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Mahalakshmi (Kamala) Sahasranamam Stotram | महालक्ष्मी (कमला) सहस्रनाम स्तोत्रम्

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॥श्री महालक्ष्मी सहस्रनाम स्तोत्रम्॥

अथवा

॥श्री कमला सहस्रनाम स्तोत्रम्॥

श्री गणेशाय नमः॥

ॐ तामाह्वयामि सुभगां लक्ष्मीं त्रैलोक्यपूजिताम्। एह्येहि देवि पद्माक्षि पद्माकरकृतालये॥१॥
आगच्छागच्छ वरदे पश्य मां स्वेन चक्षुषा। आयाह्यायाहि धर्मार्थकाममोक्षमये शुभे॥२॥
एवंविधैः स्तुतिपदैः सत्यैः सत्यार्थसंस्तुता। कनीयसी महाभागा चन्द्रेण परमात्मना॥३॥
निशाकरश्च सा देवी भ्रातरौ द्वौ पयोनिधेः। उत्पन्नमात्रौ तावास्तां शिवकेशवसंश्रितौ॥४॥

॥अथ श्री सहस्रनामस्तोत्रम्॥

श्रीः पद्मा प्रकृतिः सत्त्वा शान्ता चिच्छक्तिरव्यया। केवला निष्कला शुद्धा व्यापिनी व्योमविग्रहा॥१॥
व्योमपद्मकृताधारा परा व्योमामृतोद्भवा। निर्व्योमा व्योममध्यस्था पञ्चव्योमपदाश्रिता॥२॥
अच्युता व्योमनिलया परमानन्दरूपिणी। नित्यशुद्धा नित्यतृप्ता निर्विकारा निरीक्षणा॥३॥
ज्ञानशक्तिः कर्तृशक्तिर्भोक्तृशक्तिः शिखावहा। स्नेहाभासा निरानन्दा विभूतिर्विमलाचला॥४॥
अनन्ता वैष्णवी व्यक्ता विश्वानन्दा विकासिनी। शक्तिर्विभिन्नसर्वार्तिः समुद्रपरितोषिणी॥५॥
मूर्तिः सनातनी हार्दी निस्तरङ्गा निरामया। ज्ञानज्ञेया ज्ञानगम्या ज्ञानज्ञेयविकासिनी॥६॥
स्वच्छन्दशक्तिर्गहना निष्कम्पार्चिः सुनिर्मला। स्वरूपा सर्वगा पारा बृंहिणी सुगुणोर्जिता॥७॥
अकलङ्का निराधारा निःसंकल्पा निराश्रया। असंकीर्णा सुशान्ता च शाश्वती भासुरी स्थिरा॥८॥
अनौपम्या निर्विकल्पा नियन्त्री यन्त्रवाहिनी। अभेद्या भेदिनी भिन्ना भारती वैखरी खगा॥९॥
अग्राह्या ग्राहिका गूढा गम्भीरा विश्वगोपिनी। अनिर्देश्या प्रतिहता निर्बीजा पावनी परा॥१०॥
अप्रतर्क्या परिमिता भवभ्रान्तिविनाशिनी। एका द्विरूपा त्रिविधा असंख्याता सुरेश्वरी॥११॥
सुप्रतिष्ठा महाधात्री स्थितिर्वृद्धिर्ध्रुवा गतिः। ईश्वरी महिमा ऋद्धिः प्रमोदा उज्ज्वलोद्यमा॥१२॥
अक्षया वर्द्धमाना च सुप्रकाशा विहङ्गमा। नीरजा जननी नित्या जया रोचिष्मती शुभा॥१३॥
तपोनुदा च ज्वाला च सुदीप्तिश्चांशुमालिनी। अप्रमेया त्रिधा सूक्ष्मा परा निर्वाणदायिनी॥१४॥
