple, children or young person sleeps in the bedroom of this corner, then there may be obstacles in all their work, divorce or separation, delay in marriage, hindrance in financial or professional progress and mental disturbance. Bedroom should not be made in the northeast. Due to this, diseases and troubles come in the house.
  • The bedrooms in the east and north direction are very good for health. If an unwell person stays in this bedroom, his health can be benefited.
  • The southwest corner of bedroom should be weighed down by cupboards or heavy furniture.
  • Sleeping of second child in the southeast corner of the house brings endless happiness in the house.
  • If the third child sleeps in the northwest corner of the house, then that child progresses and becomes famous in the society.
  • The bedroom of the unmarried girl and the guests should be in the northwest corner. Due to this, the guests will not stay more and the marriage of the girl can happen soon.

✔️*Bed*

The head of the bed should always be towards the south.
  • The head of the bed should always be towards the south.
    • If the headboard is on the south side, then the head of the bed should be touching the south wall.
  • The head of the bed can be on the west side under special circumstances.
    • If the headboard is on the west side, then the head of the bed should be touching the west wall.
    • Students should sleep with their head in the west. It can increase their concentration in studies.
  • The head of the bed can be on the east side under special circumstances.
    • If the headboard is towards the east, then the bed should be slightly away from the wall.
    • Head of the elders above 60 should be towards the east. It is good for good sleep and spiritual upliftment.
  • The head of the bed should not be towards the North under any circumstances.
    • North direction is directly related to the magnetic pole. Keeping head in this direction will encounter headache, anxiety, insomnia etc.
  • The bed should not be directly in front of the bedroom door. It will unrest the mind and create worries.
  • If there is a beam in the bedroom, then the bed should not be kept under it.
  • The reflection of the mirror should not fall on the bed. Here it can be harmful for the health of the spouse or those sleeping on the bed.
  • There should be a strong wall behind the bed. There should be no empty space, ply wall or window behind the bed.
  • A new mattress can help you get a good night’s sleep. If you have had your current mattress for a long time, and it is too lumpy, hard or soft, it will prevent it from being comfortable enough for you to sleep on.

✔️*Bedroom entry door*

Bedroom Entrance as per vastu shastra
  • There should be only one door in the entrance of the bedroom. Under no circumstances the door of the bedroom should open towards the west. However, if the door of the bedroom opens towards west then one door should also open towards east and there should be window in north and east direction.
  • The bed should not be right in front of the bedroom door, because of this mental disturbance and unnecessary worries surround the person.
  • One should not keep feet towards the main door while sleeping because after death one is made to lie down with feet towards the main door.

✔️*Color*

color as per vastu shastra The color of the bedroom should be according to the horoscope of its main resident. But here are the general rules which may show different results according to individual horoscope.
  • Light pink, light yellow and light blue are suitable colors for the bedroom. These colors enhance love and harmony among the residents.
    • Nowadays there is a trend of applying multiple colors in the bedroom which is wrong. For example, yellow symbolizes Jupiter and pink symbolizes Venus. Both these planets are enemy planets of each other. That’s why according to Vastu Shastra, after getting the painting done on the wall, the results can be harmful. Choose the color of the bedroom wall considering which planet is auspicious for the resident as per his horoscope.
  • Many Vastu Shastri say that the south wall of the bedroom or house should be of red color. But this is wrong. Red color increases aggression. Red colored wall in the bedroom has been found to increase debate, quarrel or dispute among the residents and family differences have been found to separate the family.
  • Curtains in the bedroom should be light in color as they will bring peace of mind.
  • Use a yellow sheet in the room of the elderly.
  • Use a green sheet in the students’ room.
  • Use a blue sheet in the room of writers and intellectuals.
  • Use red or pink bed sheet in the room of the newlyweds.
Selection of color according to the predominance of the planet –
  • Sun – Yellow, Golden, Bronze, Bright White, Golden Brown, Green, Brown
  • Moon – pale yellow, pearl white, orange, camphor white, light to dark green, cream
  • Mars – blood red, pink, scarlet, crimson
  • Mercury – light shades of all colors, white, bright green, all shades of green, gray
  • Jupiter – yellow, pink, violet, crimson, golden yellow
  • Venus – pink, silvery white, rose color, sky blue, chocolaty
  • Saturn – dark blue, brown, dark gray, stark white, purple, sunset aura, golden black, black with silver stripes

✔️*Cash vault, Wardrobe & Mirror*

Vash vault as per vastu shastra. Wardrobe as per vastu shastra. Mirror as per vastu shastra.
  • Try that the place to keep money or jewelry (safe/locker) is not be in the bedroom.
    • But in today’s era, it is the safest place. In this situation, keep the vault in the South of the bedroom in such a way that the main door of the vault opens towards the North.
  • Nowadays there is a trend of making a separate dressing room in the bedroom. If so, then a wardrobe can be made in the north, north-west, west and south of the room.
  • The wardrobe door of the bedroom should not open towards the southwest or south.
  • Mirror should not be placed in the bedroom. However, if there is a mirror fixed on the door of dressing table or wardrobe, place the wardrobe in the North that the mirror should open towards the East. If it is an independent mirror, place it in the west such that it faces the East.
  • The reflection of the mirror should not fall on the bed. Here it can be harmful for the health of the spouse or those sleeping on the bed.
  • Too much dirt and clutter in your room can actually lead to lack of sleep. By keeping spacious clothing arrangements, such as well-organized wardrobes and drawers, you can create not only a clean space, but a clean mind.

✔️*Wall clock*

Wall clock as per vastu shastra.
  • The clock should be placed on the east, west or north wall in the bedroom.

✔️*Temple*

Temple as per vastu shastra.
  • If possible, do not make a temple in the bedroom.
  • If a place of worship (home temple) has to be made in the bedroom, it should be made in the northeast of the room.
    • It should be covered with a curtain at night.
    • While sleeping, the head should be towards the east so that the feet will not be towards the temple.

✔️*Electronic Equipments*

Electronics TV AC as per vastu shastra.
  • Electronic equipment like TV, heater, music system etc. should be kept in the southeast or south of the bedroom.
  • Cooler or air condition should be installed in the East, North or Northeast of the bedroom. Due to lack of space, it can also be planted in the Northwest.
  • Electronics are becoming a staple of everyday life, and having them in the bedroom may be something you want to reconsider, as the light emitted from these devices can negatively impact your sleep.

✔️*General Understanding*

Understanding as per vastu shastra.
  • Bedroom is a very private place. No guest should be allowed to even sit there. It is observed that a couple gives priority to theri parents or guests to sleep in their bedroom. Sometimes, if the parents or siblings or any other guest is visiting the couple, then one partner will sleep in some other room and the other partner will sleep with the guests in their primary bedroom. Due to this Vastu or the energy of the bedroom starts bringing discord, distance or separation between the couple.
  • Romantic photos of the good times of couple should be displayed in the bedroom. It will fetch harmony between them.
  • The fragrance of the couple’s choice should pervade the bedroom. It calms the mind and induces deep sleep.
  • If the house has more than one floors, the house owner of the house should stay in the upper most floor. Usually the upper most floor is given to newly married couple which is wrong. This can become autocratic and create discord. In some cases this bedroom can be given to the elder son if the owner of the house cannot stay there.
  • Lunch, dinner, breakfast etc. should not be done in the bedroom. This gives an appeal to wastage of money, tribulation and poverty.
  • At no time should luggage, clothing, food, drinks, chairs, or anything else be strewn about in the bedroom. Because of this, negative energy gets stagnated in the house and there are adverse results on the life of the people living in that room, such as low income, increase in expenses, rising quarrels and disturbance, if the owner is a businessman, then there is less business, failure in job, deteriorating health or frequent health issues, students not getting gaining good good results even after studying hard, etc.
  • Aquarium should not be kept in the bedroom.
  • The arrangement of drinking water in the bedroom should be on the right side of the bed. That is, if you sit with your back resting on the head of the bed, then keep a jug of drinking water on your right side.
  • The bedroom of the chief of the house should be bigger than that of children. otherwise children will not be obedient and will be arbitrary.
  • There should not be a toilet in the bedroom. However, following the current trend, of it has to be made, then it should be made in the North or West part of the bedroom.
  • There should be light lighting in the bedroom so that love remains in the family.
  • If you want to place a table and chair in the bedroom, keep it in the Southwest for gents and in the West for ladies. In both the circumstances, while studying or doing office work, the face should be towards the East or North.
  • One should not drink alcohol in the bedroom. It brings poverty, arrogance and desolation.
  • There should not be oil cans, pestles, medicines and insecticides in the bedroom. If ever you have to keep it, keep it covered and remove it from there as soon as possible.
  • Exercise equipment should not be kept in the bedroom. It ends the romance.
  • If there is a lack of romance in married life, then blue colored paintings or curtains should be placed in the north direction of the bedroom.
  • There should be no object, picture, or memory of ex-love or ex-marriage in the bedroom. It may bring separation in present love or present marriage.

✔️*Measurement*

According to Vastu Shastra, length and width of the bedroom should be such that when multiplied by nine and divided by eight, three or five remain.
  • According to Vastu Shastra, length and width of the bedroom should be such that when multiplied by nine and divided by eight, three or five remain.
  • If three is left, the result of the bedroom made in the south direction from the center of the house is victory over the enemy. It also indicates financial and physical happiness.
  • If the remainder is five, the result of the bedroom built in the west direction from the center of the house brings economic success.

॥श्री विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्रम्॥

श्री गणेशाय नमः॥

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥

ॐ अथ सकलसौभाग्यदायक श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्।

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥१॥

यस्य द्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परः शतम्।
विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये॥२॥

व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम्।
पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम्॥३॥

व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे।
नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः॥४॥

अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने।
सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे॥५॥

यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात्।
विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे॥६॥

ॐ नमो विष्णवे प्रभविष्णवे।

श्रीवैशम्पायन उवाच —
श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः।
युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत॥७॥

युधिष्ठिर उवाच —
किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्।
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम्॥८॥

को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः।
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्॥९॥

भीष्म उवाच —
जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम्।
स्तुवन् नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः॥१०॥

तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम्।
ध्यायन् स्तुवन् नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च॥११॥

अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम्।
लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत्॥१२॥

ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम्।
लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम्॥१३॥

एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः।
यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा॥१४॥

परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः।
परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम्॥१५॥

पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम्।
दैवतं दैवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता॥१६॥

यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे।
यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये॥१७॥

तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।
विष्णोर्नामसहस्रं मे श‍ृणु पापभयापहम् ॥ १८॥

यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः।
ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये॥१९॥

ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः॥
छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः॥२०॥

अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः।
त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियोज्यते॥२१॥

विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम्॥
अनेकरूप दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमं॥२२ ॥

पूर्वन्यासः।

श्रीवेदव्यास उवाच —

(नमस्कार) ॐ अस्य श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य।

(Head) श्री वेदव्यासो भगवान् ऋषिः।

(Mouth) अनुष्टुप् छन्दः।

(Heart) श्रीमहाविष्णुः परमात्मा श्रीमन्नारायणो देवता।

(Rig-cage-right) अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजम्।

(Rig-cage-left) देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तिः।

(नमस्कार) उद्भवः क्षोभणो देव इति परमो मन्त्रः।

(Rig-cage-center) शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकम्।

(Two fingers clap) शार्ङ्गधन्वा गदाधर इत्यस्त्रम्।

(Three-eyes) रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति नेत्रम्।

(Hug) त्रिसामा सामगः सामेति कवचम्।

(Genital) आनन्दं परब्रह्मेति योनिः।

(सिरके ऊपर से घडी की सीधी दिशा में चुटकियां बजाए) ऋतुः सुदर्शनः काल इति दिग्बन्धः॥

(नमस्कार) श्रीविश्वरूप इति ध्यानम्।

(नमस्कार -उल्टानमस्कार-नमस्कार) श्रीमहाविष्णुप्रीत्यर्थे सहस्रनामस्तोत्रपाठे

(अंजलि) विनियोगः॥

अथ न्यासः।

(Head) ॐ शिरसि वेदव्यासऋषये नमः।

(Mouth) मुखे अनुष्टुप्छन्दसे नमः।

(Heart) हृदि श्रीकृष्णपरमात्मदेवतायै नमः।

(Genital) गुह्ये अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजाय नमः।

(Legs) पादयोर्देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तये नमः।

(Full-body) सर्वाङ्गे शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकाय नमः।

(नमस्कार-उल्टानमस्कार-नमस्कार) करसम्पूटे मम श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे जपे

(अंजलि) विनियोगाय नमः॥ इति ऋषयादिन्यासः॥

अथ करन्यासः।

(Thumb) ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कार इत्यङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।

(Index) अमृतांशूद्भवो भानुरिति तर्जनीभ्यां नमः ।

(Middle) ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मेति मध्यमाभ्यां नमः ।

(Ring) सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्य इत्यनामिकाभ्यां नमः ।

(Little) निमिषोऽनिमिषः स्रग्वीति कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।

(Palm front back) रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । इति करन्यासः।

अथ षडङ्गन्यासः।

(Heart) ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कार इति हृदयाय नमः।

(Head) अमृतांशूद्भवो भानुरिति शिरसे स्वाहा।

(Tuft/चोटी) ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मेति शिखायै वषट्।

(Hug) सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्य इति कवचाय हुम्।

(Eyes) निमिषोऽनिमिषः स्रग्वीति नेत्रत्रयाय वौषट्।

(Two-fingers-clap-two-times) रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इत्यस्त्राय फट्। इति षडङ्गन्यासः॥

(नमस्कार-उल्टानमस्कार-नमस्कार) श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे विष्णोर्दिव्यसहस्रनामजपमहं

(अंजलि) करिष्ये इति सङ्कल्पः।

अथ ध्यानम् ।

क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकतेर्मौक्तिकानां
मालाकॢप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैर्मौक्तिकैर्मण्डिताङ्गः ।

शुभ्रैरभ्रैरदभ्रैरुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूष वर्षैः
आनन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदा शङ्खपाणिर्मुकुन्दः ॥ १॥

भूः पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिलश्चन्द्र सूर्यौ च नेत्रे
कर्णावाशाः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः ।

अन्तःस्थं यस्य विश्वं सुरनरखगगोभोगिगन्धर्वदैत्यैः
चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवन वपुषं विष्णुमीशं नमामि ॥ २॥

ॐ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं var योगिहृद्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥ ३॥

मेघश्यामं पीतकौशेयवासं
श्रीवत्साङ्कं कौस्तुभोद्भासिताङ्गम् ।
पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं
विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम् ॥ ४॥

नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते ।
अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ ५॥

सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं
सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् ।
सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं var स्थलशोभिकौस्तुभं
नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ॥ ६॥

छायायां पारिजातस्य हेमसिंहासनोपरि
आसीनमम्बुदश्याममायताक्षमलंकृतम् ।
चन्द्राननं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कित वक्षसं
रुक्मिणी सत्यभामाभ्यां सहितं कृष्णमाश्रये ॥ ७॥

स्तोत्रम् ।

हरिः ॐ ।
विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १॥

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ २॥

योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ ३॥

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ ४॥

स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ ५॥

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ ६॥

अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ ७॥

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ ८॥

ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥ ९॥

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ १०॥

अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥ ११॥

वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ १२॥

रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥ १३॥

सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ॥ १४॥

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ १५॥

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ १६॥

उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः ।
अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ १७॥

वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ १८॥

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ १९॥

महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ २०॥

मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ २१॥

अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ २२॥

गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ २३॥

अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ २४॥

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ २५॥

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ २६॥

असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ २७॥

वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ २८॥

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ २९॥

ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ ३०॥

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ ३१॥

भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः ।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ ३२॥

युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ ३३॥

इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ ३४॥

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ ३५॥

स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ॥ ३६॥

अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ ३७॥

पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् ।
महर्द्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ ३८॥

अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ॥ ३९॥

विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ ४०॥

उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ ४१॥

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।
परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ ४२॥

रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः । or विरामो विरतो
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥ ४३॥

वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ ४४॥

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ ४५॥

विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ ४६॥

अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः ।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥ ४७॥

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ ४८॥

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ ४९॥

स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ ५०॥

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् ।
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ ५१॥

गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ ५२॥

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ ५३॥

सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वताम्पतिः ॥ ५४॥ विनियोज्यः

जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥ ५५॥

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ ५६॥

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाश‍ृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ ५७॥

महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ ५८॥

वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ ५९॥

भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ ६०॥

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिवस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ ६१॥ var दिविस्पृक्

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ॥ ६२॥

शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ ६३॥

अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः ॥ ६४॥

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ॥ ६५॥

स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः ।
विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥ ६६॥

उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ ६७॥

अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥ ६८॥

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥ ६९॥

कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ॥ ७०॥

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ ७१॥

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ ७२॥

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ ७३॥

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ ७४॥

सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ ७५॥

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥ ७६॥

विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥ ७७॥

एको नैकः सवः कः किं यत् तत्पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ ७८॥

सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ ७९॥

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ ८०॥

तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकश‍ृङ्गो गदाग्रजः ॥ ८१॥

चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ ८२॥

समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥ ८३॥

शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ ८४॥

उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः श‍ृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ ८५॥

सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ ८६॥

कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः ।
अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥ ८७॥

सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधोऽदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥ ८८॥

सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥ ८९॥

अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ ९०॥

भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ ९१॥

धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः ॥ ९२॥

सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ॥ ९३॥

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ ९४॥

अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ ९५॥

सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ॥ ९६॥

अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ ९७॥

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणांवरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ ९८॥

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ ९९॥

अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ १००॥

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ १०१॥

आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ १०२॥

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ १०३॥

भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ १०४॥

यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुग् यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ १०५॥

आत्मयोनिः स्वयञ्जातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ १०६॥

शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ १०७॥

सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ।

वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी ।
श्रीमान् नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु ॥ १०८॥

वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी ।
श्रीमान् नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु ॥ १०८॥

वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी ।
श्रीमान् नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु ॥ १०८॥

श्री वासुदेवोऽभिरक्षतु ॐ नम इति ।

उत्तरन्यासः ।

भीष्म उवाच —
इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः ।
नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥ १॥

य इदं श‍ृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः ॥ २॥

वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत् ।
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥ ३॥

धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ।
कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी प्राप्नुयात्प्रजाम् ॥ ४॥

भक्तिमान् यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः ।
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥ ५॥

यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च ।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ६॥