अवदाता सुशुद्धा च अमोघाख्या परम्परा। संधानकी शुद्धविद्या सर्वभूतमहेश्वरी॥१५॥
लक्ष्मीस्तुष्टिर्महाधीरा शान्तिरापूरणानवा। अनुग्रहा शक्तिराद्या जगज्ज्येष्ठा जगद्विधिः॥१६॥
सत्या प्रह्वा क्रिया योग्या अपर्णा ह्लादिनी शिवा। सम्पूर्णाह्लादिनी शुद्धा ज्योतिष्मत्यमृतावहा॥१७॥
रजोवत्यर्कप्रतिभाऽऽकर्षिणी कर्षिणी रसा। परा वसुमती देवी कान्तिः शान्तिर्मतिः कला॥१८॥
कला कलङ्करहिता विशालोद्दीपनी रतिः। सम्बोधिनी हारिणी च प्रभावा भवभूतिदा॥१९॥
अमृतस्यन्दिनी जीवा जननी खण्डिका स्थिरा। धूमा कलावती पूर्णा भासुरा सुमतीरसा॥२०॥
शुद्धा ध्वनिः सृतिः सृष्टिर्विकृतिः कृष्टिरेव च। प्रापणी प्राणदा प्रह्वा विश्वा पाण्डुरवासिनी॥२१॥
अवनिर्वज्रनलिका चित्रा ब्रह्माण्डवासिनी। अनन्तरूपानन्तात्मानन्तस्थानन्तसम्भवा॥२२॥
महाशक्तिः प्राणशक्तिः प्राणदात्री ऋतम्भरा। महासमूहा निखिला इच्छाधारा सुखावहा॥२३॥
प्रत्यक्षलक्ष्मीर्निष्कम्पा प्ररोहाबुद्धिगोचरा। नानादेहा महावर्ता बहुदेहविकासिनी॥२४॥
सहस्राणी प्रधाना च न्यायवस्तुप्रकाशिका। सर्वाभिलाषपूर्णेच्छा सर्वा सर्वार्थभाषिणी॥२५॥
नानास्वरूपचिद्धात्री शब्दपूर्वा पुरातनी। व्यक्ताव्यक्ता जीवकेशा सर्वेच्छापरिपूरिता॥२६॥
संकल्पसिद्धा सांख्येया तत्त्वगर्भा धरावहा। भूतरूपा चित्स्वरूपा त्रिगुणा गुणगर्विता॥२७॥
प्रजापतीश्वरी रौद्री सर्वाधारा सुखावहा। कल्याणवाहिका कल्या कलिकल्मषनाशिनी॥२८॥
नीरूपोद्भिन्नसंताना सुयन्त्रा त्रिगुणालया। महामाया योगमाया महायोगेश्वरी प्रिया॥२९॥
महास्त्री विमला कीर्तिर्जया लक्ष्मीर्निरञ्जना। प्रकृतिर्भगवन्माया शक्तिर्निद्रा यशस्करी॥३०॥
चिन्ता बुद्धिर्यशः प्रज्ञा शान्तिः सुप्रीतिवर्द्धिनी। प्रद्युम्नमाता साध्वी च सुखसौभाग्यसिद्धिदा॥३१॥
काष्ठा निष्ठा प्रतिष्ठा च ज्येष्ठा श्रेष्ठा जयावहा। सर्वातिशायिनी प्रीतिर्विश्वशक्तिर्महाबला॥३२॥
वरिष्ठा विजया वीरा जयन्ती विजयप्रदा। हृद्गृहा गोपिनी गुह्या गणगन्धर्वसेविता॥३३॥
योगीश्वरी योगमाया योगिनी योगसिद्धिदा। महायोगेश्वरवृता योगा योगेश्वरप्रिया॥३४॥
ब्रह्मेन्द्ररुद्रनमिता सुरासुरवरप्रदा। त्रिवर्त्मगा त्रिलोकस्था त्रिविक्रमपदोद्भवा॥३५॥
सुतारा तारिणी तारा दुर्गा संतारिणी परा। सुतारिणी तारयन्ती भूरितारेश्वरप्रभा॥३६॥
गुह्यविद्या यज्ञविद्या महाविद्या सुशोभिता। अध्यात्मविद्या विघ्नेशी पद्मस्था परमेष्ठिनी॥३७॥
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिर्नयात्मिका। गौरी वागीश्वरी गोप्त्री गायत्री कमलोद्भवा॥३८॥
विश्वम्भरा विश्वरूपा विश्वमाता वसुप्रदा। सिद्धिः स्वाहा स्वधा स्वस्तिः सुधा सर्वार्थसाधिनी॥३९॥
इच्छा सृष्टिर्द्युतिर्भूतिः कीर्तिः श्रद्धा दयामतिः। श्रुतिर्मेधा धृतिर्ह्रीः श्रीर्विद्या विबुधवन्दिता॥४०॥
अनसूया घृणा नीतिर्निर्वृतिः कामधुक्करा। प्रतिज्ञा संततिर्भूतिर्द्यौः प्रज्ञा विश्वमानिनी॥४१॥
स्मृतिर्वाग्विश्वजननी पश्यन्ती मध्यमा समा। संध्या मेधा प्रभा भीमा सर्वाकारा सरस्वती॥४२॥
काङ्क्षा माया महामाया मोहिनी माधवप्रिया। सौम्याभोगा महाभोगा भोगिनी भोगदायिनी॥४३॥
सुधौतकनकप्रख्या सुवर्णकमलासना। हिरण्यगर्भा सुश्रोणी हारिणी रमणी रमा॥४४॥
चन्द्रा हिरण्मयी ज्योत्स्ना रम्या शोभा शुभावहा। त्रैलोक्यमण्डना नारी नरेश्वरवरार्चिता॥४५॥
त्रैलोक्यसुन्दरी रामा महाविभववाहिनी। पद्मस्था पद्मनिलया पद्ममालाविभूषिता॥४६॥
पद्मयुग्मधरा कान्ता दिव्याभरणभूषिता। विचित्ररत्नमुकुटा विचित्राम्बरभूषणा॥४७॥
विचित्रमाल्यगन्धाढ्या विचित्रायुधवाहना। महानारायणी देवी वैष्णवी वीरवन्दिता॥४८॥
कालसंकर्षिणी घोरा तत्त्वसंकर्षिणीकला। जगत्सम्पूरणी विश्वा महाविभवभूषणा॥४९॥
वारुणी वरदा व्याख्या घण्टाकर्णविराजिता। नृसिंही भैरवी ब्राह्मी भास्करी व्योमचारिणी॥५०॥
ऐन्द्री कामधेनुः सृष्टिः कामयोनिर्महाप्रभा। दृष्टा काम्या विश्वशक्तिर्बीजगत्यात्मदर्शना॥५१॥
गरुडारूढहृदया चान्द्री श्रीर्मधुरानना। महोग्ररूपा वाराही नारसिंही हतासुरा॥५२॥
युगान्तहुतभुग्ज्वाला कराला पिङ्गलाकला। त्रैलोक्यभूषणा भीमा श्यामा त्रैलोक्यमोहिनी॥५३॥
महोत्कटा महारक्ता महाचण्डा महासना। शङ्खिनी लेखिनी स्वस्था लिखिता खेचरेश्वरी॥५४॥
भद्रकाली चैकवीरा कौमारी भवमालिनी। कल्याणी कामधुग्ज्वालामुखी चोत्पलमालिका॥५५॥
बालिका धनदा सूर्या हृदयोत्पलमालिका। अजिता वर्षिणी रीतिर्भरुण्डा गरुडासना॥५६॥
वैश्वानरी महामाया महाकाली विभीषणा। महामन्दारविभवा शिवानन्दा रतिप्रिया॥५७॥
उद्रीतिः पद्ममाला च धर्मवेगा विभावनी। सत्क्रिया देवसेना च हिरण्यरजताश्रया॥५८॥
सहसावर्तमाना च हस्तिनादप्रबोधिनी। हिरण्यपद्मवर्णा च हरिभद्रा सुदुर्द्धरा॥५९॥