न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति ।
भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः ॥ ७॥

रोगार्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ ८॥

दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥ ९॥

वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥ १०॥

न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् ।
जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥ ११॥

इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥ १२॥

न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः ।
भवन्ति कृत पुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥ १३॥

द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः ।
वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥ १४॥

ससुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् ।
जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥ १५॥

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः ।
वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥ १६॥

सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्प्यते । var?? कल्पते
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥ १७॥

ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः ।
जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥ १८॥

योगो ज्ञानं तथा साङ्ख्यं विद्याः शिल्पादि कर्म च ।
वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात् ॥ १९॥

एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः ।
त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ २०॥

इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् ।
पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ॥ २१॥

विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभुमव्ययम् ।
भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ॥ २२॥

न ते यान्ति पराभवम् ॐ नम इति ।

अर्जुन उवाच —
पद्मपत्रविशालाक्ष पद्मनाभ सुरोत्तम ।
भक्तानामनुरक्तानां त्राता भव जनार्दन ॥ २३॥

श्रीभगवानुवाच —
यो मां नामसहस्रेण स्तोतुमिच्छति पाण्डव ।
सोहऽमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशयः ॥ २४॥
स्तुत एव न संशय ॐ नम इति ।

व्यास उवाच —
वासनाद्वासुदेवस्य वासितं भुवनत्रयम् ।
सर्वभूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥ २५॥
श्री वासुदेव नमोऽस्तुत ॐ नम इति ।

पार्वत्युवाच —
केनोपायेन लघुना विष्णोर्नामसहस्रकम् ।
पठ्यते पण्डितैर्नित्यं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ २६॥

ईश्वर उवाच —
श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने ॥ २७॥

श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने ॥ २७॥

श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने ॥ २७॥
श्रीरामनाम वरानन ॐ नम इति ।

ब्रह्मोवाच —
नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे ।
सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटियुगधारिणे नमः ॥ २८॥
सहस्रकोटियुगधारिणे ॐ नम इति ।

ॐ तत्सदिति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यामानुशासनिके
पर्वणि भीष्मयुधिष्ठिरसंवादे श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रम् ॥

सञ्जय उवाच —
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ २९॥

श्रीभगवानुवाच —
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ ३०॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ३१॥

आर्ताः विषण्णाः शिथिलाश्च भीताः घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः ।
सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति ॥ ३२॥ var भवन्तु

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात् । var प्रकृतिस्वभावात् ।
करोमि यद्यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ॥ ३३॥

इति श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

ॐ तत् सत् ।

॥ श्री रामनवमी ॥

हिंदी पंचांग के अनुसार, चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की नवमी को रामनवमी मनाई जाती है। इस प्रकार वर्ष​ २०२३ में ३० मार्च को रामनवमी है। इस दिन चैत्र नवरात्रि की महानवमी भी होती है। सनातन शास्त्रों में निहित है कि चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की नवमी को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का जन्म हुआ है। अतः इस तिथि को रामनवमी मनाई जाती है। ज्योतिषियों की मानें तो भगवान श्रीराम का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था। इसके लिए मध्याह्न के समय में विधिवत पूजा-उपासना की जाती है। आइए, पूजा का शुभ मुहूर्त, मंत्र और विधि जानते हैं।

॥ पूजा का शुभ मुहूर्त ॥

हिंदी पंचांग के अनुसार, रामनवमी के दिन भारतीय समयानुसार मध्याह्न मुहूर्त दिन में ११ बजकर ११ मिनट से शुरू होकर दोपहर ०१ बजकर ४० मिनट तक है। वहीं, अभिजित मुहूर्त १२ बजकर ०३ मिनट से शुरू होकर १२ बजकर ५३ मिनट तक है। इस दौरान साधक आराध्य भगवान श्रीराम की पूजा-उपासना कर सकते हैं। अन्य देश अपने मध्याह्न समय में ही भगवान श्री राम की पूजा-उपासना करे। याद रखे की ईश्वर सर्वव्यापी है। वह काल के परे है। ईश्वर के जन्म का महत्व काल को स्वयं में सीमित रखना है। जैसे श्री कृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ है और श्री राम का जन्म मध्याह्न में हुआ है। श्री कृष्ण चंद्र का प्रतिक है श्री राम सूर्य का प्रतिक है। यथा कथन अनुसार भारतीय समय में मध्याह्न काल अन्य देशो में मध्यरात्रि या अलग हो सकता है। परन्तु समय में परिवर्तन न करते हुए अपने देश प्रदेश के लोकल मध्याह्न काल में ही श्री राम का पूजन श्रीरामनवमी के दिन करें। इसी तरह श्रीकृष्ण का पूजन अपने देश प्रदेश के लोकल मध्यरात्रि में ही जन्माष्टमी के दिन करें।

॥ श्री राम का दशाक्षरी मंत्र ॥

श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को राज्य प्राप्ति के लिए श्री राम का दशाक्षरी मंत्र दिया था। इस दशाक्षरी राम मंत्र का जाप ३ महीने तक करने का विधान है। शारदातिलक के अनुसार मंत्र इस प्रकार है।

॥ मंत्र ॥

हुं जानकी वल्लभाय स्वाहा |

॥ विनियोगः ॥

अस्य मंत्रस्य वसिष्ठ ऋषिः । विराट् छन्दः । सीतापाणिपरिग्रहे श्रीरामो देवता। हुं बीजम् । स्वाहा शक्तिः । चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धये जपे विनियोगः ।

॥ ऋष्यादिन्यासः ॥

ॐ वशिष्ठऋषये नमः शिरसि ॥ विराट्छन्दसे नमः मुखे ॥ सीतापाणिपरिग्रहे श्रीरामदेवतायै नमः हृदि ॥ हुं बीजाय नमः गुह्ये॥ स्वाहा शक्तये नमः पादयोः ॥ विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे।

॥ कराङ्ग न्यास: ॥

ॐ क्लीं अंगुष्ठाभ्यां नमः ॥ ॐ क्लीं तर्जनीभ्यां नमः ॥ ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः ॥ ॐ क्लीं अनामिकाभ्यां नमः ॥ ॐ क्लीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ॥ ॐ क्लीं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥

॥ हृदयादिषङ्गन्यास: ॥

ॐ क्लीं हृदयाय नमः। ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा। ॐ क्लीं शिखायै वषट्। ॐ क्लीं कवचाय हुम्। ॐ क्लीं नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ क्लीं अस्त्राय फट्।

॥ मंत्र जाप और ध्यान॥

हुं जानकी वल्लभाय स्वाहा |

॥ सब से ऊपर एक ही नाम ॥

मेरे पिताजी श्री अनिलकुमार श्रृंगारपुरे और मेरी माताजी अंजना देसाई श्रृंगारपुरे बचपन से हमें कहते है - सिर्फ 'राम' नाम भजो हर चुनौती से उभर जाओगे। अगर रोज़ भजोगे तो ग्रह तुम्हारे सामने हार जायेंगे। इसी पर हमेशा से हमें कहा गया जो आज मैं यहाँ लिख रहा हु। सबसे ऊपर शिव। जहां शिव न पहुंचे वहां पहुंचे शक्ति। जहां शक्ति भी बंध जाए वहां पहुंचे बजरंगी। जिसके आगे शीश झुकाये बजरंगी बने हनुमान। शक्ति करें उस मर्यादा पुरुषोत्तम का सम्मान। शिव करें जिसका निरंतर ध्यान। जहां कोई नहीं पहुंचे वहां पहुंचे सिर्फ एक ही नाम। ॥जय श्री राम॥ ॥जय श्री राम॥ ॥जय श्री राम॥ राम नाम से रुके कार्य बनते है। राम के नाम से शिव, शक्ति और बजरंगी जुड़े है। राम नाम से शिव आप का कार्य करेंगे, शक्ति आप को बल देगी, बजरंगी आप के शत्रु एवं ग्रह बाधा को नष्ट करेँगे। इसलिए कहते है। सबसे ऊपर शिव। शिव से जुडी शक्ति। दोनों से बने बजरंगी। तीनो का एक ही ध्यान। सब से ऊपर एक ही नाम। ॥जय श्री राम॥ ॥जय श्री राम॥ ॥जय श्री राम॥

॥ जय भोलेनाथ ॥

These are general traits of zodiac sings. Contact us for personalized horoscope reading.

For any text that represents medical concern -

This is neither a medical consultation nor diagnosis. For any health concerns or remedies the text here is an astrological view only. We highly recommend the native to get a medical diagnosis first. Consult your doctor for the medical aspects and medications.

This picture represents the Zodiac sign Aries. Get your personal horoscope analyzed and work on the remedies for faster success of personal & professional lives.

♈ *ARIES*

Birthday from 21 March to 19 April

✔️*PROBABLE HEALTH CONCERNS WHEN THE ZODIAC IS AFFLICTED*

Aries is the guardian of the face, head.

Afflicted zodiac may cause –

Gall bladder outbreak, unbearable heat, inflammation of the body, painful gallstones, headache, heat built-up on the face, increase in body current, giddiness, dizziness, internal blood accumulation in the brains, hemicrania (migraine), baldness, hair follicles, delirium, brains disorder.

This picture represents the Zodiac sign Taurus. Get your personal horoscope analyzed and work on the remedies for faster success of personal & professional lives.