सूर्या हिरण्यप्रकटसदृशी हेममालिनी। पद्मानना नित्यपुष्टा देवमाता मृतोद्भवा॥६०॥
महाधना च या शृङ्गी कर्द्दमी कम्बुकन्धरा। आदित्यवर्णा चन्द्राभा गन्धद्वारा दुरासदा॥६१॥
वराचिता वरारोहा वरेण्या विष्णुवल्लभा। कल्याणी वरदा वामा वामेशी विन्ध्यवासिनी॥६२॥
योगनिद्रा योगरता देवकी कामरूपिणी। कंसविद्राविणी दुर्गा कौमारी कौशिकी क्षमा॥६३॥
कात्यायनी कालरात्रिर्निशितृप्ता सुदुर्जया। विरूपाक्षी विशालाक्षी भक्तानांपरिरक्षिणी॥६४॥
बहुरूपा स्वरूपा च विरूपा रूपवर्जिता। घण्टानिनादबहुला जीमूतध्वनिनिःस्वना॥६५॥
महादेवेन्द्रमथिनी भ्रुकुटीकुटिलानना। सत्योपयाचिता चैका कौबेरी ब्रह्मचारिणी॥६६॥
आर्या यशोदा सुतदा धर्मकामार्थमोक्षदा। दारिद्र्यदुःखशमनी घोरदुर्गार्तिनाशिनी॥६७॥
भक्तार्तिशमनी भव्या भवभर्गापहारिणी। क्षीराब्धितनया पद्मा कमला धरणीधरा॥६८॥
रुक्मिणी रोहिणी सीता सत्यभामा यशस्विनी। प्रज्ञाधारामितप्रज्ञा वेदमाता यशोवती॥६९॥
समाधिर्भावना मैत्री करुणा भक्तवत्सला। अन्तर्वेदी दक्षिणा च ब्रह्मचर्यपरागतिः॥७०॥
दीक्षा वीक्षा परीक्षा च समीक्षा वीरवत्सला। अम्बिका सुरभिः सिद्धा सिद्धविद्याधरार्चिता॥७१॥
सुदीक्षा लेलिहाना च कराला विश्वपूरका। विश्वसंधारिणी दीप्तिस्तापनी ताण्डवप्रिया॥७२॥
उद्भवा विरजा राज्ञी तापनी बिन्दुमालिनी। क्षीरधारासुप्रभावा लोकमाता सुवर्चसा॥७३॥
हव्यगर्भा चाज्यगर्भा जुह्वतोयज्ञसम्भवा। आप्यायनी पावनी च दहनी दहनाश्रया॥७४॥
मातृका माधवी मुख्या मोक्षलक्ष्मीर्महर्द्धिदा। सर्वकामप्रदा भद्रा सुभद्रा सर्वमङ्गला॥७५॥
श्वेता सुशुक्लवसना शुक्लमाल्यानुलेपना। हंसा हीनकरी हंसी हृद्या हृत्कमलालया॥७६॥
सितातपत्रा सुश्रोणी पद्मपत्रायतेक्षणा। सावित्री सत्यसंकल्पा कामदा कामकामिनी॥७७॥
दर्शनीया दृशा दृश्या स्पृश्या सेव्या वराङ्गना। भोगप्रिया भोगवती भोगीन्द्रशयनासना॥७८॥
आर्द्रा पुष्करिणी पुण्या पावनी पापसूदनी। श्रीमती च शुभाकारा परमैश्वर्यभूतिदा॥७९॥
अचिन्त्यानन्तविभवा भवभावविभावनी। निश्रेणिः सर्वदेहस्था सर्वभूतनमस्कृता॥८०॥
बला बलाधिका देवी गौतमी गोकुलालया। तोषिणी पूर्णचन्द्राभा एकानन्दा शतानना॥८१॥
उद्याननगरद्वारहर्म्योपवनवासिनी। कूष्माण्डा दारुणा चण्डा किराती नन्दनालया॥८२॥
कालायना कालगम्या भयदा भयनाशिनी। सौदामनी मेघरवा दैत्यदानवमर्दिनी॥८३॥