♉ *TAURUS*

Birthday from 20 April to 20 May

✔️*PROBABLE HEALTH CONCERNS WHEN THE ZODIAC IS AFFLICTED*

Taurus is the guardian of neck, throat, ear throat (upper part of the food passage or esophagus), palate, uvula (a small pendant fleshy lobe at the back of the soft palate), jugular vein, tonsils, esophagus from the throat to the cell, vocal cords and respiratory tract.

Afflicted zodiac may cause –

sore throat, diphtheria, stomatitis ulcerative, acute inflammation of the throat, neoplasm, cough, or swelling of the nodules around the neck, epilepsy, suffocation, irritation in the chest, growing cushion in a body part, goiter, swelling on the voice cord, nasal congestion, sore throat, breathlessness.

This picture represents the Zodiac sign Gemini. Get your personal horoscope analyzed and work on the remedies for faster success of personal & professional lives.

♊ *GEMINI*

Birthday from 21 May to 20 June

✔️*PROBABLE HEALTH CONCERNS WHEN THE ZODIAC IS AFFLICTED*

Gemini is the guardian of the shoulders, arms, nerve, and lungs (windpipe, throat, pulse, respiratory tract), armpit, the outline of the arm from shoulders to fingers. This zodiac controls oxygen in the blood. Saturn is an aerodynamic planet, and so is this zodiac, where Mercury is the lord this zodiac – Saturn and Mercury both rule hair as the primary and secondary lords. Thus, this zodiac rules hair on the body to quite some extent.

Afflicted zodiac may cause –

respiratory tract, nerve disorder, cough, lung abscess, nerve disease, young fever, pneumonia, fracture of the hand, water in the lungs, pleuritic pain.

This picture represents the Zodiac sign Scorpio. Get your personal horoscope analyzed and work on the remedies for faster success of personal & professional lives.

♋ *CANCER*

Birthday from 21 June to 22 July

✔️*PROBABLE HEALTH CONCERNS WHEN THE ZODIAC IS AFFLICTED*

Cancer is the guardian of the chest, breasts, hollow part of the chest, stomach, the abdominal region between the chest-shoulder-armpit-navel, digestive tract, food vessels, pancreas, thorax, the ovarian body and some part of the uterus. However, constipation is not with Cancer.

Afflicted zodiac may cause –

weak chest, botchy chest, digestive disorders, gastric, ascites, dropsy, cough, tussis, cancer, chest irritation, pyrosis, burning sensation in the chest, soreness, ache, pain, burp, dysfunction caused by seven significant metastases in the body, diseases caused bad air in the body, bile, cholera, vitiligo, beriberi, whiteness due to blood deficiency, anemia.

This picture represents the Zodiac sign Leo. Get your personal horoscope analyzed and work on the remedies for faster success of personal & professional lives.

♌ *LEO*

Birthday from 23 July to 20 August

✔️*PROBABLE HEALTH CONCERNS WHEN THE ZODIAC IS AFFLICTED*

Leo is the guardian of the heart, circulatory system, back, spinal cord, the nerve of the spinal cord, the part of the bone marrow material.

Afflicted zodiac may cause –

many disorders of the heart, fast breathing, swooning, faintness, cardiac arrest, fever, inflammation of the spinal cord, staggering because of the deformity of the spinal cord (walk as if unable to control), glandular malfunctions, chest pain.

This picture represents the Zodiac sign Virgo. Get your personal horoscope analyzed and work on the remedies for faster success of personal & professional lives.

♍ *VIRGO*

Birthday from 23 August to 22 September

✔️*PROBABLE HEALTH CONCERNS WHEN THE ZODIAC IS AFFLICTED*

Virgo is the guardian of the large and small intestine or bowels, lumbar, and the sympathetic nerve.

Afflicted zodiac may cause –

nerve disorder, intestinal disorder, pain in the gut/intestine, absorb the juice/liquid from the body, stomach pain, griping, dysentery, anemia, Intestinal fever, cholera, Constipation, inflammation of the intestine.

This picture represents the Zodiac sign Libra. Get your personal horoscope analyzed and work on the remedies for faster success of personal & professional lives.

♎ *LIBRA*

Birthday from 23 September to 22 October

✔️*PROBABLE HEALTH CONCERNS WHEN THE ZODIAC IS AFFLICTED*

Libra is the guardian of the bladder, the seed produced in men and women, pelvis, waist, kidney, kidney function to clear urine, renal arteries, renal veins, renal pelvis, renal columns, fibrous capsule, minor/major calyx, ureter, and hilum.

Afflicted zodiac may cause –

inflammation of the kidney, nephrectomy, ablation, kidney disease, bladder control problems, urinary tract infection, urine blockage.

This picture represents the Zodiac sign Scorpio. Get your personal horoscope analyzed and work on the remedies for faster success of personal & professional lives.

♏ *SCORPIO*

Birthday from 23 October to 22 November

✔️*PROBABLE HEALTH CONCERNS WHEN THE ZODIAC IS AFFLICTED*

Scorpio is the guardian of waist, kidney, genital, penis, urethra, scrotum, seminal vesicle, testes, vas deferens, epididymis, prostate, bulbourethral gland, ejaculatory duct, mons pubis, vagina, labia majora, labia minora, Bartholin glands, clitoris, vulva, urinary tract, external emitting vein of testicles, Cowper duct, liver, gallbladder, anus, rectum, and gland enlargement located near the mouth of the men's bladder.

Afflicted zodiac may cause –

Ovulation/syphilis affects the throat/nasal congestion, urinary tract inflammation, urine accumulation, stone, corpuscle problem, clitoris problems, piles, acute sensation without feeling, bile, swelling of the gums and blood flowing through them, pox, gonorrhea, malignant disorders, vaginal inflammation, semen defects.

This picture represents the Zodiac sign Sagittarius. Get your personal horoscope analyzed and work on the remedies for faster success of personal & professional lives.

♐ *SAGITTARIUS*

Birthday from 23 November to 22 December

✔️*PROBABLE HEALTH CONCERNS WHEN THE ZODIAC IS AFFLICTED*

Sagittarius is the guardian of hips, buttocks, Scalp, Femur, Rectum, Sacrum, and thighs.

Afflicted zodiac may cause –

injury from a bullet/shotgun, wounds, accidents, thigh burn, intestinal fever, arthritis, slip disc, rheumatism.

This picture represents the Zodiac sign Capricorn. Get your personal horoscope analyzed and work on the remedies for faster success of personal & professional lives.

♑ *CAPRICORN*

Birthday from 23 December to 22 January

✔️*PROBABLE HEALTH CONCERNS WHEN THE ZODIAC IS AFFLICTED*

Capricorn is the guardian of the knees, bones, joints, regulating the body functions, sense of sensitivity, unproductive body parts, skin, control of the natural life cycle, and external skin.

Afflicted zodiac may cause –

constipation, nausea, dermatitis, the air in the veins, rheumatism, hysteria, knee jerk, leprosy, acne, rashes, rheumatoid arthritis.

This picture represents the Zodiac sign Aquarius. Get your personal horoscope analyzed and work on the remedies for faster success of personal & professional lives.

♒ *AQUARIUS*

Birthday from 23 January to 22 February

✔️*PROBABLE HEALTH CONCERNS WHEN THE ZODIAC IS AFFLICTED*

Aquarius is the guardian of calf, soleus, the part below the knee, removing carbonic acid gas from the body, blood, and circulatory system.

Afflicted zodiac may cause –

blood contamination, lack of oxygen in the blood, bent knee, broken knees, dehydration, blood deficiency, swelling of knees, cramps, heart weakening, muscle pull, nerve disorder, poisoning.

This picture represents the Zodiac sign Pisces. Get your personal horoscope analyzed and work on the remedies for faster success of personal & professional lives.

♓ *PISCES*

Birthday from 23 February to 20 March

✔️*PROBABLE HEALTH CONCERNS WHEN THE ZODIAC IS AFFLICTED*

Pisces is the guardian of feet, toes, succulent flow, dormant or cold blood in the body, fingerprints of hands and toes.

Afflicted zodiac may cause –

the numbness or dullness on the nerves, mucus, pus, and nasal congestion often creates nausea, syphilis, any liquid discharge in the body, pox, rheumatism, soaked feet, Deformity of the feet, cold feet, cold in the body, dropsy, ascites, bones softening, a disorder of Vaata-Pitta-Kapha, The side effects of addiction.

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दस महाविद्या

काली, तारा महाविद्या, षोडशी भुवनेश्वरी।
भैरवी, छिन्नमस्तिका च विद्या धूमावती तथा॥
बगला सिद्धविद्या च मातंगी कमलात्मिका।
एता दश-महाविद्याः सिद्ध-विद्याः प्रकीर्तिताः॥

दस महाविद्या दुर्गा के ही रूप है जिसे सिद्धि देने वाली मानी जाती है। मां दुर्गा के इन दस महाविद्याओं की साधना करने वाला व्यक्ति सभी भौतिक सुखों को प्राप्त कर बंधन से भी मुक्त हो जाता है। ये दस महाविद्याएं इस प्रकार है - काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी व कमला।

श्री देवीभागवत पुराण के अनुसार महाविद्याओं की उत्पत्ति भगवान शिव और सती के बीच एक विवाद के कारण हुई। सती के पिता दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने सभी देवी-देवताओं को आमन्त्रित किया लेकिन द्वेषवश उन्होंने अपने जामाता भगवान शंकर और अपनी पुत्री सती को निमन्त्रित नहीं किया। सती, पिता के द्वारा आयोजित यज्ञ में जाने की जिद करने लगीं जिसे शिव ने उन्हें न जाने के लिए समझाया। परंतु सती अपने पिता के आयोजित यज्ञ में जाने के लिए हठ कर रही थी। तब शिव के समझाने पर भी अपनी हठ पकड़े हुए सती ने स्वयं को एक भयानक रूप में परिवर्तित कर लिया। जो स्वयं में महाकाली अवतार में प्रकट हुई। जिसे देख भगवान शिव वहां से भागने को उद्यत हुए। अपने पति को डरा या रुष्ट हुआ जानकर माता सती उन्हें रोकने लगीं। शिव जिस दिशा में गये उस दिशा में माँ का एक अन्य विग्रह प्रकट होकर उन्हें रोकता है। इस प्रकार दसों दिशाओं में माँ ने वे दस रूप लिए थे वे ही दस महाविद्याएँ कहलाईं। इस प्रकार देवी दस रूपों में विभाजित हो गयीं जिनसे वह शिव के विरोध को हराकर यज्ञ में भाग लेने गयीं।

हमारे प्राचीन ग्रंथों में दस महाविद्याओं का उल्लेख है जिनकी पूजा हर प्रकार की शक्तियों को प्राप्त करने के लिए की जाती है। महाविद्या पूजा को साधना के रूप में जाना जाता है जिसमें उपासक एक ही देवी को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए ध्यान केंद्रित करता है। किसी भी साधना में यंत्र और मंत्र बहुत ही प्रभावशाली माध्यम माने जाते हैं जिनके माध्यम से उपासक अपने लक्ष्य तक पहुंच सकता है और उसे करने के अपने मकसद को पूरा कर सकता है। तांत्रिकों द्वारा दस महाविद्याओं की साधना की जाती है, जो कि गुप्‍त होती हैं।
दस महाविद्याओं की पूजा से भक्तो को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

काली कुल तथा श्रीकुल

दस महाविद्याओं को दो कुलों में विभाजित किया गया है।

काली कुल – मां काली, मां तारा और मां भुवनेश्वरी
श्रीकुल – मां बगलामुखी, मां कमला, मां छिन्नमस्ता, मां त्रिपुर सुंदरी, मां भैरवी, मां मांतगी और मां धूमावती

प्रथम महाविद्या - काली

Das Mahavidya Kali

दस महाविद्या की प्रथम देवी - आदिशक्ति काली

काली, परब्रह्म का परम रूप, "काल की भी काल," कालीकुल प्रणालियों की सर्वोच्च देवता, महाकाली। महाकाली का रंग गहरा काला है, जो मृत्यु-रात्रि के अंधेरे से भी गहरा है। उनकी तीन आंखें हैं, जो भूत, वर्तमान और भविष्य का प्रतिनिधित्व करती हैं। उसके चमकदार सफेद, नुकीले दांत, खुला मुंह और उसकी लाल, खूनी जीभ वहां से लटकी हुई है। उसके असीमित, अस्त-व्यस्त बाल हैं। उसने अपने वस्त्र के रूप में बाघ की खाल, खोपड़ियों की माला और गले में गुलाबी लाल फूलों की माला पहनी हुई थी, और उसकी कमर पर कंकाल की हड्डियाँ, कंकाल के हाथ और साथ ही बोहोतसारे कटे हुए हाथ और पाँव उसके आभूषण के रूप में सुशोभित है। उस देवी के चार हाथ हैं, उनमें से दो के पास त्रिशूल और तलवार है और एक राक्षस का कटा हुआ सिर पकड़े हुए है और एक कटोरा है जो राक्षस के सिर से टपकते खून को इकट्ठा करता है।

उद्देश्य - विद्या, लक्ष्‍मी, राज्य, अष्टसिद्धि, वशीकरण, प्रतियोगिता विजय, युद्ध-चुनाव आदि में विजय एवम् मोक्ष तक प्राप्त होता है।

इनके भैरव कालभैरव हैं।

लाल रंग के वस्त्र पहन कर तथा लाल आसन पर बैठकर काली हकीक की माला से जप करें ।

दिशा - पूर्व अथवा उत्तर।

नियमित उपासक - ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय से डेढ़ घंटे के भीतर करें।

साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।

मूल मंत्र - ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं दक्षिण का‍लिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं स्वाहा।

शाबर मन्त्र - ॐ निरंजन निराकार अवगत पुरुष तत-सार, तत-सार मध्ये ज्योत, ज्योत मध्ये परम-ज्योत, परम-ज्योत मध्ये उत्पन्न भई माता शम्भु शिवानी काली ॐ काली काली महाकाली, कृष्ण वर्णी, शव वाहिनी, रुद्र की पोषणी, हाथ खप्पर खडग धारी, गले मुण्डमाला हंस मुखी । जिह्वा ज्वाला दन्त काली । मद्यमांस कारी श्मशान की राणी । मांस खाये रक्त पीवे । भस्मन्ती माई जहां पाई तहां लगाई। सत की नाती धर्म की बेटी इन्द्र की साली काल की काली जोग की जोगन, नागों की नागन मन माने तो संग रमाई नहीं तो श्मशान फिरे अकेली चार वीर अष्ट भैरों, घोर काली अघोर काली अजर बजर अमर काली भख जून निर्भय काली बला भख, दुष्ट को भख, काल भख पापी पाखण्डी को भख जती सती को रख, ॐ काली तुम बाला ना वृद्धा, देव ना दानव, नर ना नारी देवीजी तुम तो हो परब्रह्मा काली ।

द्वितीय महाविद्या - तारा

Das Mahavidya Tara

दस महाविद्या की द्वितीय देवी – तारा अथवा श्मशान तारा

तारा देवी मार्गदर्शक और रक्षक के रूप में है। जो परम ज्ञान प्रदान करती है जो मोक्ष देती है। वह ऊर्जा के सभी स्रोतों की देवी हैं। सूर्य को भी उसीसे ऊर्जा प्राप्त है। वह समुद्र मंथन की घटना के बाद भगवान शिव की मां के रूप में प्रकट हुईं ताकि उन्हें अपने बच्चे के रूप में पाकर शिव जी को स्वस्थ कर सके। तारा हल्के नीले रंग की है। उसके बाल बिखरे हुए हैं, वह अर्धचंद्र के अंक से सुशोभित मुकुट पहने हुए है। उसकी तीन आंखें हैं, उसके गले में मौज से लिपटा एक सांप, बाघ की खाल पहने हुए, और खोपड़ी की एक माला। वह बाघ की खाल से बना पल्ला अपनी कमर में पहने हुई हैं। उसके चार हाथों में एक कमल, कृपाण, राक्षस का सिर और कतरनी है। उनका बायां पैर लेटे हुए शिव पर टिका है। समय आने पर वह अपनी भुजाओ की क्षमता बढ़ा सकती है।

उद्देश्य - शत्रुओं का नाश, ज्ञान तथा जीवन के हर क्षेत्र में सफलता के लिए इनकी साधना की जाती है।

इनके भैरव अक्षोभ्य हैं।

श्वेत वस्त्र पहन कर तथा लाल आसन पर बैठकर स्फटिक माला से जप करें ।

दिशा - दक्षिण

स्थान - श्मशान भूमि

नियमित उपासक - इनकी साधना न करें।

साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।

मूल मंत्र - ॐ ऐं ओं क्रीं क्रीं हूं फट्।

मंत्र - ऐं ऊँ ह्रीं क्रीं हूं फट्।

मंत्र - ॐ ह्रीं स्त्रीं फट्।

शाबर मन्त्र - ॐ आदि योग अनादि माया जहाँ पर ब्रह्माण्ड उत्पन्न भया । ब्रह्माण्ड समाया आकाश मण्डल तारा त्रिकुटा तोतला माता तीनों बसै ब्रह्म कापलि, जहाँ पर ब्रह्मा-विष्णु-महेश उत्पत्ति, सूरज मुख तपे चंद मुख अमिरस पीवे, अग्नि मुख जले, आद कुंवारी हाथ खड्ग गल मुण्ड माल, मुर्दा मार ऊपर खड़ी देवी तारा । नीली काया पीली जटा, काली दन्त में जिह्वा दबाया । घोर तारा अघोर तारा, दूध पूत का भण्डार भरा । पंच मुख करे हां हां ऽऽकारा, डाकिनी शाकिनी भूत पलिता सौ सौ कोस दूर भगाया । चण्डी तारा फिरे ब्रह्माण्डी तुम तो हों तीन लोक की जननी ।

तीसरा महाविद्या - षोडशी | त्रिपुर सुंदरी

दस महाविद्या की तीसरी देवी – षोडशी, ललिता त्रिपुर सुंदरी, श्रीविद्या, राजराजेश्वरी, महात्रिपुरसुन्दरी, बाला, बालापञ्चदशी जैसे अनेक नाम है ।

कुछ ग्रंथो के अनुसार ये चतुर्थ देवी है। परंतु इनकी पूजा नवरात्री की तीसरी रात्रि को करते है।