जगन्माता भयकरी भूतधात्री सुदुर्लभा। काश्यपी शुभदाता च वनमाला शुभावरा॥८४॥
धन्या धन्येश्वरी धन्या रत्नदा वसुवर्द्धिनी। गान्धर्वी रेवती गङ्गा शकुनी विमलानना॥८५॥
इडा शान्तिकरी चैव तामसी कमलालया। आज्यपा वज्रकौमारी सोमपा कुसुमाश्रया॥८६॥
जगत्प्रिया च सरथा दुर्जया खगवाहना। मनोभवा कामचारा सिद्धचारणसेविता॥८७॥
व्योमलक्ष्मीर्महालक्ष्मीस्तेजोलक्ष्मीः सुजाज्वला। रसलक्ष्मीर्जगद्योनिर्गन्धलक्ष्मीर्वनाश्रया॥८८॥
श्रवणा श्रावणी नेत्री रसनाप्राणचारिणी। विरिञ्चिमाता विभवा वरवारिजवाहना॥८९॥
वीर्या वीरेश्वरी वन्द्या विशोका वसुवर्द्धिनी। अनाहता कुण्डलिनी नलिनी वनवासिनी॥९०॥
गान्धारिणीन्द्रनमिता सुरेन्द्रनमिता सती। सर्वमङ्गल्यमाङ्गल्या सर्वकामसमृद्धिदा॥९१॥
सर्वानन्दा महानन्दा सत्कीर्तिः सिद्धसेविता। सिनीवाली कुहू राका अमा चानुमतिर्द्युतिः॥९२॥
अरुन्धती वसुमती भार्गवी वास्तुदेवता। मायूरी वज्रवेताली वज्रहस्ता वरानना॥९३॥
अनघा धरणिर्धीरा धमनी मणिभूषणा। राजश्री रूपसहिता ब्रह्मश्रीर्ब्रह्मवन्दिता॥९४॥
जयश्रीर्जयदा ज्ञेया सर्गश्रीः स्वर्गतिः सताम्। सुपुष्पा पुष्पनिलया फलश्रीर्निष्कलप्रिया॥९५॥
धनुर्लक्ष्मीस्त्वमिलिता परक्रोधनिवारिणी। कद्रूर्द्धनायुः कपिला सुरसा सुरमोहिनी॥९६॥
महाश्वेता महानीला महामूर्तिर्विषापहा। सुप्रभा ज्वालिनी दीप्तिस्तृप्तिर्व्याप्तिः प्रभाकरी॥९७॥
तेजोवती पद्मबोधा मदलेखारुणावती। रत्ना रत्नावली भूता शतधामा शतापहा॥९८॥
त्रिगुणा घोषिणी रक्ष्या नर्द्दिनी घोषवर्जिता। साध्या दितिर्दितिदेवी मृगवाहा मृगाङ्कगा॥९९॥
चित्रनीलोत्पलगता वृषरत्नकराश्रया। हिरण्यरजतद्वन्द्वा शङ्खभद्रासनास्थिता॥१००॥
गोमूत्रगोमयक्षीरदधिसर्पिर्जलाश्रया। मरीचिश्चीरवसना पूर्णा चन्द्रार्कविष्टरा॥१०१॥
सुसूक्ष्मा निर्वृतिः स्थूला निवृत्तारातिरेव च। मरीचिज्वालिनी धूम्रा हव्यवाहा हिरण्यदा॥१०२॥
दायिनी कालिनी सिद्धिः शोषिणी सम्प्रबोधिनी। भास्वरा संहतिस्तीक्ष्णा प्रचण्डज्वलनोज्ज्वला॥१०३॥
साङ्गा प्रचण्डा दीप्ता च वैद्युतिः सुमहाद्युतिः। कपिला नीलरक्ता च सुषुम्णा विस्फुलिङ्गिनी॥१०४॥
अर्चिष्मती रिपुहरा दीर्घा धूमावली जरा। सम्पूर्णमण्डला पूषा स्रंसिनी सुमनोहरा॥१०५॥
जया पुष्टिकरीच्छाया मानसा हृदयोज्ज्वला। सुवर्णकरणी श्रेष्ठा मृतसंजीविनीरणे॥१०६॥