त्रिपुरा सुंदरी (षोडशी, ललिता) देवी जो "तीन लोकों में सुंदर" हैं। श्रीकुल प्रणालियों की सर्वोच्च देवता है। "तांत्रिक पार्वती" या "मोक्ष मुक्ता" नाम से भी जानी जाती है। यह देवी के शाश्वत सर्वोच्च निवास मणिद्वीप की प्रमुख देवता हैं। षोडशी का रंग पिघले हुए सोने की तरह है। वह तीन शांत आँखे, शांत चेहरे, लाल और गुलाबी वस्त्र पहने हुए, अपने दिव्य अंगों और चार हाथों पर आभूषणों से सुशोभित दिख रही है। उसके हाथ में अंकुश, कमल, धनुष और तीर है। वह सिंहासन पर बैठी है।

उद्देश्य - हर क्षेत्र में सफलता हेतु इनकी साधना की जाती है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए। अपार धन-समृद्धी एवम् यश प्राप्ति के लिए।

इनके भैरव पंचवक्त्र शिव हैं।

प्रतिरूप - श्री यंत्र अथवा कमल पर विराजमान माता लक्ष्मी।

दिशा - पूर्व अथवा उत्तर।

कुशासन अथवा लाल या पीला कंबल आसन। वस्त्र, नैवेद्य सभी पीत अथवा लाल अथवा श्वेत होने चाहिए। स्फटिक माला से जप करें ।
नियमित उपासक - ब्रह्म मुहूर्त करें।

नियमित उपासक - ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय से डेढ़ घंटे के भीतर अथवा रात्रि १० के बाद करें।

साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।

मूल मंत्र - श्री ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं क्रीं कए इल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।

मंत्र - ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं क ए ह ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं महाज्ञानमयी विद्या षोडशी मॉं सदा अवतु।।

शाबर मन्त्र - ॐ निरञ्जन निराकार अवधू मूल द्वार में बन्ध लगाई पवन पलटे गगन समाई, ज्योति मध्ये ज्योत ले स्थिर हो भई ॐ मध्याः उत्पन्न भई उग्र त्रिपुरा सुन्दरी शक्ति आवो शिवधर बैठो, मन उनमन, बुध सिद्ध चित्त में भया नाद । तीनों एक त्रिपुर सुन्दरी भया प्रकाश । हाथ चाप शर धर एक हाथ अंकुश । त्रिनेत्रा अभय मुद्रा योग भोग की मोक्षदायिनी । इडा पिंगला सुषम्ना देवी नागन जोगन त्रिपुर सुन्दरी । उग्र बाला, रुद्र बाला तीनों ब्रह्मपुरी में भया उजियाला । योगी के घर जोगन बाला, ब्रह्मा विष्णु शिव की माता ।

पाठ - श्री सूक्तम् ।

चतुर्थ महाविद्या - छिन्नमस्ता

Das Mahavidya Chhinnamasta

दस महाविद्या की चतुर्थ देवी – छिन्नमस्ता।

कुछ ग्रंथो के अनुसार ये तृतीय देवी है। परंतु इनकी पूजा नवरात्री की चतुर्थ रात्रि को करते है।

छिन्नमस्ता स्वयंभू देवी है जिसने जय और विजय अर्थात रजस और तमस गुणों को संतुष्ट करने के लिए उसने अपना सिर काट लिया है । छिन्नमस्ता का रंग लाल है, जो भयानक रूप के साथ सन्निहित है। उसके बिखरे बाल हैं। उसके चार हाथ हैं, जिनमें से एक हाथ में तलवार है और दूसरे हाथ में स्वयं का कटा हुआ सिर है। वह भयानक चेहरे वाली तीन चमकती आंखें धारण किये, मुकुट पहने हुए है। उसके दो अन्य हाथों में से एक में कमंद और दूसरे में पीने का कटोरा है। वह एक आंशिक रूप से कपड़े पहने महिला है, जो उसके अंगों पर आभूषणों से सुशोभित है और उसके शरीर पर खोपड़ी की माला है। वह एक मैथुन करने वाले जोड़े की पीठ पर खड़ी है।

उद्देश्य - संतान प्राप्ति, दरिद्रता निवारण, काव्य शक्ति लेखन, शत्रु-विजय, समूह-स्तम्भन, राज्य-प्राप्ति, कुंडलिनी जागरण एवम् मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इनके भैरव क्रोध भैरव हैं।

श्वेत वस्त्र पहन कर तथा लाल कंबल आसन पर बैठकर स्फटिक माला से जप करें ।

दिशा – दक्षिण अथवा पूर्व अथवा उत्तर।

स्थान - श्मशान भूमि अथवा गुरु के मार्गदर्शन से मन्दिर में साधना करें ।

नियमित उपासक - इनकी साधना न करें।

साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।

मूल मंत्र - श्री ह्रीं क्लीं ऐं वज्रवैरोचनीये हूं हूं फट् स्वाहा।

शाबर मन्त्र - सत का धर्म सत की काया, ब्रह्म अग्नि में योग जमाया । काया तपाये जोगी (शिव गोरख) बैठा, नाभ कमल पर छिन्नमस्ता, चन्द सूर में उपजी सुष्मनी देवी, त्रिकुटी महल में फिरे बाला सुन्दरी, तन का मुन्डा हाथ में लिन्हा, दाहिने हाथ में खप्पर धार्या । पी पी पीवे रक्त, बरसे त्रिकुट मस्तक पर अग्नि प्रजाली, श्वेत वर्णी मुक्त केशा कैची धारी । देवी उमा की शक्ति छाया, प्रलयी खाये सृष्टि सारी । चण्डी, चण्डी फिरे ब्रह्माण्डी भख भख बाला भख दुष्ट को मुष्ट जती, सती को रख, योगी घर जोगन बैठी, श्री शम्भुजती गुरु गोरखनाथजी ने भाखी । छिन्नमस्ता जपो जाप, पाप कन्टन्ते आपो आप, जो जोगी करे सुमिरण पाप पुण्य से न्यारा रहे । काल ना खाये ।

पांचवी महाविद्या - भुवनेश्वरी

Das Mahavidya Bhuvaneshwari

दस महाविद्या की पांचवी देवी – भुवनेश्वरी

कुछ ग्रंथो के अनुसार ये चतुर्थ देवी है। परंतु इनकी पूजा नवरात्री की पांचवी रात्रि को करते है।

भुवनेश्वरी विश्व माता के रूप में हैं। इनका शरीर सभी १४ लोक एवं संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। भुवनेश्वरी गोरी, सुनहरे रंग की है। इसकी तीन संतुष्ट आँखें और साथ ही शांत भाव है। वह लाल और पीले वस्त्र पहनती है। उसके अंग आभूषणों से सुशोभित है और उसके चार हाथ हैं। उसके चार में से दो हाथों में अंकुश और फंदा है जबकि उसके दो अन्य हाथ खुले हैं। वह दिव्य सिंहासन पर विराजमान है। बाघ पर बैठती है तो स्वयं जगदम्बा है।

भगवान कृष्ण की भी माता भुवनेश्वरी आराध्या रही हैं जिससे वे 'योगेश्वर' कहलाए।

उद्देश्य - इनका साधक कीचड़ में कमल की तरह संसार में रहकर भी योगी कहलाता है। वशीकरण, सम्मोहन, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष देती हैं।

इनके भैरव त्र्यम्बक‍ शिव हैं।

रक्त वर्ण के वस्त्र पहन कर तथा रक्त वर्ण के आसन पर बैठकर स्फटिक माला से जप करें ।

दिशा – दक्षिण अथवा पूर्व अथवा उत्तर।

नियमित उपासक - ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय से डेढ़ घंटे के भीतर करें।

साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।

मूल मंत्र - ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं सौ: भुवनेश्वर्ये नम:।

मूल मंत्र - ह्रीं।

मूल मंत्र - ऐं ह्रीं।

मूल मंत्र - ऐं ह्रों ऐं।

मूल मंत्र - ऐं ह्रीं श्रीं।

शाबर मन्त्र - ॐ आदि ज्योति अनादि ज्योत ज्योत मध्ये परम ज्योत परम ज्योति मध्ये शिव गायत्री भई उत्पन्न, ॐ प्रातः समय उत्पन्न भई देवी भुवनेश्वरी । बाला सुन्दरी कर धर वर पाशांकुश अन्नपूर्णी दूध पूत बल दे बालका ऋद्धि सिद्धि भण्डार भरे, बालकाना बल दे जोगी को अमर काया । चौदह भुवन का राजपाट संभाला कटे रोग योगी का, दुष्ट को मुष्ट, काल कन्टक मार । योगी बनखण्ड वासा, सदा संग रहे भुवनेश्वरी माता ।

छठी महाविद्या - त्रिपुर भैरवी

Das Mahavidya Tripura Bhairavi

दस महाविद्या की छठी देवी – त्रिपुर भैरवी जिनके अन्य नाम भैरवी, नित्य भैरवी, भद्र भैरवी, श्मशान भैरवी, सकल सिद्धि भैरवी, पाताल भैरवी, संपत-प्रदा भैरवी, कामेश्वरी भैरवी है।

कुछ ग्रंथो के अनुसार ये पांचवी देवी है। परंतु इनकी पूजा नवरात्री की छठी रात्रि को करते है।