विशल्यकरणी शुभ्रा संधिनी परमौषधिः। ब्रह्मिष्ठा ब्रह्मसहिता ऐन्दवी रत्नसम्भवा॥१०७॥
विद्युत्प्रभा बिन्दुमती त्रिस्वभावगुणाम्बिका। नित्योदिता नित्यहृष्टा नित्यकामकरीषिणी॥१०८॥
पद्माङ्का वज्रचिह्ना च वक्रदण्डविभासिनी। विदेहपूजिता कन्या माया विजयवाहिनी॥१०९॥
मानिनी मङ्गला मान्या मालिनी मानदायिनी। विश्वेश्वरी गणवती मण्डला मण्डलेश्वरी॥११०॥
हरिप्रिया भौमसुता मनोज्ञा मतिदायिनी। प्रत्यङ्गिरा सोमगुप्ता मनोऽभिज्ञा वदन्मतिः॥१११॥
यशोधरा रत्नमाला कृष्णा त्रैलोक्यबन्धनी। अमृता धारिणी हर्षा विनता वल्लकी शची॥११२॥
संकल्पा भामिनी मिश्रा कादम्बर्यमृतप्रभा। अगता निर्गता वज्रा सुहिता संहिताक्षता॥११३॥
सर्वार्थसाधनकरी धातुर्धारणिकामला। करुणाधारसम्भूता कमलाक्षी शशिप्रिया॥११४॥
सौम्यरूपा महादीप्ता महाज्वाला विकाशिनी। माला काञ्चनमाला च सद्वज्रा कनकप्रभा॥११५॥
प्रक्रिया परमा योक्त्री क्षोभिका च सुखोदया। विजृम्भणा च वज्राख्या शृङ्खला कमलेक्षणा॥११६॥
जयंकरी मधुमती हरिता शशिनी शिवा। मूलप्रकृतिरीशानी योगमाता मनोजवा॥११७॥
धर्मोदया भानुमती सर्वाभासा सुखावहा। धुरन्धरा च बाला च धर्मसेव्या तथागता॥११८॥
सुकुमारा सौम्यमुखी सौम्यसम्बोधनोत्तमा। सुमुखी सर्वतोभद्रा गुह्यशक्तिर्गुहालया॥११९॥
हलायुधा चैकवीरा सर्वशस्त्रसुधारिणी। व्योमशक्तिर्महादेहा व्योमगा मधुमन्मयी॥१२०॥
गङ्गा वितस्ता यमुना चन्द्रभागा सरस्वती। तिलोत्तमोर्वशी रम्भा स्वामिनी सुरसुन्दरी॥१२१॥
बाणप्रहरणावाला बिम्बोष्ठी चारुहासिनी। ककुद्मिनी चारुपृष्ठा दृष्टादृष्टफलप्रदा॥१२२॥
काम्याचरी च काम्या च कामाचारविहारिणी। हिमशैलेन्द्रसंकाशा गजेन्द्रवरवाहना॥१२३॥
अशेषसुखसौभाग्यसम्पदा योनिरुत्तमा। सर्वोत्कृष्टा सर्वमयी सर्वा सर्वेश्वरप्रिया॥१२४॥
सर्वाङ्गयोनिः साव्यक्ता सम्प्रधानेश्वरेश्वरी। विष्णुवक्षःस्थलगता किमतः परमुच्यते॥१२५॥
परा निर्महिमा देवी हरिवक्षःस्थलाश्रया। सा देवी पापहन्त्री च सान्निध्यं कुरुतान्मम॥१२६॥

॥इत्यादिपद्मपुराणे काश्मीरवर्णने हिरण्यगर्भहृदये सर्वकामप्रदायकं पुरुषोत्तमप्रोक्तं श्रीलक्ष्मीसहस्रनामस्तोत्रं समाप्तम्॥

॥ॐ विष्णवे नम:॥॥ॐ विष्णवे नम:॥॥ॐ विष्णवे नम:॥

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