भैरवी एक उग्र देवी है। भैरव का स्त्री रूप है। भैरवी उग्र ज्वालामुखी के समान लाल रंग की है, जिसकी तीन उग्र आँखें और अस्त-व्यस्त बाल हैं। उसके उलझे हुए बाल गोखरू में बंधे हैं, और अर्धचंद्र द्वारा सजाये गए है। उसके शीश को दो सींगों सुशोभित कर रहे है। उसके रक्त से लाल मुंह को दो उभरे हुए दांत शोभा दे रहे हैं। वह लाल और नीले रंग के वस्त्र पहनी है और उसके गले में खोपड़ियों की माला सुशोभित है। वह कटे हुए हाथों और उससे जुड़ी हड्डियों से सजी माला अपने कमर में पहनी हुई है । वह अपने आभूषण के रूप में सांपों और नागों से अलंकृत है। उसके चार हाथों में से दो खुले हुए हैं और दो में एक माला और पुस्तक धरे हुए है।

उद्देश्य - ऐश्वर्य प्राप्ति, रोग-शांति, त्रैलोक्य विजय व आर्थिक उन्नति के लिए पूजी जाती हैं।

इनके भैरव बटुक भैरव हैं। चाहे इनके भैरव बटुक भैरव है, इनकी पूजा करते समय काल भैरव की पूजा अवश्य करें।

रक्त वर्ण के वस्त्र पहन कर तथा रक्त वर्ण के आसन पर बैठकर स्फटिक माला से जप करें ।

दिशा – पूर्व।

नियमित उपासक - ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय से डेढ़ घंटे के भीतर करें।

साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।

मूल मंत्र - हसरैं हसकलरीं हसरौ:।

मूल मंत्र - हस: हसकरी हसे।

मंत्र - हस्त्रौं हस्क्लरीं हस्त्रौं।।

मंत्र - ह्रीं भैरवी क्लौं ह्रीं स्वाहा ।

मंत्र - ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम: ।

मंत्र - ॐ ह्रीं सर्वैश्वर्याकारिणी देव्यै नमो नम:।

शाबर मन्त्र - ॐ सती भैरवी भैरो काल यम जाने यम भूपाल तीन नेत्र तारा त्रिकुटा, गले में माला मुण्डन की । अभय मुद्रा पीये रुधिर नाशवन्ती ! काला खप्पर हाथ खंजर कालापीर धर्म धूप खेवन्ते वासना गई सातवें पाताल, सातवें पाताल मध्ये परम-तत्त्व परम-तत्त्व में जोत, जोत में परम जोत, परम जोत में भई उत्पन्न काल-भैरवी, त्रिपुर- भैरवी, समपत-प्रदा-भैरवी, कौलेश- भैरवी, सिद्धा-भैरवी, विध्वंशिनी-भैरवी, चैतन्य-भैरवी, कमेश्वरी-भैरवी, षटकुटा-भैरवी, नित्या-भैरवी, जपा-अजपा गोरक्ष जपन्ती यही मन्त्र मत्स्येन्द्रनाथजी को सदा शिव ने कहायी । ऋद्ध फूरो सिद्ध फूरो सत श्रीशम्भुजती गुरु गोरखनाथजी अनन्त कोट सिद्धा ले उतरेगी काल के पार, भैरवी भैरवी खड़ी जिन शीश पर, दूर हटे काल जंजाल भैरवी मन्त्र बैकुण्ठ वासा । अमर लोक में हुवा निवासा ।
पूजा- श्री दुर्गा सप्तशती में महिषासुर वध का अध्याय करें।

सातवीं महाविद्या - धूमावती

Das Mahavidya Dhumavati

दस महाविद्या की सातवीं देवी – धूमावती है। जो ज्येष्ठा लक्ष्मी कहलाती हैं।

धूमावती एक विधवा का रूप धारण किये है। यह धुएँ के रंग के गहरे भूरे रंग की है। उसकी त्वचा झुर्रीदार है। उसका मुँह सूख गया है। उसके कुछ दाँत गिर गए हैं। उसके लंबे बिखरे हुए बाल भूरे हैं। उसकी आँखें रक्तवर्ण के रूप में दिखाई देती हैं। इस देवी को एक भयावह स्थिति, जिसे क्रोध, दुख, भय, थकावट, बेचैनी, निरंतर भूख और प्यास के संयुक्त स्रोत के रूप में देखा जाता है। वह सफेद कपड़े पहनती है और विधवा के वेश में। वह अपने परिवहन के वाहन के रूप में एक घोड़े रहित रथ में बैठी है। उसके रथ के शीर्ष पर एक ध्वजा है जिसका प्रतिक एक कौआ है। उसके दो कांपते हाथ हैं, उसका एक हाथ वरदान और ज्ञान प्रदान करता है और दूसरे हाथ में सूप की टोकरी है।

उद्देश्य - कर्ज से मुक्ति, दरिद्र दूर करने, जमीन-जायदाद के झगड़े निपटाने, उधारी वसूलने के लिए पूजी जाती हैं।

इनके कोई भैरव नहीं है।

अन्य देवियों की तरह पूजन सामग्री निषेध है। रंगीन वस्तु कोई भी नहीं चढ़ाई जाती है।

श्वेत वर्ण के वस्त्र पहन कर तथा श्वेत वर्ण के आसन पर बैठकर तुलसी की माला से जप करें ।

दिशा – दक्षिण अथवा उत्तर।

स्थान - श्मशान भूमि अथवा शून्यागार में गुरु के मार्गदर्शन में साधना करें ।

नियमित उपासक - इनकी साधना न करें।

साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।

मूल मंत्र - धूं धूं धूमावती स्वाहा ।

मूल मंत्र - धूं धूं धूमावती ठ: ठ:।

शाबर मन्त्र - ॐ पाताल निरंजन निराकार, आकाश मण्डल धुन्धुकार, आकाश दिशा से कौन आये, कौन रथ कौन असवार, आकाश दिशा से धूमावन्ती आई, काक ध्वजा का रथ अस्वार आई थरै आकाश, विधवा रुप लम्बे हाथ, लम्बी नाक कुटिल नेत्र दुष्टा स्वभाव, डमरु बाजे भद्रकाली, क्लेश कलह कालरात्रि । डंका डंकनी काल किट किटा हास्य करी । जीव रक्षन्ते जीव भक्षन्ते जाजा जीया आकाश तेरा होये । धूमावन्तीपुरी में वास, न होती देवी न देव तहा न होती पूजा न पाती तहा न होती जात न जाती तब आये श्रीशम्भुजती गुरु गोरखनाथ आप भयी अतीत ।

आठवीं महाविद्या - बगलामुखी 

Das Mahavidya Baglamukhi

दस महाविद्या की आठवीं देवी – माँ बगलामुखी है। जो माँ पीताम्बरा कहलाती हैं।

यह युग इनका ही है।

बगलामुखी देवी शत्रुओं का नाश करती हैं। इस देवी को पीताम्बरा भी कहते है। देवी बगलामुखी का रंग पिघले हुए सोने जैसा है। उसकी तीन चमकदार आंखें, हरे-भरे काले बाल और सौम्य चेहरा हैं। वह पीले रंग के वस्त्र और आभूषण पहने हैं। उसके दो हाथों में से एक के गदा है और दूसरे हाथ में राक्षस मदनासुर की जीभ पकड़ी हुई है। वह सिंहासन अर्थात सारस की पीठ पर बैठी हुई है।

उद्देश्य - रोग-दोष, शत्रु शांति, वाद-विवाद, कोर्ट-कचहरी में विजय, युद्ध-चुनाव विजय, वशीकरण, स्तम्भन तथा धन प्राप्ति के लिए अचूक साधना मानी जाती है। व्यापार वृद्धि एवं राजसत्ता की प्राप्ति के लिए पूजी जाती हैं।

इनके भैरव मृत्युंजय है।

विशेष सावधानी आवश्यक है। पीला आसन, पीला वस्त्र, हरिद्रा माला का प्रयोग होता है।

दिशा- पूर्व अथवा उत्तर।

गुरु के मार्गदर्शन में साधना करें ।

नियमित उपासक - इनके मूल मंत्र का सवा लाख का अनुष्ठान स्वयं करके या किसी ब्राह्मण से करवाने के बाद ही दिनचर्या में मंत्र जाप करें। 

नियमित उपासक - ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय से डेढ़ घंटे के भीतर करें।

साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।

मूल मंत्र- ह्लीं ।

मूल मंत्र- ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय, जिव्हा कीलय, बुद्धिं विनाश्य ह्लीं ॐ स्वाहा।

शाबर मन्त्र - ॐ सौ सौ दुता समुन्दर टापू, टापू में थापा सिंहासन पीला । संहासन पीले ऊपर कौन बसे । सिंहासन पीला ऊपर बगलामुखी बसे, बगलामुखी के कौन संगी कौन साथी । कच्ची-बच्ची-काक-कूतिया-स्वान-चिड़िया, ॐ बगला बाला हाथ मुद्-गर मार, शत्रु हृदय पर सवार तिसकी जिह्वा खिच्चै बाला । बगलामुखी मरणी करणी उच्चाटण धरणी, अनन्त कोट सिद्धों ने मानी ॐ बगलामुखी रमे ब्रह्माण्डी मण्डे चन्दसुर फिरे खण्डे खण्डे । बाला बगलामुखी नमो नमस्कार ।

नौंवी महाविद्या - मातङ्गी 

Das Mahavidya Matangi

दस महाविद्या की नौंवी देवी – मातङ्गी है।

देवी मातंगी श्रीकुल प्रणाली में प्रधान मंत्री या अमात्य के रुप में है। इसे "तांत्रिक सरस्वती" भी कहते है। इसका रंग पन्ना की तरह हरा है। उसके चमके अस्त-व्यस्त काले बाल और तीन शांत आँखें है। उनका चेहरा शांत है। वह अपने नाजुक अंगों पर विभिन्न आभूषणों से सजी लाल वस्त्र और परिधान पहने हुए हैं। वह एक राजसी सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके चार हाथ हैं, जिनमें से तीन में एक हाथ में तलवार, एक में खोपड़ी और एक में वीणा है। उनका एक हाथ अपने भक्तों को वरदान देता है। माता ज्ञान देते समय सरस्वती के रुप में दिखाई देती है।

उद्देश्य - शीघ्र विवाह, गृहस्थ जीवन सुखी बनाने, वशीकरण, गीत-संगीत में सिद्धि प्राप्त करने के लिए पूजी जाती हैं।

इनके भैरव मातङ्ग है।

दिशा- पूर्व अथवा उत्तर।

नियमित उपासक - ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय से डेढ़ घंटे के भीतर अथवा रात्रि १० के बाद करें।

साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।

मूल मंत्र- श्री ह्रीं क्लीं हूं मातङ᳭गयै फट् स्वाहा।

शाबर मन्त्र - ॐ शून्य शून्य महाशून्य, महाशून्य में ओंकार, ओंकार मे शक्ति, शक्ति अपन्ते उहज आपो आपना, सुभय में धाम कमल में विश्राम, आसन बैठी, सिंहासन बैठी पूजा पूजो मातंगी बाला, शीश पर शशि अमीरस प्याला हाथ खड्ग नीली काया। बल्ला पर अस्वारी उग्र उन्मत्त मुद्राधारी, उद गुग्गल पाण सुपारी, खीरे खाण्डे मद्य मांसे घृत कुण्डे सर्वांगधारी। बूँद मात्रेन कडवा प्याला, मातंगी माता तृप्यन्ते तृप्यन्ते। ॐ मातंगी, सुंदरी, रूपवन्ती, धनवन्ती, धनदाती, अन्नपूर्णी, अन्नदाती, मातंगी जाप मन्त्र जपे काल का तुम काल को खाये । तिसकी रक्षा शम्भुजती गुरु गोरखनाथजी करे ।

दसवीं महाविद्या - कमला 

Das Mahavidya Kamala Mahalakshmi

दस महाविद्या की दसवीं देवी – कमला है। इनके अन्य नाम कमलात्मिका, लक्ष्मी, षोडशी, भार्गवी, त्रिपुरा है।

कमलात्मिका, कमला, कमल, पद्मिनी ऐसे कई नाम है इस देवी के। इसे "तांत्रिक लक्ष्मी" से भी जानते है। यह देवी पिघले हुए सोने के रंग की है। इसके चमकते काले बाल है। इसकी तीन चमकदार और शांत आँखें है। इसकी उदार अभिव्यक्ति है। वह लाल और गुलाबी रंग के वस्त्र और परिधान पहने और अपने अंगों पर विभिन्न आभूषणों और कमलों से सुशोभित दिखाई देती हैं। वह पूरी तरह से खिले हुए कमल पर विराजमान हैं, जबकि उनके चार हाथों में दो कमल हैं, जबकि दो अपने भक्तों की इच्छाओं को पूरी करते हैं और भय से सुरक्षा का आश्वासन देते हैं।

यह देवी त्रिपुर शिव की पत्नी होने से इन्हे त्रिपुरा कहा जाता है। शिव स्वयं की इच्छा से त्रिपुर स्वरूप त्रिधा मतलब तीन भाग में हो गए।

जिनका ऊर्ध्वः भाग गौरवर्ण, चार भुजावला और चतुर्मुख ब्रह्मरूप कहलाया। ब्रह्मा के साथ जुड़ा स्वरूप महासरस्वती कहलाया।

मध्यभाग नीलवर्ण, एक मुख और चतुर्भुज विष्णु कहलाया। विष्णु के साथ जुड़ा स्वरूप कमला एवं महालक्ष्मी कहलाया।

अधोभाग स्फ़टिक वर्ण, पञ्चमुख और चतुर्भुज शिव कहलाया। पार्वती का स्वरूप जो शिव से जुड़ा है वह शक्ति एवं त्रिपुरा कहलाया।

महालक्ष्मी के समुद्र में समाहित होने के पश्चात् देवी कमला समुद्र मंथन के फलस्वरूप प्रादुर्भावित हुई थी। और इन्होने भगवान विष्णु को पतिरुपमें पुनः वरण किया।

उद्देश्य - भौतिक साधनों की वृद्धि, व्यापार-व्यवसाय में वृद्धि, धन-संपत्ति प्राप्त करने एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए के लिए पूजी जाती हैं।

इनके भैरव सदाशिव है।

गुलाबी वस्त्रासन, कमल गट्टे की माला आदि प्रयोग किए जाते हैं। अथवा लाल कंबल आसान एवं स्फटिक या कमलगट्टे की माला का प्रयोग भी किया जा सकता है। बिल्वपत्र एवं बेल फल से हवन एवं पूजा से विशेष लाभ मिलता है।

दिशा- पूर्व अथवा उत्तर। सूर्यास्त के बाद पश्चिम की और मुख करके पूजन कर सकते है।

नियमित उपासक - ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय से डेढ़ घंटे के भीतर अथवा रात्रि १० के बाद करें।

साधक - रात्री १० बजे के बाद साधना करें।

मूल मंत्र- ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद-प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नम:।

मूल मंत्र- श्रीं ।

मंत्र- ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौः जगत्प्रसूत्यै नमः।।

मंत्र- ॐ ह्रीं क्लीं कमला देवी फट् स्वाहा ।

शाबर मन्त्र - ॐ अयोनि शंकर ॐकार रूप, कमला देवी सती पार्वती का स्वरुप । हाथ में सोने का कलश, मुख से अभय मुद्रा । श्वेत वर्ण सेवा पूजा करे, नारद इन्द्रा । देवी देवत्या ने किया जय ॐकार। कमला देवी पूजो केशर, पान, सुपारी, चकमक चीनी फतरी तिल गुग्गल सहस्र कमलों का किया हवन । कहे गोरख, मन्त्र जपो जाप जपो ऋद्धि-सिद्धि की पहचान गंगा गौरजा पार्वती जान । जिसकी तीन लोक में भया मान । कमला देवी के चरण कमल को आदेश

पाठ - श्री सूक्त, कनकधारा स्तोत्र।

दस महाविद्या दैनिक मंत्र 

काली तारा महाविद्या षोडशी भूवनेश्वरी ।
भैरवी छिन्नमस्ता च विद्या धूमावती तथा ॥
बगलासिद्धि विद्या च मातङ᳭गी कमलात्मिका ।
एता दशमहाविद्या: सिद्धी विद्या: प्रकीर्तिता: ॥

दस महाविद्या शाबर मन्त्र

सुनो पार्वती हम मत्स्येन्द्र पूता, आदिनाथ नाती, हम शिव स्वरुप उलटी थापना थापी योगी का योग, दस विद्या शक्ति जानो, जिसका भेद शिव शंकर ही पायो । सिद्ध योग मर्म जो जाने विरला तिसको प्रसन्न भयी महाकालिका । योगी योग नित्य करे प्रातः उसे वरद भुवनेश्वरी माता । सिद्धासन सिद्ध, भया श्मशानी तिसके संग बैठी बगलामुखी । जोगी खड दर्शन को कर जानी, खुल गया ताला ब्रह्माण्ड भैरवी । नाभी स्थाने उडीय्यान बांधी मनीपुर चक्र में बैठी, छिन्नमस्ता रानी । ॐकार ध्यान लाग्या त्रिकुटी, प्रगटी तारा बाला सुन्दरी । पाताल जोगन (कुंडलिनी) गगन को चढ़ी, जहां पर बैठी त्रिपुर सुन्दरी । आलस मोड़े, निद्रा तोड़े तिसकी रक्षा देवी धूमावन्ती करें । हंसा जाये दसवें द्वारे देवी मातंगी का आवागमन खोजे । जो कमला देवी की धूनी चेताये तिसकी ऋद्धि सिद्धि से भण्डार भरे । जो दसविद्या का सुमिरण करे । पाप पुण्य से न्यारा रहे । योग अभ्यास से भये सिद्धा आवागमन निवरते । मन्त्र पढ़े सो नर अमर लोक में जाये ।

Vastu Shastra & Feng Shui - Towards Prosperity

Vastu Shastra & I

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3:23 Avoid Inauspicious Plants

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3:03 In-laws & Kitchen

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4:06

Cosmic Chant Daily Dose

Cry It Out

4:49

Do Not Cry

0:51

Stop Working

1:24

Parent Child - Bow Arrow

0:56 Description Description

Crying is a natural response to emotions. Crying boosts your emotional and physical health. Crying is not calling for notice. Crying is calling for sharing. Tears of Joy called TOJ is a special form of crying which can occur when a person is completely involved in situations in which they experience great pleasure. Studies suggest that crying serves homeostasis by facilitating recovery.

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Parents are among the most important people in the lives of young children. Parenting skills means a parent’s competencies in providing physical care, protection, supervision and psychological support appropriate to a child’s age and state of development.Parenting is the process of raising children and providing them with protection and care in order to ensure their healthy development into adulthood. Generally there are four parenting categories viz. authoritarian, authoritative, permissive, and uninvolved. Every category employs a unique approach to how parents raise their child.

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